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रतनगढ - कहानी दो जहां की (भाग 8)

निहारिका कुछ समझ नही पाई वह करे भी तो करे क्या? वह बदहवास सी यहाँ से वहाँ अपनी बहनो को ढूंढ रही थी। वो बार बार “छुटकी, मान्या कहाँ हो तुम दोनो” कहते हुए उन्हे आवाज दे रही थी। लेकिन पलटकर किसी भी तरह की कोई आवाज उन्हे नही सुनाई दी। सुनाई दी तो बस लोगो की फुसफुसाहट और दिखाई दी तो सवाल करती लोगो की आंखे। उसकी आवाजे या तो दीवारो से टकराकर उसे ही चिढा रही थी या फिर हवा के जरिये शून्य मे भागी जा रही थी। उसने कितने ही चक्कर धर्मशाला के हर हिस्से के लगा डाले थे लेकिन उसे कोई खबर नही मिली अपनी बहनो की। धर्मशाला के बाहर भी निहारिका ने कई बार देखा लेकिन दोनो कहीं नही दिखी। जब वह चक्कर लगा लगा कर थक गयी तब उसके मन मे धर्मशाला मे ठहरे अन्य लोगो से पूछने का बुध्धिमता पूर्ण ख्याल आया। वह एक बार फिर हिम्मत से भर गयी और उसने अपनी थकान को दूर धकेला और एक एक कर आसपास के कमरो मे ठहरे लोगो से इसके बारे मे पूछने लगी। उसने दुबले पतले दिखने वाले एक आदमी से पूछा लेकिन उसने साफगोई से मना कर दिया, फिर वह अपने कमरे के बायें बने कुछ और कमरो मे ठहरे लोगो से पूछने लगी लेकिन उन्होने भी निशाजनक हालत मे अपना सर हिला दिया और निहारिका एक बार फिर घोर निराशा से भर गयी।

निहारिका के बार बार पूछने पर सभी चेहरो पर भी एक अनजाना डर दिखने लगा शायद उस समय सबके जेहन मे लगभग एक ही ख्याल चल रहा था, “कहीं वे दोनो बहने उसका शिकार तो नही बन गयी?” निहारिका बदहवास सी नीचे की ओर भागी, ये सोचते हुए शायद नीचे के फ्लोर पर किसी ने उसकी बहनो को देखा हो। हर ओर से निराशा मिलने पर निहारिका आखिर धर्मशाला के चौकी दार के पास पहुंची। चौकीदार ने उसे बताया आज तक ऐसा पूरे इलाके मे कभी नही हुआ कि किसी धर्मशाला से कोई व्यक्ति इस तरह गायब हुआ हो। कि उसे किसी ने देखा तक नही हो और वह दूसरे फ्लोर से निकल भागे। उसने निहारिका को रतनगढ के कुंवर साहब से मदद लेने की गुहार लगाने को कहा। उसने निहारिका को बताया, “ रतनगढ मे केवल कुंवर साहब ही ऐसे हैं जो तुम्हारी मदद कर सकते हैं। बाकि यहाँ और कोई साधन नही है जिसके जरिये तुम अपनी बहनो तक पहुंच सको।” निहारिका ने सवालिया नजरो से चौकी दार की ओर देखा।

उसने पूछा "काका, यहाँ पुलिस स्टेशन नहीं है क्या ?"

चौकीदार पहले तो गम्भीर हुआ फिर अपने चेहरे पर सामन्य मुस्कुराहट रखते हुए उसने कहा - "बेटी पुलिस स्टेशन तो है, लेकिन वो नाम भर ही है। रतनगढ मे राज आज भी कुंवर साहब का ही चलता है। जो वह कह दें उसे आज भी पत्थर की लकीर समझ स्वीकार किया जाता है। इस बारे मे कोई दो राय नही रखता है और न ही आज तक किसी ने उनका विरोध किया है। और खास बात ये है कि वे केवल अमावस्या के दिन ही सभी से मिलते हैं और कल अमावस्या थी और कुंवर साहब महल मे ही होन्गे लेकिन कब तक रुके ये नही कहा जा सकता। मेरे ख्याल से तुम्हे आज ही बिन देर किये उनके पास जाना चाहिये।

