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रतनगढ - कहानी दो जहां की (भाग 13)

 उस सन्नाटे में उसक दिल की बढ़ी हुई धड़कनें उसके साथ-साथ उसके मददगार को भी साफ-साफ सुनाई दे रही थी।


"आप परेशान ना हों। मैंने आपसे कहा ना कि मुझे सब दिखाई दे रहा है! आप बस यहाॅ॑ से चलें। ये जगह आपके लिए बिल्कुल सही नहीं है। मैं करता हूॅ॑ ना आपकी मदद यहाॅ॑ से बाहर निकलने में !" मददगार ने उसका हौसला बढ़ाते हुए कहा।


उसकी बात सुनकर निहारिका के घबराए हुए कदम एकदम से रूक गए। घबराहट में अपने निचले होंठ को दाॅ॑तो से दबाए हुए उसने कुछ सोचा और फिर पीछे मुड़कर उस मददगार की ओर देखने लगी। निहारिका ने अपने फोन की रोशनी उसकी तरफ नहीं की थी इसलिए अंधेरे में उसकी एक धूमिल सी छवि ही दिखाई दे रही थी।


"क्या हुआ? आप मुझे इस तरह क्यों देख रही हैं?" मददगार ने निहारिका को अपनी तरफ इस तरह देखने पर झिझकते हुए पूछा। निहारिका ने एक तीखी नजर उस पर डाली और फिर वापस मुड़कर अपने सिर को हिलाते हुए बोली, "कुछ नहीं!"


"तो फिर जल्दी चलिए यहाॅ॑ से!" मददगार की आवाज में घबराहट थी।


अभी उन दोनों ने दो-चार कदम ही आगे बढ़ाए थे कि अचानक कुछ अजीब सी आवाजों ने निहारिका के कदम फिर से रोक दिए। निहारिका के अचानक रुक जाने की वजह से उसका मददगार उससे आ टकराया, जिससे एक बार फिर निहारिका असंतुलित होकर गिरने को हुई और एक बार फिर उस मददगार ने तेजी से आगे बढ़कर उसे गिरने से बचा लिया। निहारिका के फोन की रोशनी उन दोनों के ही चेहरे पर पड़ रही थी। कुछ तो अलग था उन दोनों के ही स्पर्श में, जिसे वे दोनों ही महसूस कर पा रहे थे। कुछ पलों को वे दोनों ही भूल गए कि वे मुसीबत में फॅ॑से हुए थे और उसी तरह एक-दूसरे की ऑ॑खों में खोए रहे। शायद सब कुछ वैसा ही रहता, मगर एक बार फिर एक दिल दहला देने वाली आवाज उन दोनों के ही कानों में पड़ी, जिससे उन दोनों का ध्यान एक-दूसरे से हटकर उस आवाज की ओर चला गया। दोनों ने ही झेंपते हुए अपनी स्थिति ठीक की।


"ये कैसी आवाजें हैं?" निहारिका ने आवाज की दिशा में उस अंधेरे में अपनी ऑ॑खें गड़ाते हुए कहा।


"कोई आवाज नहीं है। चलिए यहाॅ॑ से!" मददगार की आवाज में घबराहट बढ़ गई।


उसने इतना कहा ही था कि एक बार फिर किसी जानवर की चिंघाड़ने और साथ ही किसी के कराहने की भी आवाजें आई।


"नहीं! नहीं! कोई तो है और लगता है कि वह मुसीबत में है। हमें उसकी मदद करनी चाहिए।" निहारिका ने विचलित स्वर में कहा।


"मदद! आप अपनी मदद तो कर नहीं पा रही हैं, तो दूसरे की क्या खाक करेंगी। यह अंधेरे की दुनिया है, जिसकी स्याही सब कुछ निगल जाती है। यहाॅ॑ चारों ओर भ्रम फैला हुआ है। इसके जाल में एक बार फॅ॑स गए, तो फिर ईश्वर भी हमारी कोई मदद नहीं कर पाएगा।" मददगार ने उसे सचेत करते हुए कहा।


"तब तो आप ईश्वरीय शक्ति और उसकी महिमा से सर्वथा अनभिज्ञ हैं।" निहारिका के स्वर में उलाहना स्पष्ट सुनाई दे रही थी।


