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रतनगढ - कहानी दो जहां की (भाग 9)



निहारिका ने चौकीदार की बातो का कोई जवाब नही दिया और वो धन्यवाद कहते हुए वहाँ से आगे बढ गयी।

उसके मन मे रह रह कर ये ख्याल आ रहा था, “हम वहाँ गये और कुंवर साहब ने वहाँ जाकर मना कर दिया तब हम क्या करेंगे। कैसे हम हमारी बहनो तक पहुंचेंगे, न जाने वे कहाँ होंगी, किस हाल मे होगी। इस अनजानी जगह पर न जाने उन्हे कोई क्यू उठा कर ले जायेगा। हमे कुछ भी समझ मे नही आ रहा है। लेकिन जब सब ओर से थक चुके हैं तब हमे अब एक मात्र वही आसरा समझ आ रहा है।” ऐसा सोचते हुए निहारिका वहाँ से आगे बढती जा रही थी।

समय की कमी कहे इसे या वक्त की जरूरत निहारिका सामान्य से बहुत तेज कदम बढा रही थी। रात के समय पैलेस तक जाने कि उसकी चहलकदमी की यादे एक एक कर उसके जेहन मे ताजा हो रही थी और वह अपने मन मे उठ रहे डर को समेटते हुए वहाँ से निकल रही थी। 

नर्म घास के मैदान को पार करने के बाद वह पथरीले रास्ते को पार करते समय पड़ने वाली बदबूदार महक भी उसके इरादो को नही डिगा पाई। हवा की सरसराहट अभी भी उसके कानो को बेधने की नाकाम कोशिश कर रही थी। उसने देखा पैलेस के नजदीक आने पर वह बड़ा सा शानदार दरवाजा जो एक तरफ खुला हुआ था और एक तरफ बंद था। पिछली रात या कहा जाए अल सुबह घटी सारी घटनाये एक एक कर उसके जेहन मे कौंधने लगी। एक अजीब सा भय, घबराहट, जिसको शब्दो का रूप देना शायद उसके लिये सम्भव ही नही था, लगातार उसे दहशत मे भरे जा रहा था। सब पर काबू करने की जद्दोजहद करते हुए आखिरकार वह दरवाजे तक पहुंच ही गयी। 
दिन के उजाले मे उसने ध्यान से दरवाजे को निहारा। वो बलूत की लकड़ी से बना एक नक्काशीदार शानदार दरवाजा अब अलग अलग रंगो का स्पष्ट दिख रहा था। 

जहाँ बायीं ओर का दरवाजा सुनहरी रंगत लिये हुए था तो वहीं दाईं ओर का पल्ला हल्का पीला था। बाये दरवाजे की तरफ सारे मंगल निशान स्वास्तिक, ओउम, कलश, गणपति महाराज और दरवाजे के ऊपर तोरण, और एक तरफ कुछ पवित्र मंत्र अंकित किये हुए साफ नजर आ रहे थे। तो वहीं दूसरी तरफ ऐसा कुछ नही था बल्कि ये चित्र उस तरफ भी थे लेकिन सभी आधे अधूरे, या फिर उल्टे बने हुए थे जिन्हे नजर भर देखने भर से साफ पहचाना जा सके।

निहारिका के मन मे उस बाबा की बाते गूंजती जा रही थी। और अचानक ही उसके मन मे स्पष्ट हुए एक छवि... और वह गिरते गिरते बची। उसके मन दहशत से भर गया और उसे अपनी रीढ पर चीटियो के रेंगने जैसा एहसास होने लगा। 

निहारिका ने दरवाजे के उपर लिखे शब्दो को पढने की नाकामयाब कोशिश की।

ये शायद किसी तरह की चेतावनी मालूम पड़ रहे हैं। लेकिन है क्या ये स्प्ष्ट समझ नही आ रहा है- उसने मन ही मन ख्याल किया। ठीक उसी समय उसे एक तरफ से कुछ अस्पष्ट आवाजे और पदचाप आती हुई सुनाई पड़ी। उसने उस ओर देखा दूर तक कोई नजर नही आया। 

शायद कुछ गार्ड होंगे। जो पैलेस मे नियुक्त किये गये हो।हम कुछ देर रूक कर उनका इंतजार करते हैं शायद वे हमे अंदर कहाँ जाना है रास्ता बता दें – निहारिका ने कहा और रास्ते की ओर देखने लगी।   
वह आया था और कितना विचित्र घटा न इस बार, मुझे लग रहा है कि इस बार की अमावस्या जरूर ही कुछ खास थी तभी इतने सालो मे पहली बार ऐसा हुआ था – ये स्पष्ट आवाजे अब उसके कानो मे सुनाई पड़ रही थीं। उनकी आवाज मे रोमांच के साथ एक अनजाने डर को निहारिका ने महसूस किया।

हां, और अब हमे और भी सतर्क रहना चाहिये। बड़े पंडित जी से इस बारे मे बात की और आज वे पहली बार किसी घटना पर पूरी तरह शांत रहे, ये बड़ी हैरानी की बात है – दूसरी पतली मर्दाना आवाज को सुन कर उसके पूरे शरीर मे सिहरन दौड़ गयी।

