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रतनगढ - कहानी दो जहां की (भाग 17)

भाग

तसवीर देख कर निहारिका का दिमाग सुन्न हो गया। उसने एक बार फिर मुड़कर देखा। समर अभी भी वहीं खड़ा हुआ था। वह पलटी और उसने तस्वीर को देखा।

उसके माथे से पसीना आने लगा। वह एक बार फिर घबराते हुए पीछे आई। वह हड़बड़ाते हुए बोली – आप उस तस्वीर मे कैसे...? फिर आप यहां? वह कुछ समझ नही पा रही थी अपनी बात वह कैसे कहे। लेकिन समर सब समझ रहा था। 

निहारिका के मन की उलझन समझते हुए वह बोला, “ इस किताब को पूरा पढने के बाद आप खुद ब खुद समझ जायेंगी थोड़ा धैर्य रखे।” 

निहारिका भी अपने साथ घट रही अजीब सी घटनाओ से कुछ हद तक परेशान हो चुकी थी। वह एक बार फिर कुर्सी पर बैठ गयी। समर ने उसे किताब वापस लाकर पढने को दी और वह आगे पढने लगी।

हीर पड़ोसी राज्य की राजकुमारी थी और राजकुमार समरजीत की भावी पत्नी थीं। उनके अमूल्य गुणो के कारण ही उनका नाम हीर रखा गया। वे युद्ध कला मे पारंगत थी। हीर और कालिंद्री का बचपन साथ ही बीता था। उनमे घनिष्ठ मित्रता थी और सखियो सा प्रेम था।

 राजपरिवार का एक कुल नियम यह था कि प्रत्येक महाशिवरात्रि की रात्रि राजपरिवार के सभी सदस्यो को अपने कुल देवता की आराधना के लिये एकत्रित होकर प्राचीन शिव मन्दिर जाना अनिवार्य था। किंतु पिछले दो वर्षो से ऐसा नही हो पा रहा था। क्युंकि युवराज वहाँ तक जाते अवश्य थे किंतु मंदिर की सीढियो तक पहुंचने के पश्चात वह वापस चले आते थे। 

हीर कालिंद्री, समरजीत सभी राजपरिवार के सद्स्यो के साथ जब शिव मंदिर पहुंचे तब भी युवराज ने ऐसा ही किया और वे वहाँ से वापस आने लगे। महाराज और राजपंडित ने उन्हे खूब रोका किंतु वे नही रूके और चले आये। तब राजपंडित जी ने राज्य को बचाने के लिये अपनी पुत्री कालिंद्री के सामने अपनी दुविधा रखी। कालिंद्री यह सुनकर ही गुस्सा गयी अपने पिता पर।उसने स्पष्ट मना कर दिया और वह हीर के साथ वहाँ से अपने कक्ष मे चली आई। किंतु ये बात यहीं खत्म नही हुई। राजभक्ति से मजबूर एक पिता ने अपनी पुत्री की नरबलि का निश्चय कर ही लिया था और गुप्त रूप से उसकी सारी तैयारी भी कर ली। किंतु कालिंद्री की सखी राजकुमारी हीर को इसकी खबर लग गई और उसने कालिंद्री की जगह खुद को पहुंचाने का विचार किया। चुंकि राजकुमार के साथ विवाह का सम्बंध निश्चित होने से वह एक तरह से अर्धकुमारी की श्रेणी मे आ चुकी थी।

 इसीलिये उसने हर तरह से इस निर्णय को सही ठहराया और किसी को भी इसकी भनक नही लगने दी। हालांकि वह ऐसा कर नही पाई। क्युंकि उसी समय उसे खबर मिली समरजीत किसी युद्ध के सिलसिले मे कूच करने वाले हैं। ऐसे हालात मे राज्य संचलान की सारी जिम्मेदारी उसके ही कन्धे पर आ चुकी थी। होलिका के दहन के पश्चात जब पहली अमावस्या आई तब कालिंद्री को मूर्छित कर उस जगह ले जाया गया जहाँ नरबलि की सारी तैयारिया की गई थी। निहारिका देख कर ही कांप गई वह बिल्कुल अजीब जगह थी एक पुरानी गुफा के जैसी। जिस पर एक चट्टान थी जहाँ कालिंद्री को ले जाया जा रहा था।

दूसरी तरफ हीर को बैचेनी हो रही थी उसका मन नही लग रहा था और वह बिन किसी को बताये सबसे तीव्र घोड़े को लेकर वहाँ से कालिंद्री के पास जाने को निकल आई थी और जब कालिंद्री को मूर्छित कर ले जाया जा रहा था तब वह भी उनसे छुपते छुपाते उचित अवसर की प्रतीक्षा मे साथ चल रही थी। किंतु उसे कोई उचित अवसर नही मिला और कालिंद्री उस जगह तक पहुंचा दी गयी। कालिंद्री होश मे आ चुकी थी। और उस अनजान जगह पर खुद को देख कर वह बुरी तरह घबरा कर चीखने लगी। हीर को उसकी चीख सुनकर बहुत तकलीफ हो रही थी। किंतु वह सिवाय देखने के कुछ भी नही कर पा रही थी। वही कालिन्द्री की किस्मत बुलंदीयो पर थी या फिर रतनगढ का दुर्भाग्य। 

