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प्रेमाश्रम--मुंशी प्रेमचंद

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अब कर्तार और बिन्दा महाराज भी उठे और जानवरों को चारों ओर से घेरने का आयोजन करने लगे। मवेशियों ने चौकन्नी आँखों से देखा, कान खड़े किये और इधर-उधर बिदकने लगे। परिस्थिति को ताड़ गये। बिलासी ने कहा, मैं कहती हूँ इन्हें मत घेरो, नहीं तो ठीक न होगा।

किन्तु किसी ने उसकी धमकी पर ध्यान न दिया। थोड़ी देर में सब जानवर बीच में घिर गये। और कन्धे से कन्धा मिलाये, कनखियों से ताकते, तीनों चपरासियों के साथ धीरे-धीरे चले। बिलासी एक संदिग्ध दशा में मूर्तिवत खड़ी थी। जब जानवर कोई बीस कदम निकल गये तब वह उन्मत्त की भांति दौड़ी और हाँपते हुए बोली, मैं कहती हूँ इन्हें छोड़ दे, नहीं तो ठीक न होगा।

फैजू– हट जा रास्ते से। कुछ शामत तो नहीं आयी है।

बिलासी रास्ते में खड़ी हो गयी और बोला, ले कैसे जाओगे? दिल्लगी है?

गौस खाँ– न हटे तो इसकी मरम्मत कर दो।

बिलासी– कह देती हूँ, इन जानवरों के पीछे लोहू की नदी बह जायेगी। माथे गिर जायेंगे।

फैजू– हटती है या नहीं चुड़ैल?

बिलासी– तू हट जा दाढ़ीजार।

इतना उसके मुँह से निकलना था कि फैजू ने आगे बढ़कर बिलासी की गर्दन पकड़ी और उसे इतने जोर का झोंका दिया कि वह दो कदम पर जा गिरी उसकी आँखें तिलमिला गयी, मूर्छा-सी आ गयी। एक क्षण वह वहीं अचेत पड़ी रही, तब उठी और लँगडाती हुई उन पुरुषों से अपनी अपमान कथा कहने चली जो उसके मान-मर्यादा के रक्षक थे।

मनोहर और बलराज दोनों एक दूसरे गाँव में धान काटने गये थे। वह यहाँ से कोस भर पड़ता था। लखनपुर में धान के खेत न थे। इसलिए सभी लोग प्रायः उसी गाँव में धान बोते थे। बिलासी धान के मेड़ों पर चली जाती थी। कभी पैर इधर फिसलते, कभी उधर वह ऐसी उद्विग्न हो रही थी कि किसी प्रकार उड़कर वहाँ पहुँच जाऊँ। पर घुटनियों में चोट आ गयी थी। इसी लिए विवश थी। उसके रोम-रोम से अग्नि की ज्वाला निकल रही थी। अंग-अंग में यही ध्वनि निकलती थी– इनकी इतनी मजाल ।

उसे इस समय परिणाम और फल की लेशमात्र भी चिन्ता न थी। कौन मरेगा? किसका घर मिट्टी में मिलेगा? यह बातें उसके ध्यान में न भी आती थीं। वह संकल्प, विकल्प के बन्धन से मुक्त हो गयी थी।

लेकिन जब उस गाँव के समीप पहुँची और धान से लहराते हुए खेत दिखायी देने लगे तो पहली बार उसके मन में यह प्रश्न उठा, कि इसका फल क्या होगा? बलराज एक ही क्रोधी है, मनोहर उससे भी एक अंगुल आगे। मेरा रोना सुनते ही दोनों भभक उठेंगे। जान पर खेल जायेंगे, तब? किन्तु आहत हृदय ने उत्तर दिया; क्या हानि है? लड़कों के लिए आदमी क्या झींकता है। पति के लिये क्यों रोता है? इसी दिन के लिए तो? इस कलमुँह फैजू का मान मरदन तो हो जायेगा! गौस खाँ का घमंड तो चूर-चूर हो जायेगा।

तब भी, जब वह अपने खेतों के डाँडे पर पहुँची, मनोहर और बलराज नगर आने लगे तब उसके पैर आप ही रुकने लगे। यहाँ तक कि जब वह उनके पास पहुँची तब परिणाम चिन्ता ने उसे परास्त कर दिया। वह फूट-फूटकर रोने लगी। जानती थी और समझती थी कि यह आँसू की बूँदें आग की चिनगारियाँ हैं। पर आवेश पर अपना काबू न था! वह खेत के किनारे खड़ी हो गयी और मुँह ढाँपकर रोने लगी।

बलराज ने सशंक होकर पूछा– अम्मा क्या बात है? रोती क्यों है? क्या हुआ? यह सारा कपड़ा कैसे लोहूलुहान हो गया?

