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रतनगढ - कहानी दो जहां की (भाग 11)

निहरिका घबराई सी उसी महल में घूम रही थी। वे अजीब सी आवाजे अब थोड़ी तेज हो चुकी थीं। यहां तक कि वह उसे अपने बेहद करीब महसूस हो रहीं थीं लेकिन वह आ कहाँ से रहीं थी यह समझ नही पा रही थी। निहारिका हिम्मत कर उस पैलेस में घूम तो रही थी लेकिन उसका दिल कितने जोरो से धड़क रहा था उस समय यह केवल वही समझ रही थी।स्याह अंधेरे में केवल उसके मोबाइल की रोशनी में जगमग करता रास्ता। 

वह जिधर फ्लैश डालती उधर ही एक बड़ा गोल सा घेरा बन जाता। दुनिया भर के अजूबे उस पैलेस में देखने के बाद निहारिका को अपनी बहनों का याद आई। वह सोचने लगी भला कुंवर जी एसी जगह रहकर क्या करेंगे? और वह यहां क्यों रहेगें इतने अंधेरे में। कहीं हम ही गलत जगह तो नही आ गए या कहीं ऐसा तो नही यह महल वह हो ही न जिसमे हमे हमे जाना था। क्योंकि यहां चारो तरफ सिवाय अंधेरे कुछ भी नही, कुछ भी नही। 

निहारिका वहां खड़ी हुई सोच रही थी कि तभी उसे एहसास हुआ जैसे उसके पीछे कोई मौजूद हो। उसे सांसो की लंबी खींचती हुई आवाजे आईं। उसे ऐसा लग रहा था जैसे कोई उसके पीछे खड़ा होकर लम्बी लम्बी सांसे ले रहा हो। निहारिका ने तुरन्त पीछे मुड़ कर देखा। साथ ही मोबाइल का फ्लैश मारा। लेकिन वहां कोई नही था सिवाय दूर फैले घने अंधकार के।

वहम ही होगा हमारा! क्योंकि यहां कोई दिखा नही। लेकिन उजाले ... वह एक बार फिर संदेह से भर गई। लेकिन इतना सजीव वहम कैसे हो सकता है हमारा। सच मे यह जगह अजीब ही है। 

श्श..आह... हु हु.. तभी उसके कानों में फिर से चीखने सिसकने की आवाजें पड़ने लगीं।

 यह सब क्या हो रहा है हमारे साथ! यह आवाजे कभी अचानक से आने लगती है और कभी बन्द हो जाती है, क्यों? - वह बड़बड़ाई। निहारिका के बड़बड़ाने भर की देर थी कि तभी किसी के जमीन पर तेजी से घिसटने की आवाज आई, और उसके क्लिच लगे बाल झटके से बिखर कर उलझ गए। ऐसा लगा जैसे किसी ने जबरदस्त फूंक मारी हो। निहारिका चौंकी उसके पंजे उचके, एड़ी पर दवाब पड़ा और किसी कुशल नृत्यांगना की भांति वह तुरन्त चारो ओर घूम गयी।

घूमते हुए उसका दूसरा पैर उसके कपड़ो में उलझ गया और वह चीखते हुए लड़खड़ा कर गिर गयी। उसके हाथ मे पकड़ा मोबाइल फ्लैश पावर बटन दो बार क्लिक होने के कारण बन्द हो चुका था। निहारिका की चीख थमने के साथ ही उस महल में गूंज रही वह वेदना से भरी आवाजे अचानक से शांत हो गयी। मानो वह किसी तूफान से आने से पहले का सन्नाटा हो। जमीन पर पड़ी निहारिका मन ही मन अपने इष्ट देव को याद कर रही थी जो "गढ़ वाले महाराज" तो कतई नही थे बल्कि वह शक्ति की उपासक थी। सो मन ही मन शक्ति स्वरूपा को याद करते हुए निहारिका उठने की कोशिश करने लगी। लेकिन वह उठ नही पाई। 

उसकी नजर उससे कुछ दूर चमक रहीं सुनहरी चमकीली आंखों पर पड़ी जो लगातार निहारिका को घूर रहीं थीं। वह उन्हें घूरते हुए देख वह सिहर गयी। उसकी हालत ऐसी हो गयी कि वह न तो आगे ही बढ़ पा रही थी और न ही पीछे ही जा पा रही थी। मानो उसका शरीर जमीन पर पड़े पड़े बर्फ में जम गया हो। निहारिका काफी देर तक बेसुध सी उसे घूरती रही। निहारिका को इस बात का कतई अनुमान नही था घने अंधेरे में चमक रही वे सुनहरी आंखे दरअसल असामान्य है। उन सुनहरी आंखों का एक सेकंड भी लुप धुप न होना उसे हैरत में डाल रहा था। जब निहारिका सामान्य हुई तब उसने अपने हाथ मे पकड़े मोबाइल का होश आया। उसने बिन देर किए एक बार फिर रोशनी की और उसे उन सुनहरी आंखों की तरफ फेंका। 

