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रतनगढ - कहानी दो जहां की (भाग 18)


समर को वहाँ न देख कर निहारिका बुरी तरह घबरा गई। उसका घबराना स्वाभाविक भी था। जब कुंवर उसके सामने ही थे तब भी वह उन्हे अपने आने की वजह नही बता पाई और उसने जब उन्हे अपनी बहनो के बारे मे बताया तब भी उन्होने कोई रियेक्ट नही किया। क्या इसका अर्थ ये है कि वे हमारी बहनो के बारे मे जानते हैं। और इस किताब के अनुसार इस शाप के हिस्से दार वे भी हैं।

 फिर उन्होने हमे साफ साफ क्यू नही बताया। हमारे सामने होने पर भी हमारी मदद क्यूं नही की उन्होने? और उस शाप से मुक्ति कैसे मिलेगी उन्हे। महागुरू ने तो हीर को उसका जरिया बनाया था लेकिन हम हीर नही निहारिका है। अब हम कुंवर समरजीत को कहाँ ढूण्ढे। हमे उनसे हमारी बहनो के बारे मे पूछना है सोचते हुए वह वहाँ से उठी और वहाँ से महल मे घूमने लगी।महल मे चलते चलते उसे एहसास हुआ वह बेकार मे ही कोशिश कर रही है कुंवर सा से मिलने की। अगर उन्हे हमसे मिलना ही होता तो वे हमारे सामने से जाते ही क्यूं। हम समझ गये है हमे क्या करना है हमे खुद से तलाश करना है हमारी बहनो को। न ही पुलिस न ही कोई और अब इसमे हमारी मदद कर सकता है। सोचते हुए निहारिका उस महल से बाहर चली आई।

सोच मे घिरी निहारिका एक बार फिर चलते चलते संगरमरमर के किनारो वाली कृत्रिम नदी के पास पहुंचती है और वहाँ से आगे चलती जाती है। उस समय न ही किनारो की खूबसूरती और न ही नदी मे खिले कमल उसके उलझनो से घिरे मन को शांत कर पाते हैं। किनारो से चलते हुए निहारिका कब एक तिराहे के पास पहुंच गयी उसे खुद खबर नही हुई। उसका ध्यान टूटा जब उसके कानो मे किसी की खिसियाहट भरी आवाज गूंजी।

 चींचीं दिमाग मे गूंजते ही निहारिका अपनी सोच से बाहर चली आई। उसने अपने आसपास देखा तो खुद को अलग जगह देख कर ही वह फिर से चौक गई। उसने आगे बढने के लिये कदम बढाया कि उसके सामने ही एक बड़ा बंदर उछलते हुए आया और आकर जोर से चिंघाड़ने लगा। 

हछ हछ... निहारिका ने सधे शब्दो मे कहा। लेकिन वह टस से मस नही हुआ। निहारिका ने ध्यान से देखा वह पुरा इलाका ही बंदरो से घिरा हुआ था। वह सोच रही थी जब हम हमारी बहनो के साथ इस इलाके से गुजरे थे तब यहाँ कोई भी जानवर तो क्या कोई पक्षी तक नही दिखा था हमे लेकिन अभी ये इतने सारे बंदर कहा से आ गये। निहारिका ने देखा वहाँ सभी बंदर उछल कूद कर रहे है सिवाय एक बंदर परिवार के।वे कुल तीन लोग है और तीनो ही बड़ी ही शांति से उसके पास वाली दीवार पर बैठे हुए हैं।

 निहारिका ने अपने कदम पीछे खींच लिये और उनके निकलने का इंतजर करने लगी। उसके पीछे आते ही वह नीचे आया बंदर वापस उसी दीवार पर जाकर वैठ गया। और अब उस दीवार पर तीन की जगह चार बंदर दिख रहे थे चारो ही शांत हो कर बैठे हुए थे कुछ ऐसे जैसे शरारतो से उनका दूर दूर तक कोई नाता नही हो। 