निहारिका को थोड़ा अजीब लगा और उसने थोड़ा सख्त लहजे मे उनसे पूछा, “काका आप हमे पुलिस स्टेशन का पता बताइये। कानून से बढकर तो कोई नही हमारे देश मे। और हमे लगता है हमे पुलिस स्टेशन जाकर ही रिपोर्ट लिखवानी चाहिये।”

चौकीदार ने भी उससे बहस करना ठीक नही समझा और वो हताश स्वर मे बोले, “तुम नही मानती तो वहाँ जा सकती हो। रास्ता मै बता देता हूं कहते हुए उन्होने कहा, “बाजार के आखिर मे एक छोटी सी पुलिस चौकी बनी हुई है आप वहाँ जाकर पता कर सकती है लेकिन मेरा यही कहना है कि वहाँ जाकर भी आपको हताशा ही होगी क्युंकि उनका जवाब भी यही होगा जो मैंने आपको कहा है – चौकीदार ने बड़े विश्वास से कहा और वो एक बार फिर अपने काम मे लग गया। 
निहारिका ने चौकीदार की सलाह को अनदेखा किया और वहाँ से पुलिस स्टेशन जाने का निश्चय कर वह तेजी से उसकी ओर बढ गयी। पूरे रास्ते भर निहारिका को ये महसूस होता रहा कि कोई है जो उसका पीछा कर रहा है। वह जब पुलिस स्टेशन के करीब पहुंची तब उसको नजर आई एक आकृति जिसकी एक बड़ी पूंछ थी और वो लम्बी और अजीब सी थी शायद किसी जानवर जैसी।पुलिस स्टेशन पहुंच कर उसने देखा कि वह दो कमरो का एक छोटा सा मकान जैसा था जिसे चौकी का रूप दे दिया था। एक तरफ जेल जैसी सलाखे थी जहां छोटे मोटे अपराधी बंद थे और एक कमरे मे एक थाना इंचार्ज और एक कॉन्स्टेबल मौजूद थे जो एक चौड़ी लकड़ी की कुर्सी पर बैठे हुए थे। वह तेजी से घबराई सी थानेदार के पास गयी।

 उन्हे प्रणाम करते हुए निहारिका ने उन्हे अपने आने का प्रयोजन बताया तो सहसा उन्हे विश्वास ही नही हुआ उस पर। उन्होने पहले तो एक नजर उसे देखा और उसे देखते ही उनके चेहरे का रंग उड़ता मालूम पड़ा और उनका लाल दमकता चेहरा सफेद दिखने लगा था उनकी हालत कुछ ऐसी थी जैसे उन्होने कोई जीता जागता अजूबा देख लिया हो।

आप सुन रहे हैं सर?, निहारिका की इस आवाज से जैसे उनके दिमाग मे वापस से चेतना आई हो। थानेदार हड़बड़ाया बोला, “आप वहीं कहीं ढूंढिये मैडम, धर्मशाला मे ही होंगी और कहाँ होगी?” 

" लेकिन हम पिछले चार घंटो से उन्हे ढूंढ रहे हैं। धर्मशाला के साथ साथ आसपास का एरिया भी छान मारा लेकिन वे हमे कहीं नजर नही आई, और न ही उनका कोई सुराग मिला है हमे। हमने सबसे पूछा भी लेकिन किसी को भी नही पता कि वो कहां है?” 

बोलते बोलते निहारिका की रूलाई फूट पड़ी। उसकी आंखो के सामने छुटकी का चुलबुला चेहरा और मान्या का मासूम चेहरा घूम रहा था। वह ये समझ ही नही पा रही थी ऐसे हालातो मे उसे क्या करना चाहिये।

 जब कॉन्स्टेबल की नजर रोती बिलखती निहारिका पर पड़ी, तब उसने थानेदार से कहा, “इसे देख कर लगता नही कि ये हमसे झूठ बोलने की हिमाकत करेगी, और वैसे हमारे यहाँ यह करने की कोई हिमाकत कर भी नही सकता। इसे कुंवर साहब के पास ही भेज दे अब केवल एक वही है जो इसकी बहनो को ढूंढ सकते हैं।”

तुम्हारी बात तो बिल्कुल सही है देवी सिन्ह परंतु, इसके लिये कुंवर साहब पैलेस मे मौजूद होने भी तो चाहिये। वे तो कभी कभी ही यहाँ आते हैं।