"अनभिज्ञ नहीं! पर इतना जरुर जानता हूॅ॑ कि जो सही समय पर सही फैसले लेकर अपनी मदद करना चाहते हैं ईश्वर भी उन्हीं की मदद करता है ना कि उनकी.. जो जानबूझकर मुसीबत में फॅ॑सना चाहते हैं। आप जो भी सुन रही हैं, वो बस एक भ्रम है और अगर नहीं भी है, तो भी आप कुछ नहीं कर सकतीं।" कहते कहते अचानक ही मददगार रुक गया और चौंककर अंधेरे में एक ओर देखने लगा। उसकी इस हरकत ने निहारिका को भी चौंका दिया और वह भी उसकी नजरों का अनुसरण करते हुए अंधेरे में देखने की कोशिश करने लगी।


"जल्दी चलिए! वो पास आ रहे हैं।" गहरी साॅ॑से लेता हुआ वह मददगार बोला।


"कौन! कौन पास आ रहे हैं?" अब निहारिका की आवाज में भी घबराहट और ज्यादा बढ़ गई थी।


"बातें करने का समय नहीं है। चलिए जल्दी!" इतना कहकर उसने निहारिका का हाथ पकड़ा और अंधेरे में ही एक दिशा में दौड़ लगा दी। हक्की बक्की निहारिका बस उसके साथ दौड़ी जा रही थी। अब उसे भी कई जोड़ी पैरों के धमकने की आवाजें लगातार पास आती हुई सुनाई दे रहीं थीं। अपने मददगार की बदहवासी और उन आहटों की वजह से निहारिका को ये समझ आ गया कि वे दोनों इस समय बहुत बड़ी मुसीबत में फॅ॑स चुके थे और अब मददगार की बात मानने के अलावा उसके पास और कोई रास्ता नहीं। वे दोनों उसी तरह बिना रुके दौड़ ही रहे थे कि तभी अचानक निहारिका के पैरों से कोई लिजलिजी चीज टकराई जिसमें लगे कंटीले काॅ॑टों की कतार को निहारिका के हाथों ने भी अगले वार के साथ दर्द के साथ महसूस किया और वह मुॅ॑ह के बल नीचे की ओर गिर पड़ी। उसने अपने मददगार के हाथ को पकड़ रखा था। इसलिए उसके गिरने की वजह से वह भी लड़खड़ा कर गिर पड़ा। फोन अब भी निहारिका के हाथ में था और उसकी लाइट जल रही थी। मददगार ने देखा कि इस तरह गिरने की वजह से निहारिका के होंठ उस के दाॅ॑तों से कट गए थे और वहाॅ॑ से खून बहने लगा था। उसके हाथ में भी खरोंच के गहरे निशान खून के धब्बों के साथ दिखाई दे रहे थे।


यह सब देखकर उस मददगार का चेहरा अत्यंत कठोर हो गया। उसके चेहरे की नसें तन गई और फिर अपने दाॅ॑तो को भींचते हुए अचानक ही उसने अंधेरे में उस दिशा में छलांग लगा दी, जहाॅ॑ से निहारिका पर वार हुआ था। अचानक हुई इस घटना से निहारिका सकते में आ गई। वह अपनी ऑ॑खें फाड़े हुए उस अंधेरे को घूरती रही जहाॅ॑ से अब तेज उठापटक की और साथ ही अजीब सी क्रींऽऽ... क्री॑ऽऽ की आवाजें आ रही थीं। उसकी समझ ने काम करना बंद कर दिया था। अचानक ही वातावरण एक तेज चीख से दहल उठा, जिसने निहारिका को भी अंदर तक दहला कर रख दिया। इस आवाज को पहचानने में निहारिका ने कोई गलती नहीं की थी। यह चीख उसके मददगार की ही थी। निहारिका को अपनी ही आवाज अपने हलक में अटकती हुई लगी। किसी तरह उसने अपने मददगार को काॅ॑पती हुई आवाज में पुकारा, मगर सामने से कोई भी जवाब नहीं आया। एकाएक निहारिका के चेहरे से उसका डर गायब हो गया और उस डर की जगह मददगार के प्रति चिंता ने ले ली। उसकी ऑ॑खों से ऑ॑सू बहने लगे। घायल निहारिका ने किसी तरह खुद को खड़ा किया। उसके पैरों के साथ-साथ उसका सारा वजूद भी लड़खड़ा रहा था। गहरी और लंबी साॅ॑से लेते हुए वह अभी भी उसी दिशा में देख रही थी। उसकी निराशा भरी ऑ॑खों में अचानक ही एक चमक आ गई जब उसने फोन की रोशनी में अपने मददगार को लड़खड़ाते हुए अपनी ओर आते देखा। वह बहुत थका हुआ दिख रहा था। निहारिका की ऑ॑खें भय से फैल गईं, जब उसने अपने मददगार को खून से नहाए हुए देखा।