निहारिका ज्यादा कुछ समझ नही पाई लेकिन उसकी समझ मे इतना जरूर आ गया था कि इतना ज्यादा शांत रहना बंदरो के स्वभाव मे नही होता है। उछल कूद करना एक टहनी से दूसरी तक जाना, बच्चो के साथ फांदना, ज्यादा कुछ नही तो अपने सर को खुजाना, बच्चो के सर के जुए बीनना जो कि उनका पसंदीदा काम होता है। जबकि वे ऐसा कुछ भी नही कर रहे थे। निहारिका ने उन्हे एक बार फिर अपने ख्यालो से परे झटका और वह एक बार फिर आगे बढने लगी। उसके ऐसा करने की देर थी कि एक बार फिर दीवार फांदते हुए एक और बंदर चिंचियाते हुए उसके सामने चला आया और उसके आगे आ आ कर उसे डराते हुए उसके कदमो को पीछे धकेलने लगा।

 निहारिका चीखी और चीखते हुए पास ही बने एक घर की चौपाल पर जाकर चढ गयी।  वह एक बार फिर जाकर दीवार पर बैठ गया। निहारिका असमंजस सी वहीं रह गयी और आते जाते राहगीरो को देखने लगी। वह ये देख कर हैरान हो रही थी कि वहाँ से अन्य लोग बड़ी आसानी से निकल रहे है उनके साथ कोई कुछ नही कर रहा है लेकिन जब वह आगे बढना चाह रही है तो समस्याये आ रही हैं। अखिर ऐसा क्यूं? 

एक बार और देखे शायद अब हम निकल सकें सोचते हुए निहारिका एक बार फिर नीचे उतरी और उसने आगे कदम बढाये। लेकिन हर बार की तरह वह फिर उलझ गयी। जब वह फिर दीवार से उतरने लगा।
वह उतर कर आया ही था कि तभी उसके सामने दो केले आकर गिर पड़े। निहारिका चौंक गयी उसने पीछे मुड़ कर देखा। उसके पीछे चौड़े माथे पर लाल बड़ी बिंदी लगाये लाल साड़ी पहने एक औरत खड़ी हुई थी जो थोड़ी अलग दिख रही थी। उसके चेहरे पर गजब की शांति थी और व्यक्तित्व मे अजीब सा आकर्षण।

निहारिका एक पल को स्तब्ध हो गयी। लेकिन अगले ही पल वह सामान्य होते हुए उसने उस महिला को धन्यवाद कहा और निहारिका वहाँ से निकल गयी। लेकिन चलते हुए निहारिका के मन से उन बंदरो की हरकते नही निकल पा रही थीं। कुछ आगे चलते हुए निहारिका एक ऐसी जगह पहुंची जहाँ गलियो मे काफी भीड़ थी। इतनी कि वह अच्छे से चल भी नही पा रही थी। दोपहर ढल रही थी और निहारिका ये देख कर हैरत मे पड़ रही थी रतनगढ जैसी जगह पर भी इतनी सारी भीड थी। 

ये एक बार की नही हर रोज की बात है बेटी – उसके पीछे से आवाज आई।

निहारिका ने पलटकर देखा – जी कौन? वहाँ वही औरत खड़ी हुई थी जिसके माथे पर लाल बड़ी बिंदी थी। 

वह मुस्कुराई – मै एक पुजारिन देवी की आराधना करती हूं यही पास ही के मंदिर मे – उसने कहा और निहारिका के सर पर हाथ फिराया – वैसे तुम भी यहाँ की नही हो, घूमने आई हो यहाँ।

निहारिका थोड़ी खामोश हुई फिर बोली – जी, गढ वाले महाराज के धाम मे। किंतु अभी तक उनके दर्शन नही हो पाये तो बस वही जाउंगी। शाम का इंतजार कर रही थी क्युंकि मम्मी का कहना है भगवान के घर अगर सुबह और शाम को जाये तब ठीक रहता है कुसमय नही जाना चाहिये।

अच्छा है यह तो। चलो तब तक तुम देवी मां के ही दर्शन कर लो। वैसे भी रतनगढ मे काफी मंदिर है और सभी एक से बढकर एक हैं।

