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9 शार्ट स्टोरी लघुकथा = a suicide note of a sparrow ( जेनर = प्रेरक )

लघुकथा 

जेनर  = प्रेरक

Tittle = a suicide note of a sparrow



हे! भगवान आज फिर इन चिडियो ने मेरे इस आलीशान कमरे में बने रोशनदान में अपना घोंसला बना लिया। अब ये यहाँ अंडे देंगी और मेरा कमरा अपनी बीट से गन्दा करेंगी। लेकिन मैं इनको कामयाब नही होने दूंगा।

इनको मेरा ही घर मिला है अपना घर बनाने को। बाहर दरखतो पर अपना आशियाना नही बना सकती। अभी मिस्त्री को बुला कर इसमें इट भरवा देता हूँ। फिर देखता हूँ कैसे तुम दोनों मेरे कमरे में अपना घोंसला बनाती हो। ईशान ने अपना मोबाइल जेब से निकालते हुए कहा।

ट्रिंग,,, ट्रिंग,,,, हेलो कौन बात कर रहा है।

"मिस्त्री साहब मैं ईशान मल्होत्रा जिसका विला आपने बनाया है।" ईशान ने मिस्त्री से कहा

" जी मल्होत्रा साहब पहचान लिया, आज कैसे मुझ गरीब की याद आ गयी घर में तो कोई शिकायत नही हैं आपके "मिस्त्री ने कहा


"नही नही मिस्त्री साहब घर तो आपने बेहद खूबसूरत बनाया है। जो भी आता है तारीफ करता है। आपने तो इस खंडर में जान डालदी जिसमे चंद टूटी खप्रेल हुआ करती थी।" ईशान ने कहा

शुक्रिया, शुक्रिया मल्होत्रा साहब तारीफ के लिए। कुछ और काम करवाना बाकी है किया जो हमें याद किया है।

"जी मिस्त्री साहब, जो रोशनदान मेने अपने कमरे में बेड के उपर हवा के आने जाने के लिए बनवाया था। मुझे उसे बंद करवाना है। क्यूंकि वहा से हवा तो नही आती लेकिन चिड़िये अपना घोंसला जरूर बना रही है। और मेरे बिस्तर पर बीट करती रहती है। मुझे उसे बंद करवाना है।"ईशान ने कहा

"मल्होत्रा साहब आप उसमे जाली लगवा दीजिये जिससे चिडियो की बीट घर में नही आएगी और चिड़िया अपना घोंसला भी बना लेंगी " मिस्त्री ने कहा

"ए मिस्त्री मेने तुझसे राय या फिर मशवरा नही माँगा है। मेने अपना ये आलीशान घर जिसमे करोडो रूपये लग गए है मेरे। चिडियो के घोसले या फिर उनकी आवाज़ से अपनी नींद को परेशान करने के लिए नही बनाया है। तू आ, आकर उसे बंद कर अपने पैसे ले और जा यहाँ से मुझे मत बता किया करना है। मैं तुझसे बेहतर जानता हूँ " ईशान ने कहा गुस्से से।

"अच्छा साहब अभी किसी मजदूर को भेज देता हूँ आपकी तरफ " मिस्त्री ने कहा और फ़ोन रख दिया और अपने आप से बोला " आज कल के इंसान में परिंदो के प्रति दया तो मर ही चुकी है हमारे बचपन में गोरेया हमें आकर उठाती थी और एक ये अमीर लोग है गोरेया की आवाज़ इन्हे परेशान कर रही है जबकी रात को कानो में लुप्पी लगा कर गाने सुनते हे रात भर । हे ¡ ईश्वर इन्हे सद्बुद्धि दें।


ईशान  गुस्से में नाश्ते की मेज पर  बैठा  अपने नौकर  से नाश्ता लाने को कहता । ईशान  नाश्ता करके  मिस्त्री के आने  का इंतज़ार  करता । थोड़ी  देर बाद मिस्त्री वहा  आता  और ईशान  अपने कमरे  के साथ  बाकी सारे कमरों के रोशनदान  बंद  करवा  देता हे  ताकि कही  और भी  चिड़िया  या कबूतर  घोसला  ना बना  सके  और गंदगी  ना फैलाये।


करीब दो तीन घंटो  में ही मिस्त्री ने सारे रोशनदान  बंद  कर  दिए , कही  कही  घोसले  बने  हुए  थे  उन्हें मिस्त्री ने नीचे  फ़ेंक  दिया।

ईशान  भी  दफ़्तर  चला  गया । नौकर  उसका घर  साफ करने  में लग  गए । शाम  को ईशान  थका  हारा बाहर  से ही खाना  खा कर  सो गया । नौकर से कह  कर  की कोई उसे परेशान  नही करे ।

