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रतनगढ - कहानी दो जहां की (भाग 19)

निहारिका ने देखा समर अभी भी वहाँ मौजूद है। वह खड़ी हुई उसने अपनी पट्टी सम्हाली और धीरे धीरे आगे कदम बढाने लगी। वह दरवाजे तक पहुंची थी कि तभी एक बार फिर एक बंदर उसके आगे आकर चिंचियाने लगा। निहारिका समझ नही पाई ऐसा क्यूं हो रहा था उसके साथ। पिछली बार भी यहाँ आने पर उसके साथ ये हुआ था। और अब यहाँ जाने पर उसके साथ ये समस्या आ रही है। 

वह गुस्साई – क्या है? क्यूं हमारे ही रास्ते मे आकर खड़े हो जाते हैं ये। उसने कहा और वह थोड़ा पीछे हट गयी। उसके पीछे हटते ही वे एक बार फिर दीवार पर  जाकर चढ गये। निहारिका के साथ साथ समर और वह औरत दोनो ही हैरत मे पड़ गये। उनके लिये यह घटना सामान्य कतई नहीं थी। 

वह बंदर अब एक बार फिर जोर जोर से चिंचियाने लगा और एक निश्चित दिशा की ओर देखने लगा। निहारिका के साथ साथ बाकी सभी भी असमंजस थे आखिर वे इतना शोर क्यूं कर रहे थे। 

अब जो होगा वह हम देख ही लेंगे लेकिन हम यूं डर कर तो नही बैठ सकते न। हमे हमारी बहनो को भी तलाश करना है। न जाने वे कहाँ है। हमारा इस तरह डरना हर पल हमे उनसे दूर लेकर जा रहा है।

 निहारिका ने मन ही मन ये निश्चय किया और उसने आगे कदम बढा दिया। निहारिका की नजरे बंदर पर लगी थी और उसके कदम अपने आप बढ रहे थे। चलते हुए अचानक ही उसके कदम लड़खड़ाये और वह गिरते गिरते बची। वह महिला तुरंत उसके पास चली आई। 

महिला निहारिका को सम्हाल ही रही थी कि तभी अचानक से उसके हाथ हवा मे निहारिका के सामने हुए। निहारिका समझ नही पाई कुछ और उस महिला के हाथ से खून की बूंदे रिसने लगी। निहारिका और उस मददगार ने आश्चर्य से उसकी ओर देखा। उसके हाथो मे एक चाकू था जिस पर राजसी मोहर थी। और उसन वह चाकू तेजी से हवा मे उछाल दिया। तीर की तरह वह चाकू सीधा हवा मे उड़ा। और उनसे कुछ दूर खड़े एक व्यक्ति के सीने मे जाकर धंस गया। हवा मे उसकी चीख गूजी और वह नीचे गिरने लगा। 

समर को बहुत गुस्सा आ रहा था उसकी आंखे अजीब तरह से बदलने लगी। और वह तेजी से भीड़ चीरते हुए उसके पास पहुंचा। निहारिका और वह और वह औरत भी धीरे धीरे उसके पास पहुंची। 

क्यूं...? हम पर हमला क्यूं कुंवर वीरजीत.. निहारिका के मुन्ह से बमुश्किल शब्द फूटे।

समरजीत और उस औरत ने हैरत भरी नजरो से निहारिका की ओर देखा। निहारिका उसके पास बैठते हुए बोली – हमे ज्यादा नही पता आपके बारे मे लेकिन इतना पता है कि आप कुंवर वीरजीत है रतनगढ के नाकाबिल युवराज। जिन्होने अपने भाई के साथ मिलकर रतनगढ की बर्बादी मे सबसे अहम भूमिका निभाई।

वह कांपती आवाज मे कहने लगा – क्युंकि तुम हमारी कौम को खत्म करने की वजह हो निहारिका। कल रात तुम्हारा चेहरा देखकर ही मै समझ गया था कि तुम ही राजगुरू की बेटी हो कालिंद्री। वही जो इस शाप से मुक्ति का जरिया बनेगी। 

सुनकर ही निहारिका शॉक्ड रह गई। वह समझ ही नही पाई क्या हुआ ये। वह कारण बनेगी लेकिन कैसे और क्यूं? वहीं समर अचानक उठा और उसे लेकर तेजी से भीड़ मे गुम हो गया।  

निहारिका वहीं उसे भीड़ मे तलाशती रह गयी। जब निहारिका के कानो मे उस भली औरत की आह पड़ी तब वह उसे वहाँ से दरवाजे के अंदर ले गयी। वह औरत अब सामान्य हो चुकी थी और निहारिका से कह रही थी तुम्हे सावधान रहना होगा बेटी। यहाँ हर कदम पर तुम्हारे लिये खतरा है। तुम उन लोगो की नजर मे आ चुकी हो अत: अब तुम्हे हद से भी ज्यादा एहतियात बरतने की जरूरत है।