हालांकि वह उतनी पर्याप्त तो नही थी कि उससे कुछ दूर खड़े उस आदमी को साफ देख सके। लेकिन उसका हुलिया उसे कुछ विचित्र सा नजर आने लगा। उसकी आंखें फैलने लगी। वह झटके से खड़ी हुई और फ्लैश के साथ आगे कदम बढ़ाने लगी। जैसे जैसे निहारिका के कदम आगे बढ रहे थे हर कदम के साथ उसका हृदय और तेजी से आवाज करता जा रहा था। उसके चेहरे पर भय के दृश्य नजर आने लगे तो वहीं उसकी आँखों की पुतलियां फैलती जा रही थीं। दो कदम और आगे बढ़ाने के साथ ही वह इतनी तेजी से चीखी कि महल में पंख फड़फड़ाने की आवाजें गूंजने में बिल्कुल देर नही लगी। उसके कदम स्तब्ध हो गये और वह पसीने से लथपथ हो रही थी। जिसका एहसास उसे तनिक भी नही था। 

चलते हुए वह उस महल के हॉल में आ गयी वह स्थान गोल खम्भो से घिरा हुआ था। जिसके एक खम्भे के पास खड़ा था वह, जिसे देखकर ही निहारिका पसीने से लथपथ हो सुध बुध खोती जा रही थी। 

उसकी आँखों के सामने अंधेरा घिरता आ रहा था और वह देख रही थी कुछ चल चित्र : दो चौदह पंद्रह बरस की कन्याएं उसी हॉल के अहाते में दौड़ भाग कर रही हैं। उनकी खिलखिलाहट पूरे महल में गूंज रही है। एक ने थोड़े साधारण वस्त्र पहने हुए है तो दूसरी राजसी परिधान में लिपटी हुई दौड़ भाग करते हुए उन खम्भो को छू रही हैं। 

निहारिका खुद को सम्हालने की कोशिश में लगी हुई थी कि तभी एक बार फिर से आवाजो का शोर बढ़ने लगा। उसके साथ ही फर्श पर धम्म धम्म, खट्ट पट्ट जैसी कुछ विचित्र सी आवाजें जो न तो किसी सिंह के दहाड़ने जैसी लग रहीं थी और न ही किसी हाथी के चिंघाड़ने जैसी। वे कुछ विचित्र आवाजे थीं मानो किसी जानवर और किसी इंसान का कोई मिला जुला प्रतिरूप।

 निहारिका आवाज सुन कर सम्हलते हुए बुरी तरह सहम गई। वे सारे दृश्य उसकी आँखों से लुप्त हो गए। बच गया तो केवल वह भयाक्रांत करने वाला दृश्य, जब उसके सामने खड़ा हुआ था एक ऐसा प्राणी जो न ही ठीक से इंसान नजर आ रहा था और न ही जिसे वह जानवर समझ सकती थी। इंसानों जैसी उसकी गर्दन थी तो वहीं किसी चार पैरो वाले जानवर की तरह उसके पैर। जो किस जानवर के थे यह भी स्पष्ट नही हो रहा था। उसका धड़ से नीचे का हिस्सा पूरा अजीब सा था। उसके एक अजीब भयावह लम्बी पूछ थी जिस पर घने बाल थे। उसकी आंखें अब भी चमक रही थी। मोबाइल की फ्लैश लाइट में दिखता वह अजीब सा प्राणी निहारिका को घूरे जा रहा था। निहारिका के पैर थर थर कांप रहे थे और वह सर्दी लगने की भांति कंपकपाने लगी। हालांकि निहारिका डरपोक बिल्कुल नही थी लेकिन उस भयावह दहशत से भरे मंजर को देख कर भला किसमे इतनी हिम्मत होगी तो बिन डरे ही शांत खड़ा रह जाये। उस पल निहारिका यह पूरी तरह भूल चुकी थी कि उसकी बहने मिसिंग है और वह उनकी तलाश में ही निकली है। 

लगातार बढ़ती आवाजे अब उसके मस्तक पर तेजी से प्रहार कर रही थीं। उसे लग रहा था जैसे उसके दिमाग की नसें किसी भी समय फट कर बिखर जाएंगी। उसे मालूम पड़ रहा था जैसे आवाजे गोला बनाकर चक्कर काटते हुए गूंज रही हो। निहारिका उस विचित्र से जीव को अपने सामने देख ज्यादा देर खड़े नही रह पाइ उसकी चेतना विलुप्त होती गयी और उसकी आंखें बंद होकर दांत जुड़ते हुए किटकिटाए और वह धड़ाम से गिरने को हुई...! लेकिन वह पूरी तरह जमीन का स्पर्श नही कर पाई और तभी उसके कंधों पर दो मजबूत हथेलियां जकड़ी हुई दिखी और वह अब वह उन बान्हो के बीच हवा में झूल रही थी।

जारी....     

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5 Comments

Shnaya

03-Apr-2022 02:19 PM

Very nice 👌

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Swati chourasia

12-Jan-2022 07:20 PM

Very beautiful and very interesting part 👌👌

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Shalu

07-Jan-2022 01:57 PM

Very good

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