लाइब्रेरी में जोड़ें

रतनगढ - कहानी दो जहां की (भाग 15)

निहारिका किताब को देख ही रही होती है कि तभी उसके कानो मे एक रौबदार आवाज पड़ी, “वो आपकी नही है, आप अभी तक यहीं हो? 

निहारिका ने चौंकते हुए उसकी ओर देखा। उसे देख कर वह निशब्द हो गयी। वह उसे कैसे भूल सकती थी भले ही कम रोशनी थी लेकिन वह वही है जो उसे कुछ देर पहले मिला था समर... वहाँ उस अंधेरे हिस्से मे – उसने सोचा और बोली,

“आ... हाँ। हम ही है, हम अभी जा भी नही सकते क्युंकि हमारा मकसद पूरा नही हुआ है” उसने कहा और एक बार फिर किताब को देखने लगी।

“कैसा मकसद... जब जान बचेगी तभी तो कोई मकसद पूरा होगा आपका।” उसने कहा और किताब ले कर वापस रो मे रखने लगा।

वो हम आपको नही बता सकते, लेकिन इस किताब का टाइटल अजीब है, “क्या रतनगढ पर वाकई किसी का श्राप है?” निहारिका ने सवाल किया। 

समर ने हैरानी से उसे देखा। उसके इस अन्दाज मे कई सवाल थे जिन्हे निहारिका समझ नही पा रही थी।

“क्या हुआ... रतनगढ का शापित इतिहास यही लिखा है न उस पर? इसमे इतना चौंकना क्यू है” निहारिका ने बेफिक्री से कहा और वह किताब उठाकर एक बार फिर खोलने लगी।

समर ने इस बार उसे नही टोका और उसके हाव भावो पर नजर रखने लगा।वह मन ही मन सोच रहा है “क्या सिर्फ ये एक सन्योग है या फिर वाकई वो समय आ गया है जब महल का श्राप खत्म हो जायेगा।

निहारिका गौर से उसे पढ रही थी।समर बोला, “क्या आपको इसके अक्षर समझ आ रहे हैं या फिर बस चित्र देख रही हो?” 

नही, दरअसल हम सोच रहे हैं कि क्या वाकई मे रतनगढ का इतिहास इतना काला है कि महज अकाल दूर करने के लिये किसी की भी जान देने पर आमादा हो गये रतनगढ के महाराज? 

समर ठंडे पन से कहने लगा, “रतनगढ का वाकई दुर्भाग्य है ये कि सब कुछ होने के बावजूद भी उसे ये दिन देखना पड़ा। क्या आप जानती हैं कि यह किताब किसने लिखी और किस समय लिखी गयी है?” 

  “शायद नही, लेकिन जिस तरह आप इसके बारे मे बात कर रहे हैं उससे हम ये जरूर समझ गये हैं कि आप इसके बारे मे काफी अच्छी तरह जानते हैं।”

हां, मै जानता हूं, लेकिन पहले मै यह जानना चाहता हूं कि इतनी सुरक्षा होने के बावजूद भी आप महल के इस हिस्से मे कैसे चली आईं?- कहते हुए समर ने हल्की सी सिसकी ली और एक बार फिर सामान्य होकर निहारिका की ओर देखने लगा।

निहारिका के मन मे एक बार फिर सारी घटनाये घूम गईं। वह सिहरते हुए बोली, “यहां शायद इतने पुख्ता इंतजामात नही है जितने कि होने चाहिये क्युंकि अगर ऐसा होता तो निश्चित ही आप भी यहाँ नही होते।”
समर ने अपनी नजरे निहारिका के जवाब पर गड़ाई। निहारिका बोली, “आपने हमे बताया नही?” 

“हां, बताता हूं, रतनगढ की ये किताब यहाँ के राज पंडित जी ने तब लिखी। जब रतनगढ अकाल से ग्रस्त था और शापित हो चुका था। इस किताब की खास बात ये है कि यह किताब रतनगढ के शापित इतिहास मे लिप्त हिस्सेदारो को पहचान सकती है। क्युंकि इसे वही पढ सकता है जो रतनगढ के इतिहास का हिस्सा हो। इतना ही नही जरूरत पड़ने पर ये किताब उस शख्स को उस इतिहास के सामने ले जाकर खड़ा कर देगी जब ये सब घटित हुआ” – इतना कहकर समर रूक गया और निहारिका के चेहरे की ओर देखने लगा।

क्या मतलब है आपका...? निहारिका ने सवालिया नजरो से समर की ओर देखा। वह खड़े खड़े थकान अनुभव कर रही थी सो उसने वही पास ही पड़ी टेबल पर जाकर बैठ गई और जवाब का इंतजार करने लगी।

मतलब आप समझ जायेंगी आप इस किताब को पढे, फिर शायद मुझे कुछ बताने कि जरूरत ही न पड़े – समर भी उसके पीछे चला आया।
ठीक है – कहते हुए निहारिका ने अपनी नजरे किताब मे गढा ली।