बहुत  देर बाद उसकी आँख  खुली  खिड़की  से रौशनी  आ  रही  थी । सूरज  निकल आया  था  तभी  उसकी नज़र  अपने कमरे  के रोशन  दान पर  गयी  जहाँ से सूरज  की रौशनी  और कुछ  चू चू  की आवाज़  आ  रही  थी ।


ईशान  सोच  में पढ़ गया  कि कल  ही तो उसने सारे रोशनदान  बंद  करवाये  थे  तो फिर  आज  ये रौशनी  और आवाज़  कहा  से आ  रही  हे ।

उसने अपने नौकर  को आवाज़  दी और सीड़ी  लाने को कहा । लेकिन वो घर  पर  नही था , इसलिए  ईशान  खुद  ही सीड़ी  लाया और रोशनदान  कि तरफ  बढ़ने  लगा ।


उसने देखा की एक गोरेया चिड़िया जो बुरी तरह  तड़प  रही  थी  क्यूंकि उसने रात भर  उन इटो में सर  मारा था  ताकि वो अंदर  घुस  सके  लेकिन वो नाकाम रही । तभी  उसने देखा  की वही  पास  में एक ख़त  पड़ा था ।


जिसपर  खून  से कुछ  लिखा  था । उसे आश्चर्य  हुआ की आखिर  यहाँ ये ख़त किसने छोड़ा । उसने वो ख़त  उठाया  और खोल  कर  पढ़ने  लगा  जिसमे लिखा  था  " मैं छोटी  सी आँगन  में फुदकने  वाली गोरेया हूँ, जो कभी अपनी बहुत  सारी टोली के साथ  रहती  थी । जिसमे चिड़िया , चिरोटे बहुत  सारे बच्चे  हुआ करते  थे । हम  सब  लोग परिंदे  होते हुए  भी  तुम इंसानों के बीच  रहना  पसंद  करते  थे । क्यूंकि हम  लोग जो खाना  खाते  हे  वही  तुम लोग भी  खाते  हो। हम  लोग चावल , गेहूं को ही अपना अन्न मानते हे  जो की तुम लोगो के घरों  से आसानी  से मिल जाता था ।

और साथ  ही साथ  पानी भी वही  मिल जाया करता  था । हमें कही  भटकने  की ज़रुरत  नही होती। हम  तुम लोगो के घरों  के आँगन  को अपना आँगन  समझते  और वही  दिन भर  फुदकते  रहते । तुम लोगो के दिलो में भी  हमारे  प्रति प्यार होता था  इसीलिए  तुम लोग अपने घरों  में बहुत  सारी ऐसी जगह  छोड़  देते जिसमे हम  अपना आशियाना  आसानी  से बना  सकते  थे ।

हम  लोग पेड़ो या दरखतो पर  अपना आशियाना  नही बनाते  क्यूंकि हम  नन्ही सी जान तुम इंसानों के बीच  खुद  को ज्यादा मेहफूज़  समझते  थे । क्यूंकि बाहर  हम  से बड़े  परिंदे  हमें अपना भोजन  बना  लेते अगर  हम  दरखतो पर  अपना घर  बनाते , हमारे  अंडे साप पेड़ पर  चढ़  कर  खा  जाता था  या फिर  दूसरे  पक्षी  हमारे  बच्चों को खा  जाते इसलिए  हम लोग तुम्हारे घर में, तुम्हारे रोशनदान, ताक, खप्रेल के नीचे या फिर  मिट्टी की दीवारों में छेद  कर  के उसमे अपना आशियाना  बनाते  और अंडे देकर बच्चे  निकालते और वो बच्चे  बढ़ कर  हमारी  नस्ल को और दो गुना करते ।

घरों  के अंदर  घोंसला बनाना  यूं भी  ज़रूरी  था  क्यूंकि हमारे  अंडे ज़्यादा धूप  और ज़्यादा ठण्ड  और बरसात  बर्दाश  नही कर  सकते  और वो टूट  जाते। इसलिए  हम  तुम्हारे घरों  में अपना घोंसला बनाते ।


लेकिन कौन जानता  था  की वक़्त हमेशा  एक सा नही रहता । और हमारा  बुरा वक़्त भी  नजदीक  था  इसका आभास  हमें पहले  से था  क्यूंकि गांव शहरो  में बदल  रहे  थे और शहर  बड़ी  बड़ी  ईमारतो में।

लेकिन फिर  भी  हमारी प्रजाति पर  इसका कुछ  ज़्यादा असर  नही हुआ हम  लोग शहरो  से गांव की और चले  गए । लेकिन वहा  भी  धीरे  धीरे  घरों  का आकार छोटा  होने लगा ।