 देवी सिन्ह नाम का वह कॉन्स्टेबल मुस्कुराते हुए उठा, उसने कहा, अब इसे इनका अच्छा नसीब समझ ले या फिर उन लड़कियो का भाग्य कुंवर साहब की गाड़ियो का काफिला कल सुबह हमने ही महल की तरफ जाते देखा था इसका अर्थ ये है कि वे इस समय महल मे ही मौजूद हैं।”

निहारिका उन दोनो की बात समझने का भरसक प्रयास कर रही थी। वह कभी देवी सिन्ह की तरफ देखती तो कभी थानेदार के चलते हुए हाथो की तरफ।

अचानक थानेदार ने निहारिका की तरफ अपनी नजरे घुमा दीम निहारिका हड़बड़ा गयी, थानेदार ने कहा, - “देखिये मैडम हमे आपसे पूरी सहानुभूति है, लेकिन अगर हम पूरे जी जान से भी कोशिश करें तो भी जल्दी नही कर पायेंगे। इस समय अगर आपकी कोई मदद कर सकता है तो बस कुंवर साहब। वे इस एरिये के उस हिस्से से भी वाकिफ है जिस पर हम जाने से कतराते हैं। आप खुशकिस्मत हैं कि कुंवर सहब इस समय पैलेस मे ही मौजूद हैं। वे बहुत दरिया दिल हैं आप उनसे मदद मांगिये, वे आपकी मदद जरूर करेंगे। पूरे इलाके मे किसी मे भी इतनी हिम्मत नही है कि उनके हुकुम को टाल सके।”
 निहारिका के मन मे धर्मशाला के चौकीदार की बातें गूंजी, ‘उसने भी तो यही कहा था, निहारिका वापस महल मे जाने का सोच कर ही अंदर तक सिहर गयी। उसके मन मे पहला मूर्खता पूर्ण ख्याल आया कि पहली ही ट्रेन पकड़कर घर भाग जाये, किंतु हम बहनो को अकेला कैसे छोड़ सकते हैं इस विचार ने उसके सारे बुरे विचारो को झटक दिया।”

आखिर मे उसने वहीं रूककर अपनी बहनो को ढूंढने के लिये पैलेस जाना का विचार किया और उसके कदम थानेदार से बिन कुछ कहे तेजी से पैलेस की ओर बढ गये।

रस्ते मे जाते हुए वह उसके जेहन मे अल सुबह हुई घटनाये दौड़ गयी। वह कैसे वह अनजाने मे वहाँ पैलेस के गढ वाले महाराज के दर्शन के लिये द्वार पर पहुंच गयी थी। उसके मन मे वहाँ न जाने का विचार एक बार फिर उपजा और उसके कदम खुद से बहस करते हुए धर्मशाला की ओर ही मुड़ गये। निराश और थके कदमो से निहारिका धर्मशाला वापस लौटी। मदद की आस मे उसने एक बार फिर अपने आसपास मौजुद नजरो को टटोला किंतु वह यह समझ नही पा रही थी कि उन नजरो मे उसके लिये सहानुभुति थी या फिर अजीब सा भय। लोगो की अजीब नजरो को झेलते हुए निहारिका किसी तरह अपने कमरे मे वापस चली आई। 

वही खाली चिढन पैदा करता सन्नाटा, बिखरा पड़ा सामान, छुटकी और मान्या के स्लीपर सब कुछ वैसा ही जैसा वह छोड़ कर गयी थी। छुटकी और मान्या का सामान देख कर उसके मन ने एक बार फिर पैलेस जाने को उकसाया और वह फिर से हिम्मत बटोर कर खड़ी हो गयी अपने जीवन के इस नये सफर पर चलने के लिये। वह एक बार फिर नीचे दौड़ी और तेज कदमो से चौकी दार के पास पहुंची। उसने देखा वह बहुत मुस्तैदी से अपना काम कर रहा था। उसके पास पहुंच कर उसने पैलेस जाने का रास्ता पूछा। चौकीदार ने गम्भीरता से कहा, “मैंने तो पहले ही कहा था बिटिया तुम्हे पुलिस स्टेशन नही बल्कि पैलेस जाना चाहिये, कुंवर जी से मिलने।”

जारी....

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7 Comments

shweta soni

30-Jul-2022 08:12 PM

Amezing part

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Renu

18-Jul-2022 11:26 AM

क्या निहारिका अपने डर पर काबू रख पैलेस जाएगी या नहीं

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Shalu

07-Jan-2022 01:55 PM

Bahut accha episode h

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