"जल्दी चलिए! इससे पहले कि कोई और आ जाए।" निहारिका का हाथ पकड़कर उसे एक दिशा में खींचते हुए उसके मददगार ने कहा।


"वो.. कौन.. हमारा मतलब है क्या चीज थी?" हैरत में डूबी हुई आवाज में निहारिका ने पूछा।


"अभी इसका समय नहीं है। चलिए आप!" मददगार ने बुरी तरह झल्लाते हुए निहारिका से कहा और फिर वह भी अपनी जगह पर जड़ होकर खड़ा रह गया, जब उसने निहारिका की ओर देखा। वह निहारिका को ऊपर से नीचे तक घूर कर देख रहा था। उसकी ऑ॑खें घोर आश्चर्य से भरी हुई थीं और उसे अपनी और इस तरह देखता पाकर निहारिका को भी बहुत आश्चर्य हुआ।


"क.. क्या.. क्या हुआ?" निहारिका ने सकपकाते हुए पूछा।


"कुछ.. कुछ नहीं! चलिए!" मददगार ने कहा और हैरानी भरी अपनी नजरों के साथ ही आगे की ओर बढ़ने लगा। निहारिका भी मौके की संजीदगी को समझते हुए उसके पीछे-पीछे चलने लगी। उसी समय एक ठंडी हवा का झोंका उसे छूता हुआ गुजर गया। उस झोंके की छुअन ने उसके सारे शरीर में सिहरन पैदा कर दी और वो एक बार फिर ठिठक कर खड़ी हो गई।


"क्या हुआ?" मददगार की आवाज आई।


"ऐसा लगा जैसे कोई हमें छू कर गुजरा हो।" निहारिका ने सहमी हुई आवाज में कहा।


"क्या?"


"यह सब हो क्या रहा है यहाॅ॑? यह कैसी दुनिया है? ऐसा लग रहा है जैसे ये हमसे कुछ कहना चाहती हैं... बताना चाहती है।" उलझन भरी आवाज में निहारिका बोली।


"कोई कुछ नहीं कहना चाहता। दरवाजा सामने ही है। जल्दी चलिए।" मददगार उसे खींचते हुए बोला। इतनी ज्यादा सहायता करने के बाद निहारिका उसकी बात काट नहीं सकती थी इसलिए तेजी से उसके पीछे चलने लगी। जल्द ही वह मददगार एक जगह पर जाकर रुक गया। निहारिका उसे गौर से देखने लगी।


"आइंदा इस ओर.. कभी भी.. भूले से भी ना आइएगा। ये जगह आपके लिए नहीं है। जो भी हुआ उसे एक बुरा सपना समझकर भूल जाईएगा।" मददगार अपनी गहरी ऑ॑खों से उसे देखता हुआ बोला और आगे बढ़कर दरवाजा थोड़ा सा खोल दिया। कितनी बातें कर रही थीं उसकी ऑ॑खें, जिसकी भाषा चाहते हुए भी निहारिका को समझ में नहीं आ रही थी। उसकी ऑ॑खों में ही देखती हुई निहारिका उस दरवाजे से बाहर निकल गई। अब वह उस दरवाजे से बाहर खड़ी थी और उसका मददगार उस थोड़े से खुले हुए दरवाजे के अंदर, जहाॅ॑ से निहारिका को उसकी एक स्पष्ट झलक दिखाई दे रही थी।


"आइए! आप भी जल्दी से बाहर आईए!" निहारिका ने तेजी से कहा। मगर उसका मददगार उसी तरह स्थिर खड़ा रहा। उसने बाहर आने में कोई भी दिलचस्पी नहीं दिखाई। निहारिका ने अपनी ऑ॑खों को सिकोड़ कर पहले उसकी ओर देखा, फिर बाहर अपने चारों ओर देखा और फिर सुरक्षित बाहर निकल आने के एहसास के साथ उसने मुस्कुराकर अपने मददगार की ओर देखा।


"हमारे मददगार का नाम जान सकते हैं।" निहारिका ने उससे पूछा।


"समर..." मददगार की आवाज उसके गले में फॅ॑स गई, जब पीछे से एक बालों से भरे मकड़ी के जैसे हाथ ने समर को खींच लिया। उसे इस हालत में देखकर निहारिका का मुॅ॑ह खुला का खुला रह गया। वह कुछ कर पाती उससे पहले ही उसके मददगार ने उस दरवाजे को अंदर से बंद कर दिया। बदहवास सी निहारिका दरवाजे के पास जाकर उसे जोर-जोर से पीटने लगी, मगर दूसरी ओर से अब कोई भी आवाज सुनाई नहीं दे रही थी। सिसकती हुई भावुक निहारिका अपने कदम पीछे हटाते हुए उस दरवाजे को घूर रही थी। अपनी ऑ॑खों से उन ऑ॑सुओं को पोंछते समय अचानक उसे एक झटका लगा। उसके हाथ तेजी से उसके होठों के ऊपर चलने लगे। उसी हैरानी की हालत में उसने धीरे से अपने हाथों की ओर देखा और उसकी ऑ॑खें आश्चर्य से लगातार फैलती ही चली गईं। वह तेजी से अपने हाथों को उलट-पलट कर देखने लगी।