निहारिका ने सवालिया नजरो से उसकी ओर देखा। वह औरत चाकू एक तरफ रख हथेली पर मलहम लगाते हुए बोली – कुछ सवालो के जवाब केवल नियति देती है बेटी इंसान नही। 

निहारिका उसकी उलझी वातें सुन कर बोली – हमे एक नही कई सवालो के जवाब चाहिये और उनके जवाब हम समझ गये हैं कहाँ मिलेंगे। उन सवालो के जवाब मिलेंगे हमे रतनगढ पैलेस में। वह पैलेस जहाँ की दुनिया दो हिस्सो मे बंटी हुई उजाला और अंधकार। वहाँ घोर अंधकार है, जहाँ रहते है कुछ विचित्र प्राणी। अब हमे जाना होगा वहाँ तभी हमे आगे कुछ पता चलेगा। उसने वह चाकू उठा कर अपनी आंखो के सामने लगाया। उसने देखा उस चाकू पर राजसी मोहर उकेरी गयी है जिसे वह अच्छी तरह पहचानती है क्युंकि ये वही है जिसे उसने कुछ देर पहले ही देखा था।

निहारिका को सुन वह औरत हल्का सा घबराते हुए बोली, “नही आपको महल मे नही जाना चाहिये, बल्कि आपको वहाँ जाना चाहिये जहाँ रतनगढ की किस्मत बदली गयी।” लेकिन ....

अर्थात... 

वह औरत बोली – मै सही कह रही हूं रतनग्ढ के महल मे जाने पर तुम्हे सिर्फ नुकसान ही होगा कोई फायदा नही।

निहारिका निश्चय करते हुए बोली – कोई बात नही हम सम्हाल लेंगे अगर कोई समस्या आई भी तो। 

 ठीक है फिर मै भी साथ चलती हूं, अगर कोई समस्या आयेगी तो हम मिल कर देख लेंगे। इसमे तो तुम्हे कोई आपत्ति नहि होनी चाहिये। - उस औरत ने बड़े अपनेपन से कहा। उसे सुन कर निहारिका कुछ कह नही पाई। कही न कहीं वह भी महसूस कर रही थी उस औरत की बातो को। निहारिका को उस पर इतना यकीन हो चुका था कि वह उसे नुकसान तो नही पहुंचायेगी। 

ठीक है कहते हुए निहारिका धीरे धीरे वहाँ से महल की ओर दोबारा आने लगी। उसके साथ साथ वे बंदर भी दीवारो को फांदते हुए चल रहे थे। बड़े मंदिर के अहाते से निकल कर निहारिका और वे औरत एक बार फिर उस तिराहे पर थी जहाँ एक तरफ संगमरमर के किनारो वाली कृत्रिम नदी बह रही थी।

वे दोनो तेज तेज चल रहीं थी और उनके बायी तरफ बंदर की परछाई उनके साथ साथ थी। निहारिका को उनका इस तरह चलना थोड़ा अजीब तो लगा लेकिन फिर उसने उस महिला इसलिये नही पूछा कि कहीं वे उसे मुर्ख लड़की न समझ ले। 

खूबसूरत कमल को पार करते हुए जब वे उस जगह पहुंची जहाँ से रतनगढ महल पचास कदम की दूरी पर था तब तक एक बार फिर सांझ होने लगी थी। लगातार आगे चलने पर उन्हे सामने दिखा वह बड़ा दरवाजा जिसके गढ वाले धाम की ओर प्रवेश करने के बाद निहारिका उसी कंगूरे वाली गली मे मुड़ गयी। जहाँ वह पिछली बार गयी थी। 

तो आप रतनगढ से है? – निहारिका ने सपाट लहजे मे पूछा। 

हां, उसने जवाब दिया।

आप कब से हैं यहाँ ? 

उसने अजीब नजरो से निहारिका की ओर देखा। एक गहरी सांस ली जैसे उसे बहुत मेहनत करनी पड़ रही हो यह कहने में, फिर कहा  - यहीं रतनगढ की ही रहने वाली हूं। बस रतनगढ के बारे मे काफी हद तक जानती हूं। 

क्या.. फिर क्या आप हमे हमारी बहनो के बारे मे कुछ बता सकती हैं वे कहाँ है कैसी हैं। अगर आपको कुछ खबर हो तो प्लीज हमे उनके बारे मे कुछ खबर दीजिये।

निहारिका को सुन कर उस महिला ने उस तस्वीर के पास जाते हुए इतना ही कहा – तुम्हारी बहने बिल्कुल ठीक है, लेकिन मै अभी भी यही कहती हूं कि तुम्हे यहाँ नही रूकना चाहिए आपको यहाँ से बिन देर किये यहाँ से निकल जाना चाहिये कहते हुए अपने चारो ओर सतर्कता से देखा।

जारी...

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1 Comments

Swati chourasia

22-Jan-2022 12:08 PM

Very beautiful and interesting part 👌👌

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