कालिन्द्री की चीख उस गुफा के दूसरे हिस्से मे तप कर रहे राजपंडित जी के गुरूदेव के कानो मे पड़ी। उनका कोमल हृदय द्रवित हुआ और उनकी तपस्या भंग हो गयी। वे उसकी आवाज सुनकर वजह तलाशते हुए उस जगह आ पहुचे जहां कालिंद्री मौजूद थी। वही दूसरी तरफ से हीर उसके पास पहुंची। गुरूदेव बहुत क्रोध मे आ गये जब उन्हे पता चला उनका ही एक शिष्य किसी के मर्जी के बिन नरबलि देने के लिये सजग था। उन्होने आवेश और क्रोध के मिश्रण से वहाँ सभी को श्राप दिया वे सभी नरबलि जैसा पाशविक कार्य कर रहे थे अत: रतनगढ का राजपरिवार और वहाँ मौजूद सभी पुरूष सदस्य तुरंत ही इंसान और जानवर के बीच की कड़ी बनेंगे। इतना ही नही इनकी आने वाली अगली पीढी भी इसी श्राप से ग्रस्त होगी। और इनका वह महल बुरी तरह वीरान हो जायेगा। लोग उस महल मे जाने से भी कतरायेंगे। इतना कहकर वे रूके और वहाँ से जाने लगे। 

हीर के कदमो तले जमीं खिंच गयी और वह गिड़गिड़ाते हुए महागुरू की शरण मे आ गिरी। बहुत अनुनय करने पर उनके हृदय पिघला और उन्होने कहा तुम ही इस जिस तरह तुमने इस राज परिवार का हिस्सा न होने पर भी मुझसे इसके कल्याण के लिये अनुनय की है उससे प्रभावित होकर मै ये आशीष देता हूं समय आने पर इस श्राप मुक्ति का एकमात्र निवारण सिर्फ तुम होगी हीर। और इसमे ये लड़की और इसका पूरा परिवार तुम्हारी सहायता करेगा। महापंडित जी कहा और वह वहाँ से चले गये। ये उनके श्राप का ही ये असर था कि उसी समय राजपरिवार के सभी सदस्य एकाएक गायब हो गये। और वहाँ दिखाई देने लगे अजीब से प्राणी। उन्होने अचानक ही कालिंद्री और हीर पर वार कर दिया। जिसमे कालिंद्री ने तुरंत प्राण त्याग दिये किंतु हीर की सांसे चल रही थी। वह वही एक ओर पड़ी थी और मदद के लिये गुहार चारो ओर देख रही थी। उसकी सांसे डूबती जा रही थी और वह धीरे धीरे मृत्यु को प्राप्त हो गयी।

निहारिका ने देखा काफी देर बद जब महा पंडित एक बार फिर वहाँ आये और उन्होने दोनो को मृत देखा तब उन्होने कालिंद्री और निहारिका के शरीर पर एक लेप लगाया वह कुछ पीला सा था उसके लगाते ही एक अजीब सी खुशबू फिजा मे फैलने लगी थी जिसे निहारिका भी महसूस कर पा रही थी।

इसकी खुशबू तो बिल्कुल चंदन जैसी है मनमोहक और निर्मल। उन्होने वहाँ मौजूद सामान की तलाशी ली। राजपंडित के थैले मे उन्हे कुछ राजसी निशान अंकित पत्र  मिलते हैं। तो वही युवराज के वस्त्रो मे उन्हे एक राजसी मुद्रा मिलती है। जिसे वह उठा कर उन दोनो के शरीर पर अंकित करते हुए कुछ बुदबुदाते हैं। जब उनका कार्य पूरा हो जाता है तब वे उन दोनो का अंतिम संस्कार करते हुए वहाँ से चले जाते है।
निहारिका बुरी तरह घबरा गयी थी। वह समझ ही नही पा रही थी कि ऐसा क्यूं किया उन्होने....उसके मन मे हजारो सवाल घूमने लगे थे और उनके जवाब उसके पास नही थे। जवाब पाने के लिये उसने एक बार फिर समर की ओर देखा। लेकिन उसे वहाँ न देख कर वह बुरी तरह चौक गयी। ये कब गये यहां से, और महागुरू जी आखिर उन्होने ऐसा क्यु किया? और समर ही कुंवर सा है यानी कुंवर समरजीत सिन्ह... तो क्या वे आवाजे उन्ही लोगो की है जो इस श्राप का हिस्सा है? उसका सर बुरी तरह चकरा रहा था लग रहा था जैसे अभी उसका सर फट पड़ेगा। उसे ऐसा लग रहा था जैसे उसका सर जोर से घूम रहा हो गोल... गोल.. । 
जारी...

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5 Comments

Shnaya

03-Apr-2022 02:20 PM

Very nice 👌

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Swati chourasia

12-Jan-2022 08:47 PM

इसका मतलब हीर ही निहारिका थी? बहुत ही अच्छी कहानी मजेदार 👌👌

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Anuj sharma

12-Jan-2022 02:07 PM

Nice

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