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प्रेमाश्रम--मुंशी प्रेमचंद


प्रस्तुत प्रश्न को यह नया स्वरूप दे कर ज्ञानशंकर विदा हुए। यद्यपि हत्या के सम्बन्ध में डॉक्टर साहब की अब भी वही राय थी, लेकिन अब यह गुनाह बेलज्जत न था। ५०० रुपये का पारितोषिक १०० रुपये फीस, साल में हजार-दस हजार मिलते रहने की आशा, उस पर पुलिस की खुशनूदी अलग। अब आगे-पीछे की जरूरत न थी। हाँ, अब अगर भय था तो डॉक्टर इर्फान अली की जिरहों का। डॉक्टर साहब की जिरह प्रसिद्ध थी। अतएव प्रियनाथ ने इस विषय के कई ग्रन्थों का अवलोकन किया और अपने पक्ष समर्थन के तत्त्व खोज निकाले। कितने ही बेगुनाहों की गर्दन पर छुरी फिर जायेगी, इसकी उन्हें एक क्षण के लिए भी चिन्ता न हुई। इस ओर उनका ध्यान ही न गया। ऐसे अवसरों पर हमारी दृष्टि कितनी संकीर्ण हो जाती है?

दिन के दस बजे थे। डॉक्टर महोदय ग्रन्थों की एक पोटली ले कर फिटन पर सवार हो कचहरी चले। उनका दिल धड़क रहा था। जिरह में उखड़ जाने की शंका लगी हुई थी। वहाँ पहुँचते ही मैजिस्ट्रेट ने उन्हें तलब किया। जब वह कटघरे के सामने आ कर खड़े हुए और अभियुक्तों को अपनी ओर दीन नेत्रों से ताकते देखा तो एक क्षण के लिए उनका चित्त अस्थिर हो गया। लेकिन यह एक क्षणिक आवेग था, आया और चला गया। उन्होंने बड़ी तात्त्विक गभीरता, मर्मज्ञतापूर्णभाव से इस हत्याकांड का विवेचन किया। चिह्नों से यह केवल एक आदमी का काम मालूम होता है। लेकिन हत्याकारियों ने बड़ी चालाकी से काम लिया है। इस विषय में वे बड़े सिद्धहस्त हैं। मृत्यु का कारण कुल्हाड़ी या गँड़ासे का आघात नहीं है, बल्कि गले का घोंटना है और कई आदमियों की सहायता के बिना गले का घोंटना असम्भव है। प्राणांत हो जाने पर एक वार से उसकी गर्दन काट ली गयी है। जिसमें यह एक ही व्यक्ति का कृत्य समझा जाय।

इर्फान अली की जिरह शुरू हुई।

‘आपने कौन सा इम्तहान पास किया है?’

‘मैं लाहौर का एल० एम० एस० और कलकत्ते का एम० बी० हूँ।

‘आपकी उम्र क्या है?’

‘चालीस वर्ष।’

‘आपका मकान कहाँ है?’

‘दिल्ली।’

‘आपकी शादी हुई है? अगर हुई है तो औलाद है या नहीं?’

‘मेरी शादी हो गयी है और कई औलादें हैं।’

‘उनकी परवरिश पर आपका कितना खर्च होता है?’

इर्फान अली यह प्रश्न ऐसे पांडित्यपूर्ण स्वाभिमान से पूछ रहे थे, मानों इन्हीं पर मुकदमें का दारोमदार है। प्रत्येक प्रश्न पर ज्वालासिंह की ओर गर्व के साथ देखते। मानों उनसे अपनी प्रखर नैयायिकता की प्रशंसा चाहते हैं। लेकिन इस अन्तिम प्रश्न पर मैजिस्ट्रेट ने एतराज किया, इस प्रश्न से आपका क्या अभिप्राय है।

इर्फान अली ने गर्व से कहा– अभी मेरा मन्शा जाहिर हुआ जाता है।

यह कहकर उन्होंने प्रियनाथ से जिरह शुरू की। बेचारे प्रियनाथ मन में सहमें जाते थे। मालूम नहीं यह महाशय मुझे किस जाल में फाँस रहे हैं।

इर्फान अली– आप मेरे आखिरी सवाल का जवाब दीजिए?

‘मेरे पास उसका कोई हिसाब नहीं है।

‘आपके यहाँ माहवार कितना दूध आता है और उसकी क्या कीमत पड़ती है?’

‘इसका हिसाब मेरे नौकर रखते हैं।’

‘घी पर माहवार क्या खर्च आता है?’

‘मैं अपने नौकर से पूछे बगैर इन गृह-सम्बन्धी प्रश्नों का उत्तर नहीं दे सकता।’

इर्फान अली ने मैजिस्ट्रेट से कहा, मेरे सवालों के काबिल इत्मीनान जवाब मिलने चाहिए।

मैजिस्ट्रेट– मैं नहीं समझता कि इन, सवालों से आपकी मन्शा क्या है?

इर्फान अली– मेरी मन्शा गवाह की एखलाकी हालत का परदाफाश करना है। इन सवालों से मैं यह साबित कर देना चाहता हूँ कि वह बहुत ऊँचे वसूलों का आदमी नहीं है।

मैजिस्ट्रेट– मैं इन प्रश्नों को दर्ज करने से इन्कार करता हूँ।

इर्फान अली– तो मैं भी जिरह करने से इन्कार करता हूँ।

यह कह कर बारिस्टर साहब इजलास से बाहर निकल आये और ज्वालासिंह से बोले, आपने देखा, यह हजरत कितनी बेजा तरफदारी कर रहें हैं? वल्लाह! मैं डॉक्टर साहब के लत्ते उड़ा देता। यहाँ ऐसी-वैसी जिरह न करते। मैं साफ साबित कर देता कि जो आदमी छोटी-छोटी रकमों पर गिरता है वह ऐसे बड़े मामले में बेलौस नहीं रह सकता। कोई मुजायका नहीं। दीवानी में चलने दीजिए, वहाँ इनकी खबर लूँगा।

इसके एक घंटा पीछे मैजिस्ट्रेट ने फैसला सुना दिया– सब अभियुक्त सेशन सुपुर्द। संध्या हो गयी थी। ये विपत्ति के मारे फिर हवालात चले। सबों के मुख पर उदासी छायी हुई थी, प्रियनाथ के बयान ने उन्हें हताश कर दिया था। वह यह कल्पना भी नहीं कर सकते थे कि ऐसा उच्च पदाधिकारी प्रलोभनों के फेर में पड़ कर असत्य की ओर जा सकता है। सभी गर्दन झुकाए चले जाते थे। अकेला मनोहर रो रहा था।

इतने में प्रियनाथ की फिटन सड़क से निकली। अभियुक्तों ने उन्हें अवहेलनापूर्ण नेत्रों से देखा। मानों कह रहे थे, ‘आपको हम दीन-दुखियों पर तनिक भी दया न आयी।’ डॉक्टर साहब ने भी उन्हें देखा, आँखों में ग्लानि का भाव झलक रहा था।

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