जो लोग कभी  साथ  साथ  रहना  पसंद करते  थे । वो अब अपना अपना आशियाना  अलग  बनाने  लगे  वो भी  पक्का। जिसमे ना तो कोई रोशनदान और ना ही दीवारों में कोई छेद  जिसमे हम  अपना घर  बनाले । और आँगन  तो बिलकुल ही नही और ना ही उसमे कोई पेड़। जिसपर  हम  बैठ  सके ।

धीरे  धीरे  सब  लोग ऐसा ही करने  लगे । जिन लोगो के घरों  में रोशनदान  थे  उन्होंने हमारी  आमद देख  उन्हें बंद करवा  दिए  ताकि हम  उनके घरों  में बीट ना कर  दें।

कुछ  लोग थे  जो कभी  अपनी बालकनी, छत   और खिड़की में कुछ  दाने और पानी रख  देते लेकिन अब वो लोग भी  उपर  छत  पर  जाने से आलस  करते  और उन्होंने भी  अब रखना  छोड़  दिया।

मजबूरन  हम  लोगो को अपना घोंसला पेड़ो पर  बनाना  पड़ा  लेकिन उसका वही  नतीजा  हुआ जो हमने  सोचा  था । बाहर  तेज धूप  की वजह  से बच्चे  अंडे के अंदर  ही मर  गए  क्यूंकि उन्हें सिर्फ एक नियमित  गरमाई  चाहिए  होती हे  अंडे के अंदर । और ठण्ड  और बरसात  में भी  बच्चे  अंडे के अंदर  मर  गए । जो बच्चे  संघर्ष  करके  अंडो से बाहर  निकले उन्हें या तो कोवा खा गया या फिर सांप।

हमारा  वंश  धीरे  dheer समाप्ति की और बढ़ने  लगा । लेकिन फिर  भी  इतना विलुप्त नही हुआ हम  लोग संघर्ष  करके  कोई ना कोई जगह  ढूंढ  ही लेते थे  अपने अंडो को सुरक्षित  रखने  के लिए । जैसे की मंदिर , मस्जिद की जालिया। रेलवे  स्टेशन  के टीन शेड  कुछ  बंद  और खाली  पड़े खंडहर  और अनाज के गोदाम इत्यादि। ये सब  अब हमारे  रहने  की जगहे  बन गयी  थी । हमने  इसमें भी  ईश्वर  का धन्यवाद किया और मानव  का भी  जो उसने ऐसी जगहे  भी  बनायीं जहाँ अब हम  आसानी  से रह  रहे  थे । क्यूंकि मानव  की बड़ती आबादी  हमें भी  दिख  रही  थी  इसलिए  हमने  भी  समझौता  कर  लिया और उनके घरों  को छोड़  कर  इन जगहों को अपना ठिखाना  बना  लिया।


लेकिन कुछ  सालो बाद मानव  ने ऐसी चीज  बनायीं जो की हमारी  प्रजाति के विलुप्त होने का कारण  बनती  चली  गयी और एक दिन हम  लोगो का नाम सिर्फ बच्चों की किताबों में रह  जाएगा जब  उनकी टीचर  उन्हें पढ़ाएगी " ग, से गोरेया और S फॉर sparrow जो की अब विलुप्त हो चुकी  हे डायनासोर की तरह  "


हम  नही जानते की तुम मानव  इतने स्वार्थी कब  बने  की तुमने अपने स्वार्थ के लिए , सिर्फ और सिर्फ अपने लिए  हम  गोरेया और हम  जैसी और चिडियो  की बली चढ़ा  दी।


तुमने रात रात भर  मोबाइल में अवारा गर्दी करने  के लिए , और अपनी जिंदगी को आसान  बनाने  के लिए  दूरभाष ( मोबाइल ) यँत्र और अंतरजाल  ( इंटरनेट ) का अविष्कार कर  दिया।

अच्छी बात हे  तुमने अपनी ज़िन्दगी को आसान  करने  के लिए  इन सब  चीज़ो  का अविष्कार किया। क्यूंकि आवश्यकता  ही अविष्कार की जननी  हे। लेकिन ये नही पता  था  की तुम लोग इस तरह इन सब  तुछ  चीज़ो  के गुलाम बन  जाओगे की भूल  ही बैठो  गे की ये पृथ्वी  ना तो तुम्हारी हे  और ना हमारी ये तो सब  की हे । इसकी रचना  ईश्वर  ने इसलिए  की थी  ताकि हम  सब  बिना किसी को नुकसान पहुचाये  सुकून  से यहाँ रह  सके ।