बिलासी ने साड़ी की ओर देखा तो वास्तव में रक्त के छींटे दिखायी दिये, घुटनियों से खून बह रहा था, उसका हृदय थर-थर काँपने लगा। इन छींटों को छिपाने के लिए वह इस समय अपने प्राण तक दे सकती थी। हाय! मेरे सिर पर कौन सा भूत सवार हो गया कि यहाँ दौड़ी आयी! मैं क्या जानती थी कि कहीं फूट-फाट भी गया है। अब गजब हो गया! मुझे चाहिए था कि धीरज धरे बैठी रहती। साँझ को जब यह लोग घर जाते और गाँव के सब आदमी जमा होते तो सारा वृत्तान्त कह देती। जैसी सबकी सलाह होती, वैसा किया जाता। इस अव्यवस्थित दशा में कोई शान्तिप्रद उत्तर न सोच सकी।

बलराज ने फिर पूछा– कुछ मुँह से बोलती क्यों नहीं? बस रोये जाती है। क्या हुआ, कुछ बता भी तो!

बिलासी– (सिसकते हुए) फैजू और गौस खाँ हमारी सब गायें-भैंसें कानी हौद हाँक ले गये।

बलराज– क्यों? क्या उनकी सीर में पड़ी थीं?

बिलासी– नहीं, कहते थे कि चरावर चराने की मनाही हो गयी है।

बलराज ने देखा कि माता की आँखें झुकी हुई हैं और मुख पर मर्माघात की आभा झलक रही है। उसने उग्रावस्था में स्थिति को उससे कहीं, भयंकर समझ लिया, जितनी वह वस्तुतः थी कुछ और पूछने की हिम्मत न पड़ी। आँखें रक्त-वर्ण हो गयीं। कंधे पर लट्ठ रख लिया और मनोहर से बोला, मैं ज़रा गाँव तक जाता हूँ।

मनोहर– क्या काम है?

बलराज– फैजू और गौस खाँ से दो-दो बातें करनी हैं।

मनोहर– ऐसी बात करने का यह मौका नहीं। अभी जाओगे तो बात बढ़ेगी और कुछ हाथ भी न लगेगा। चार आदमी तुम्हीं को बुरा कहेंगे। अपमान का बदला इस तरह नहीं लिया जाता।

मनोहर के हर शब्दों में इतना भयंकर संकल्प, इतना घातक निश्चय भर हुआ था कि बलराज अधिक आग्रह न कर सका। उसने लाठी रख दी और माँ से कहा, अभी घर जाओ। हम लोग आयेंगे तो देखा जायेगा।

मनोहर– नहीं, घर मत जाओ। यहीं बैठो। साँझ को सब जने साथ ही चलेंगे। वह कौन दौड़ा आ रहा है? बिन्दा महाराज हैं क्या?

बलराज– नहीं, कादिर दादा जान पड़ते हैं। हाँ, वहीं हैं। भागे चले जाते हैं। मालूम होता हैं गाँव में मारपीट हो गयी। दादा क्या है, कैसे दौड़े आते हो, कुशल तो है?

कादिर ने दम लेकर कहा, तुम्हारे ही पास तो दौड़े आते हैं। बिलासी रोती आयी है। मैं डरा तुम लोग गुस्से में न जाने क्या कर बैठो। चला कि राह में मिल जाओगे तो रोक लूँगा, पर तुम कहीं मिले ही नहीं। अब तो जो हो गया सो हो गया, आगे की खबर करो। आज से ज़मींदार ने चरावर रोक दी है। अन्धेर देखते हो?

मनोहर– हाँ, देख तो रहा हूँ। अन्धेर-ही-अन्धेर है।

कादिर– फिर अदालत जाना पड़ेगा।

मनोहर– चलो, मैं तैयार हूँ।

कादिर– हाँ, आज जाओ तो सलाह पक्की करके सवाल दे दें। अबकी हाईकोर्ट तक लड़ेंगे, चाहे घर बिक जाय। बस, हल पीछे चन्दा लगा लिया जाय।

मनोहर– हाँ, यही अच्छा होगा।

कादिर– मैं नवाज पढ़ता था, सुना बिलासी को चरावर में चपरासियों ने बुरा-भला कहा और वह रोती हुई इधर-उधर आयी है। समझ गया कि आज गजब हो गया। बारे तुमने सबर से काम लिया अल्लाह इसका सवाब तुमको देगा। तो मैं अब जाता हूँ, अपने चन्दे की बातचीत करता हूँ। जरा दिन रहते चले आना।

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2 Comments

Punam verma

21-Apr-2022 10:11 AM

Very nice

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Abhinav ji

21-Apr-2022 09:19 AM

Nice👍

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