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प्रेमाश्रम--मुंशी प्रेमचंद

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इतना कहते-कहते उसकी जबान बन्द हो गयी और आँखों से आँसू निकल पड़े। सूक्खू चौधरी मन में फूले न समाते थे। उन्हें वह दिन निकट दिखाई दे रहा था, जब मनोहर के दसों बीघे खेत पर उनके हल चलेंगे। दुखरन भगत काँप रहे थे कि मालूम नहीं क्या आफत आयेगी। डपटसिंह सोच रहे थे कि भगवान् करे मार-पीट हो जाये तो इन लोगों की खूब कुन्दी की जाय और बिसेसर साह थर-थर काँप रहे थे। केवल कादिर खाँ को मनोहर से सच्ची सहानुभूति थी। मनोहर की उद्दण्डता से उसके हृदय पर एक चोट-सी लगी। सोचा, मार-पीट हो गयी तो फिर कुछ बनाये न बनेगी। तुरन्त जाकर दयाशंकर के कानों में कहा– हुजूर हमारे मालिक हैं। हम लोग आप की ही रिआया हैं। सिपाहियों को मने कर दें, नहीं तो खून हो जायेगा। आप जो हुक्म देंगे उसके लिए मैं हाजिर हूँ। दयाशंकर उन आदमियों में न थे, जो खोकर भी कुछ नहीं सीखते। उन्हें अपने अभियोग ने एक बड़ी उपकारी शिक्षा दी थी। पहले वह यथासम्भव रिश्वत अकेले ही हजम कर लिया करते थे। इससे थाने के अन्य अधिकारी उनसे द्वेष किया करते थे। अब उन्होंने बाँटकर खाना सीखा था। इससे सारा थाना उन पर जान देता था। इसके अतिरिक्त अब वह पहले भी भाँति अश्लील शब्दों का व्यवहार न करते थे। उन्हें अब अनुभव हो रहा था कि सज्जनता केवल नैतिक महत्त्व की वस्तु नहीं है, उसका आर्थिक महत्त्व भी कम नहीं है, सारांश यह कि अब उनके स्वभाव में अनर्गलता की जगह गम्भीरता का समावेश हो गया था। वह इस झमेले में सारे गाँव को समेटकर अपना स्वार्थ सिद्ध करना चाहते थे। कान्स्टेबलों का अत्याचार इस उद्देश्य में बाधक हो सकता था। अतएव उन्होंने सिपाहियों को शान्त किया और बयान लिखने लगे। पहले चपरासियों के बयान हुए। उन्होंने अपना सारा क्रोध बलराज पर उतारा। गौस खाँ और उनके दोनों शहनों ने भी इसी से मिलता-जुलता बयान दिया। केवल बिन्दा महाराज का बयान कुछ कमजोर था। अब गाँववालों के इजहार की बारी आयी। पहले तो इन लोगों ने समझा था कि सारे गाँव पर आफत आनेवाली है, लेकिन विपक्षियों के बयान से विदित हुआ कि सब उद्योग बलराज को फँसाने के लिए किये जा रहे हैं। बलराज पर उसकी सहृदयता के कारण समस्त गाँव जान देता था। पारस्परिक स्नेह और सहृदयता भी ग्राम्य जीवन का एक शुभ लक्षण है। उस अवसर पर केवल सच्ची बात कहने से ही बलराज की जान बचती थी, अपनी ओर से कुछ घटाने या बढ़ाने की जरूरत न थी। अतएव लोगों ने साहस से काम लिया और सारी घटना सच कह सुनायी; केवल बलराज के कठोर शब्दों पर पर्दा डाल दिया। विपक्षियों ने उन्हें फोड़ने में कोई बात उठा न रखी, पर कादिर खाँ की दृढ़ता ने किसी को विचलित न होने दिया।

आठ बजते-बजते तहकीकात समाप्त हो गयी। बलराज को हिरासत में लेने के लिए प्रणाम न मिले। गौस खाँ दाँत पीसकर रह गये। दरोगा जी चौपाल से उठकर अन्दर के कमरे में जा बैठे। गाँव के लोग एक-एक करके सरकने लगे। डपटसिंह ने अकड़ कर कहा, गाँव से फूट न हो तो कोई कुछ नहीं कर सकता। दरोगा जी कैसी जिरह करते थे कि कोई फूट जाय।

दुखरन– भगवान चाहेंगे तो अब कुछ न होगा। मेल बड़ी चीज है।

मनोहर– भाई, तुम लोगों ने मेरी आबरू रख ली, नहीं तो कुशल नहीं थी।

डपटसिंह– लस्करवालों ने समझा था जैसे दूसरे गाँववालों को दबा लेते हैं, वैसे ही इन लोगों को दबा लेंगे।

दुखरन– इस गाँव पर महावीर स्वामी का साया है, इसे क्या कोई खाकर दबायेगा!