"ऐसा कैसे हो सकता है? कितनी चोटें लगी थी हमें और खून भी निकला था! वो सारी चोटें कहाॅ॑ गईं? हमें पूरा विश्वास है कि वो चोटें हमारा वहम नहीं थीं, तो फिर गईं कहाॅ॑? इतनी तेजी से तो कोई भी जख्म नहीं भर सकता! ये क्या हो रहा है ये सब! मदद कीजिए हमारी!" निहारिका ने अपने हाथ जोड़कर ऊपर की ओर देखते हुए कहा। "अब सिर्फ हमारी बहनें ही नहीं, उस मददगार.... नहीं.. मददगार नहीं... समर! समर को बचाना भी हमारी जिम्मेदारी है। इतना तो विश्वास है कि उसे कुछ होगा नहीं। जिस तरह अंधेरों के खौफ से लड़कर उसने हमारी जान बचाई, वो इतनी आसानी से हार नहीं सकता। पर हाॅ॑! मुसीबत में जरूर है। हमें जल्दी सब करना होगा।" निहारिका ने अपने चेहरे पर बिखरे हुए ऑ॑सुओं को पोंछा और अपने चेहरे पर एक दृढ़ निश्चय लेकर पैलेस के दूसरी और बढ़ गई।


वहीं दरवाजे की दूसरी तरफ एक अंधकार भरे कोने में बैठा हुआ निहारिका का मददगार किसी गहरी सोच में डूबा हुआ था।


"ये सब क्या हुआ आज? इतना समय गुज़र गया, ऐसा तो कभी किसी के साथ नहीं हुआ। फिर आज क्यों? आज ऐसा क्या खास हो गया?" मददगार की आवाज में एक थरथराहट थी। उसने अपनी ऑ॑खें बंद की और एक बार फिर उस समय में पहुॅ॑च गया, जब उसने निहारिका को अपनी बांहों में संभाला था। एक-एक करके सारी घटनाऍ॑ उसकी ऑ॑खों के सामने किसी किताब के पन्ने की तरह पलटने लगीं। उन कई पन्नों के बीच दो पन्नों पर उसकी ऑ॑खें थम गईं। पहला पन्ना जब उसने पहली बार निहारिका को गिरते समय थामा था, तब अनजाने में उसके नाखून उसके नाजुक हाथ में चुभ गए थे और वहाॅ॑ से खून की बूंदे निकल आई थीं और वो बूंदें उसके शरीर के संपर्क में आ गईं थीं। उसी के बाद उसकी शारीरिक संरचना में बदलाव आया और उसने एक इंसान का वजूद अख्तियार कर लिया था। उसके बाद दूसरी बार जब निहारिका जोर से चीखी तब उसने अपने हाथों से उसका मुॅ॑ह बंद कर दिया था। उस समय खुद को छुड़ाने की कोशिश में निहारिका ने उसके हाथों को बेरहमी से काट दिया था, जिससे उसके हाथों से भी खून निकल आया था, जो निहारिका के मुॅ॑ह में चला गया था।


"तो क्या इसी वजह से यह सब हुआ! उसके खून के संपर्क में आकर मैं इंसान बन गया और शायद मेरा खून उसके मुॅ॑ह में जाने की वजह से उसके अंदर ही ये शक्ति आ गई हो, जिसकी वजह से उसके चोट इतनी जल्दी भर गए। पर ऐसा तो तभी हो सकता है... जब वो आएगी, जो सदियों से चले आ रहे इस श्राप के काले बादलों को इस राजपरिवार के सिर से हटाने वाली होगी। तो क्या... ये वही है, जिसका हम सभी को हमेशा से इंतजार था। क्या वो लौट आई है। क्या भविष्यवाणी के पूरे होने का समय आ गया है?"




क्रमशः-


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5 Comments

Poonam s ram

25-May-2022 01:31 PM

Superb

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Shnaya

03-Apr-2022 02:20 PM

Nice part 👌

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Swati chourasia

12-Jan-2022 07:51 PM

वाह कहानी बहुत ही अच्छी चल रही है 👌👌

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