****

रतनगढ हर तरह से सम्पन्न राज्य, जो इतना सम्पन्न था कि जहाँ की प्रजा राज्य छोड़ कर जाने के बारे मे कभी सोचा नही करती थी। रतनगढ के शाप की शुरूआत जानने से पहले रतनगढ के इतिहास को जान लेना चाहिये। राजवंशियो की शान को बरकरार रखता रतनगढ की नीव रखी गई थी राजा विक्रमजीत के हाथों। 

जब उन्होने अपने शासनकाल मे सबसे महत्वपूर्ण विजय से एक पड़ोसी राज्य नवलगढ पर विजय प्राप्त की थी। इस विजय के बाद अपने राज्य वापस लौटते समय सेनानायक युवराज कुंवर सूर्यजीत ने थककर एक पहाड़ी के नीचे शिविर लगवाया। रात्रि का गहन अंधकार था और युवराज सूर्यजीत समस्त सैनिको के साथ बेसुध होकर विश्राम कर रहे थे। इस दौरान युवराज सूर्यजीत सिन्ह ने एक अजीब सा स्वप्न देखा, उन्होने देखा उनका राज्य प्राकृतिक आपदा का शिकार हुआ है साथ ही राज्य मे तेज हवाओ के साथ घनघोर बारिश ने आतंक मचाया हुआ है। प्रजा हाहाकार करते हुए इधर से उधर दौड़ रही है। 

पूरा राज्य अस्त व्यस्त हो चुका है। राज्य की सीमा मे बहने वाली नदी अपनी सीमाये तोड़ चुकी है और वह तेजी से अपना दामन राज्य मे पसार रही है। जिससे उसके किनारे बनी छोटी बड़ी झोपड़ी तिनके की तरह उड़ कर बही जा रही हैं। यहाँ तक कि पैलेस मे रहने वाले सभी सदस्य बरसात से तो सुरक्षित हैं लेकिन नदी का बहने वाला पानी उनकी हर उम्मीद को डुबाता जा रहा था। एक नाविक उस भीषण पानी मे नाव से गुजरते हुए चिल्लाता जा रहा था “जान बचानी है तो गढ वाले महाराज के पास चलो वो उंची पहाड़ी पर” वह हर किसी से ये कहता जा रहा था और तेजी से नाव चला रहा था। इसके बाद युवराज सूर्यजीत की आंख खुल गयी और वह हड़बड़ा कर उठ बैठे। वे पसीना पसीना हो गये थे और वहाँ बुरी तरह हाँफ रहे थे। काफी देर बाद वे सम्हल पाये इससे कि ये सब एक बुरा ख्वाब था।

सूरज की किरणे निकलने पर उन्होने अपने शिविर के साथ अपने राज्य की ओर कूच किया। किंतु राज्य की सीमा तक पहुंचते पहुंचते उनके चेहरे पर चिंता की लकीरे दिखने लगी जब उन्होने आसमान मे घने काले मेघो को देखा। हवाओ के बदलते रूख को महसूस करने पर उन्होने फौरन एक सिपाही के जरिये महाराज को संदेश भिजवाया “सभी लोग राज्य जल्द से जल्द छोड़कर गढ वाले महाराज वाली पहाड़ी पर चल कर शरण ले, ये सभी के लिये हितकर होगा।” और वे खुद गढ वाले महाराज की पहाड़ी की तरफ कूच कर गये। जब वे वहाँ पहुंचे तब वहाँ केवल एक छोटा सा मंदिर था बाकि जगह समतल थी। उन्होने सैनिको के जरिये वहाँ जगह जगह शिविर लगवा दिये और जगह स्वच्छ कर सबके ठहरने लायक बना दिया। दोपहर तक वहाँ सभी लोग आ चुके थे। उस रात आसमान का कहर चारो ओर बरपा था। लेकिन पहाड़ी पर होने के कारण पूरा राज्य सही सलामत बच गया। इसे सभी ने गढ वाले महाराज की कृपा समझी और नये महल रतनगढ के निर्माण के समय उस मंदिर को भी महल मे शामिल कर लिया गया। लेकिन उसे आम जनता के लिये हमेशा खुला रखा गया जिससे किसी को भी उनके दर्शन और पूजन करने मे समस्या न आये। 
निहारिका ने किताब बंद करते हुए एक गहरी सांस छोड़ते हुए कहा, “तो ये कारण है रतनगढ के बसने का।”

हां, ये ही है एक कारण – समर ने कहा और वह भी आकर टेवल पर बैठ गया। निहारिका ने एक बार किताब के पन्नो को पलटा और आगे पढने लगी – 

महाराज विक्रमजीत के बाद युवराज कुंवर सूर्यजीत सिन्ह ने राज्य की बागडोर सम्हाली। उनके बाद उनके पुत्र कुंवर प्रताप सिन्ह और उनके बाद कुंवर प्रसेनजीत सिन्ह का शासन काल चला। प्रसेनजीत सिन्ह के हाथ मे बागडोर आते आते राजवंश मे कुछ एक बुराइया जन्म ले चुकी थी। मसलन हुक्का पान और मदिरा पान जैसा दुर्व्यवसन।

जारी....

   13
2 Comments

Shnaya

03-Apr-2022 02:20 PM

Nice part 👌

Reply

Swati chourasia

12-Jan-2022 08:18 PM

Very beautiful and interesting part 👌👌

Reply