मनोहर– कादिर भैया, जब दोनों कान्स्टेबलों ने बालू का हाथ पकड़ा तो मेरे बदन में जैसे आग लग गयी। अगर वह छोड़ न देते तो चाहे जान से जाता, पर एक की तो जान लेकर ही छोड़ता।

डपट– अचरज तो यह है कि बलराज से इतना जब्त कैसे हुआ?

बलराज– मेरी तो जैसे सिट्टी-पिट्टी भूल गयी थी? मालूम होता था हाथों में दम नहीं है। हाँ, जब वह सब दादा से हाथापाई करने लगे तब मुझसे जब्त न हो सका।

दुखरन– चलो, भगवान की दया से सब अच्छा ही हुआ। अब कोई चिन्ता नहीं। यह बातें करते हुए लोग अपने घर गये। मनोहर अब भोजन करके चिलम पी ही रहा था कि बिन्दा महाराज आकर बैठ गये। यह बड़ा सहृदय मनुष्य था। था तो ज़मींदार का नौकर, पर उसकी सहानुभूति सदैव असामियों के साथ रहती थी। मनोहर उसे देखते ही खाट पर से उठ बैठा, बिलासी घर से निकल आयी और बलराज, जो ऊख की गँडेरियाँ काट रहा था, हाथ में गड़ासा लिये आकर खड़ा हो गया। आजकल ऊख पेरी जाती थी। पहर रात रहे कोल्हू खड़े हो जाते थे।

मनोहर ने पूछा– कहो महाराज, कैसे चले? चौपाल में क्या हो रहा है?

बिन्दा– तुम्हारा गला रेतने की तैयारियों हो रही हैं। दरोगा जी ने गाँव के मुखिया लोगों को बुलाया है और सबसे अपना-अपना बयान बदलने के लिए कहा है। धमका रहे हैं कि बयान न बदलोगे तो सबसे मुचलका ले लेगें। उस पर सौ रुपये की थैली अलग माँगते हैं। डर के मारे सबकी नानी मर रही हैं बयान बदलने पर तैयार हैं। सोचा चलकर तुम्हें खबर तो दे दूँ। ज़मींदार के चाकर हैं तो क्या, पर हैं तो हम और तुम एक।

मनोहर के पाँव तले से जमीन निकल गयी। बिलासी सन्नाटे में आ गयी, बलराज के भी होश उड़ गये। गरीबों ने समझा था, बला टल गई। अपने काम-धन्धे में लगे हुए थे। इस समाचार ने आँधी के झोंके की तरह आकर नौका को डावाँडोल कर दिया। किसी के मुँह से आवाज न निकली।

बिन्दा ने फिर कहा– सबों ने कैसा अच्छा बयान दिया था। मैंने समझा था, वह अपनी बात पर अड़े रहेंगे, पर सब कायर निकले। एक ही धमकी में पानी हो गये।

मनोहर– मेरे ऊपर कोई गरद दशा आई हुई है और क्या? इस लौंडे के पीछे देखें क्या-क्या दुर्गित होती है।

बिन्दा– रात तो बहुत हो गयी है, पर बन पड़े तो लोगों के पास जाओ अरज-विनती करो। कौन जाने मान ही जाएँ।

बलराज ने तनकर कहा– न! किसी भकुए के पास जाने का काम नहीं। यही न होगा, मेरी सजा हो जायेगी। ऐसे कायरों से भगवान् बचाएँ। मुचलके के नाम से जिनके प्राण सूखे जाते हैं, उनका कोई भरोसा नहीं। यहाँ मर्द हैं, सजा से नहीं डरते। कोई चोरी नहीं की है, डाका नहीं मारा है, सच्ची बात के पीछे सजा से नहीं डरते। सजा नहीं गला कट जाय तब भी डरने वाले नहीं।

मनोहर– अरे बाबा, चुप भी रह! आया है बड़ा मर्द बन के! जब तेरी उमिर थी तो हम भी आकाश पर दिया जलाते थे, पर अब वह अकेला कहाँ से लायें?

बिन्दा– इन लड़कों की बातें ऐसी ही होती है। यह क्या जानें, माँ-बाप के दिल पर क्या गुजराती है। जाओ, कहो-सुनो, धिक्कारो, आँखें चार होने पर कुछ-न-कुछ मुरौवत आ ही जाती है।

बिलासी– हाँ, अपनी वाली कर लो। आगे जो भाग में बदा है वह तो होगा ही।

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1 Comments

Gunjan Kamal

18-Apr-2022 05:27 PM

👏👌👌🙏🏻

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