जी नही आंटी जी, हम बस थोड़ा बाजार घूमना चाहेंगे कहते हुए निहारिका ने चारो ओर देखा। वह महिला पास ही स्थित देवी मंदिर चली गयी।

 कई सारी गलियो वाले रतनगढ की उस मुख्य गली मे कई लोग इधर से उधर कतारो मे जा रहे थे। वे सभी अलग अलग गलियो मे निकल जाते लेकिन उनकी कतारे नही टुटती। निहारिका उन्हे बड़े ध्यान से देख रही होती है कि तभी उसकी चीख निकल पड़ती है और वह अपनी दायी बान्ह पकड़ कर उसे देखती है। निहारिका ने देखा उसकी बान्ह मे कोहनी के ऊपर एक चाकू धंसा हुआ है जिससे उसे गहरा घाव हो चुका है। खून लगातार रिसता ही जा रहा है निहारिका खून देख कर बुरी तरह घबरा जाती है वह लड़खड़ाती है।

सम्हल के निहारिका... उसके कानो मे पहचानी सी आवाज गूंजी। निहारिका को ये देखकर हैरानी हुई कि उसके सामने कुंवर समरजीत खड़े हुए थे। 

वे उसे सम्हाल कर भीड़ से एक ओर ले जाने लगे। निहारिका को ऐसा लगा जैसे अपने सवालो को पाने की उसकी उम्मीद फिर से बंध रही हो। पहले किये गये सारे निर्णय उसने परे करते कुंवर से सवाल किया – आप वहाँ से चले क्यूं गये कुंवर समर? हमे आपकी मदद की  जरूरत है।और हम आपको ही तो तलाश करते हुए वहाँ तक पहुंचे थे। आप मिले भी और गायब भी हो गये ऐसा क्यूं? आप ही तो हमारी आखिरी उम्मीद हो... वह एक ही सांस मे बोल गयी। 

समर कुछ नही बोले – वे थोड़ा और आगे जाकर एक बड़े से दरवाजे के सामने पहुंचे जहाँ पहुंच कुंवर ने किसी को आवाज लगाते हुए कहा, “सुनिये, इन्हे मदद की जरूरत है।” 

उसकी आवाज सुन कर वही औरत बाहर निकल आई जिसके माथे पर लाल बड़ी बिंदी थी। उसने निहारिका को घायल देखा तो उसे सहारा देकर फौरन दरवाजे से अंदर ले गयी। समर जीत एक बार फिर दरवाजे पर ही खड़ा रहा गया। निहारिका ने पलटकर देखा।

अंदर आ जाओ। 

नही, यही ठीक हैं।

ठीक है जैसा आपको ठीक लगे, लेकिन हमे आपसे बहुत सी बाते करनी है प्लीज आप कहीं जाना नहीं। हमे आपकी मदद की जरुरत है।

समर ने कुछ नही कहा और बदले मे मुस्कुरा दिया। वह औरत निहारिका को अंदर ले गयी वही दरवाजे के सामने ही एक विशाल देवी प्रतिमा थी जिसे देख कर निहारिका को बिल्कुल डर नही लगा। वह आराम से उन्हे निहारती रही और वह महिला अपना काम करती रही। निहारिका को इस बात का भी इल्म नही हुआ कि कब उसने उसके जख्म पर मलहल लगाकर पट्टी कर दी।

हो गया बेटी अब तुम ठीक हो – उस महिला ने कहा तो निहारिका ने चौंकते हुए उसकी ओर देखा।

हम्म, देखो अपनी हाथ की तरफ कहते हुए उसने पट्टी दिखलाई तब जाकर निहारिका मुस्कुराई और उन्हे धन्यवाद कह उसने तुरंत दरवाजे की तरफ देखा। समर अभी भी वही खड़ा हुआ था।

जारी...

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5 Comments

Shnaya

03-Apr-2022 02:21 PM

Very nice 👌

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Swati chourasia

13-Jan-2022 05:06 PM

Very beautiful 👌👌 and interesting story waiting for next part

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Arjun kumar

13-Jan-2022 04:58 PM

Nice story

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