और नही तो क्या भाई, बड़े पंडित की खामोशी बहुत से राज छुपाती हुई मालूम पड़ रही है, पूरे रतनगढ मे यह बात चर्चा का विषय बन गयी है। आखिर बड़े पंडित इतने खामोश क्यूं रहे कल। वैसे तो कोई भी मसला होने पर वे तुरंत ही उसका समाधान निकाल लेते थे। ज्योतिष विद्या मे  रतनगढ तो क्या आसपास के किसी भी गढ मे उनके मुकाबले का कोई भी कहीं नही है। हर मुश्किल का हल होता है उनके पास लेकिन कल से वे बस खामोश है। पूजा पाठ करने के बाद वे जाप करने मे रत है ऐसा लग रहा है जैसे वे किसी खास के लिये प्रार्थना करने मे मग्न हो। पहली भारी आवाज उसके पास आती मालूम पड़ी।

गढ वाले महाराज जाने क्या सच्चाई है लेकिन जो भी है वो बस जल्द से जल्द सामने आ जाये और हम सब इस अबूझ पहेली से बाहर निकल आये – दुसरी आवाज सोचने वाले स्वर मे बोली।

अरे एक बात और सुनने मे आई है सुना है पहली बार अमावस्या को यहाँ कोई आया था जो बहुत देर तक पैलेस के सामने के दरवाजे के सामने खड़ा रहा था। तभी से बड़े पंडित खामोश हो गये हैं। कुछ लोगो ने उसे देखा भी था इधर से जाते हुए... पहली आवाज ने आश्चर्य भरे स्वर मे कहा।

हाँ शायद वह कोई लड़की रही होगी – ऐसा मेरे कानो मे भनक पड़ी है।– दूसरी पतली आवाज अब कम होती जा रही थी।

हे भगवान, कहीं ये लोग हमे तो नही ढूंढ रहे हैं। अगर ऐसा हुआ तो हमारे लिये बहुत मुश्किल हो जायेगी निकलने में। कहीं हम कोई मुसीबत मे न फंस जाये। क्या करें, क्या करें? – वह बहुत बुरी तरह घबरा गयी।तेजी से सोचने लगी - हमे लग रहा है कि उनके यहाँ आने से पहले ही हमे अंदर चले जाना चाहिये।

कुंवर जी से मुलाकात होने पर हम उनसे मांफी मांग लेंगे लेकिन अभी के लिये हमे यहाँ से निकलना चाहिये। आगे का आगे देख लेंगे। लेकिन बस हम यहाँ से निकले। जो होगा देखा जायेगा आगे... सोचते हुए निहारिका ने हड़बड़ाहट मे दरवाजे पर हाथ रखा और हल्का सा धक्का दे वह तेजी से अंदर भागी। उसने इस बात पर बिल्कुल ध्यान नही दिया कि उसे दाई ओर नही बायी ओर जाना था।

अंदर जाकर उसने दूसरा कदम बढाया और दरवाजा चरमराहट के साथ खुद ब खुद बंद हो गया। अंदर आने पर निहारिका ने तेजी से एक राहत की सांस ली और फिर पीछे मुड़ कर देखा। पदचाप उसके कानो की पहुंच से कोसो दूर लग रही थी। बस हल्की फुल्की भिन भिन सी आवाजे लग रही थी एवं वहाँ अजब सा सन्नाटा पसरा हुआ था, जैसे सदियो से वहाँ कोई नही आया हो। निहारिका को यकीन हो गया कि वे लोग अब जा चुके हैं और उसे आते हुए किसी ने नही देखा तब उसने आगे कदम बढाया लेकिन वह सामने का दृश्य देख बुरी तरह चौक गयी।

बाहर की परेशानियो मे उलझी निहारिका ने इस बात पर गौर ही नही किया कि वह जहाँ खड़ी हुई थी वहाँ चारो तरफ अंधकार ही अंधकार था। उसने तुरंत पीछे मुड़ कर देखा तो हाथ भर दरवाजे की दूरी के बावजूद भी उसे दरवाजा स्पष्ट नजर नही आया। 

हे भगवान! ये कैसी जगह है निहारिका घबराते हुए चीखी। उसकी आवाज उस घने अंधकार मे चीखते हुए गूंज गयी और पलटते हुए गूंजने लगी। उसे कुछ समझ मे नही आ रहा था कि वहाँ इतना अंधेरा क्यूं है।

ये हम कहाँ आ गये। अचानक से इतना अंधेरा क्यूं हो गया यहाँ जबकि अभी तो दिन की रोशनी ही काफी है फिर हमे इतना अंधेरा नजर आ रहा है क्यूं, कुछ समझ नही आ रहा है हमे वह असमंजस सी कुछ देर तक सोचती रही। 

आह... हूं हूंह.. उसके कानो मे किसी के कराहने की आवाज पहुची और निहारिका के रोएं खड़े हो गये।


जारी...!  

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8 Comments

Shnaya

03-Apr-2022 02:19 PM

बहुत खूब

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Shalu

07-Jan-2022 01:56 PM

Nice

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Art&culture

03-Jan-2022 08:55 PM

Next next next...

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