लेकिन तुम लोग सुकून  से रहने  के आदि  नही हो तुम स्वार्थी हो इसलिए  तो देखो  आज  तुम लोग भी  मारे काटे जा रहे  हो कभी  धर्म  के नाम पर  तो कभी  आपसी  झगड़ो  में।


तुम्हारे इस मोबाइल और इससे निकलने वाली हानिकारक  किरणों ने तुम्हारा तो कुछ  नुकसान नही किया लेकिन हमारा  वंश  ख़त्म  होने की कगार  पर ला खड़ा  कर  दिया।


हम  ये नही कहते  की तुम लोग मोबाइल और इंटरनेट  चलाना  छोड़  दो ये तुम लोगो की ज़रुरत  हे । लेकिन थोड़ा  बहुत  हमारा  भी  ख्याल  करो  हमें भी  जीना  हे  हमें भी  अपने वंश  को आगे  लेकर  जाना हे ।

थोड़ी  बहुत  स्पीड कम आती  हे  तो रख  दो मोबाइल को कुछ  और काम करलो । ज़रूरी  तो नही 4G और 5G का सिग्नल लिया जाए। तुम लोग नही जानते हम  लोग कितना रास्ता भटक  जाते हे  हमारा  दिमाग़ काम करना  छोड़ जाता हे । हमारे  बच्चे  अंडो में ही दम  तोड़ देते हे  जब  तुम तेज स्पीड के लिए  5G इस्तेमाल करते  हो।


मैं तो अब इस दुनिया में नही रही  लेकिन मेरा तुम लोगो से अनुरोध  हे  की मुझे  बचाने  का हर  संभव  प्रयत्न करो । अपने आलीशान घरों में थोड़ी बहुत जगह मेरे लिए भी छोड़ दो ताकि मैं भी उसमे अपना आशियाना बना सकूँ।


अपना मोबाइल कम इस्तेमाल किया करो  और हो सके  तो घर  में सिर्फ एक मोबाइल रखो  वो भी  कम  स्पीड का। ज्यादा समाजिक  मत  हो हर  समय  लैपटॉप हाथ  में लेकर  दुनिया को दूसरों के नज़रये से मत  देखो।

कभी कभी खुद  भी  बाहर  जाओ और देखो दुनिया कितनी हसीन  हे  और तुम लोगो ने इसे किया बना  दिया हे ।


तुम्हारे आलिशान  घर  में अपना छोटा  सा घोंसला बनाने  की उम्मीद लेकर  आयी  एक नन्ही चिड़िया  जिसने कल  रात उन इटो को तोड़ते तोड़ते अपनी जान देदी  जिन्हे तुमने भरवाया  था  और अपने खून  से ये अपना मौत का ख़त लिखा  तुम्हारे लिए  ताकि तुम हमारा  दर्द समझ  सको ।


नन्ही चिड़िया  "


ईशान ने अपनी आँखे  खोली  क्यूंकि वो सपना  देख रहा था । वो तुरंत  बिस्तर से उठ  खड़ा  हुआ उसकी आँखों  से आंसू बह  रहे  थे । वो सीड़ी  लगा  कर  रोशनदान  की तरफ  बढ़ा  तो देख एक चिड़िया  जख़्मी  हालत  में मरी पड़ी  थी । जो रात भर  उन इटो  को तोड़ कर  अंदर  आने  का प्रयास कर रही  थी  आखिर  में सिर्फ अपनी नन्ही चोंच  से एक छेद  कर  सकी  और उससे अंदर  आ  कर मर  गयी ।


ईशान  को बहुत  अफ़सोस हुआ उसे अपनी गलती  का एहसास हो चला  था। उसने तुरंत  मिस्त्री को फ़ोन  लगाया  और उसे बुला कर  उन रोशनदानो  को इस तरह  बन  वा दिया जैसे की चिड़िया  का घर ।


कुछ  दिनों में वहा  चिडिया आने  लगी । ईशान  उनके लिए  सुबह दफ़्तर  जाने से पहले  चावल  और पानी रख  कर  जाता। अब वो सब  उसकी दोस्त बन  गयी  थी  जो उसके घर  के आँगन  में फुदकती रहती  और चू चू की आवाज़  से सब  का मन बेहलाती।


आओ  हम  भी  ईशान  से प्रेरित हो कर  इनके लिए  कुछ  करे  ताकि हमारे  बच्चे  भी  इन्हे वैसे ही देख  सके  जैसा की हम  देखते  थे  अपने बचपन में फुदकता हुआ आँगन  में।


जेनर  = प्रेरक 

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10 Comments

Shnaya

02-Jun-2022 04:32 PM

👏👌

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Neha syed

14-May-2022 09:36 PM

👏👏

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Anam ansari

14-May-2022 09:26 PM

Nice

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