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रतनगढ - कहानी दो जहां की (भाग 7)

निहारिका ने चौंक कर दहशत से पीछे देखा। एक बुजुर्ग के कांपते हाथ को देख उसने राहत की सांस ली और पूरी तरह पीछे मुड़ गयी। उसके दूसरे हाथ मे कांच के जार में रोशनी से टिमटिमाता एक बड़ा सा दीपक था।

बुजुर्ग की सशंकित और सवालों से भरी आंखे उस पर ही जमी थीं। शायद वह निहारिका के व्यक्तित्व का आंकलन कर रहा था था। कुछ क्षण यूँही देखते रहने के बाद वह उसने अपना हाथ निहारिका के सर पर रखा। उसे सहलाते समय उसके चेहरे पर गंभीरता टपक रही थी। मानो वह खुद किसी उलझन में घिरा हुआ सोच में डूबा हो।

यह तुम क्या कर रही थी? -  उसने सामान्य होती निहारिका से पूछा।

निहारिका उस बूढ़े के अचानक प्रश्न करने से हड़बड़ा गयी। वह खुद इस बात को लेकर आश्चर्य कर रही थी वह धर्मशाला की बालकनी के उस लंबे आहाते से निकल कर कब इस राजमहल के इतने करीब आ गयी। वह उस वृद्ध की बातों का कोई जवाब नही दे पाई बल्कि अभी भी सोच विचार में डूबी हुई थी।
क्या तुम्हे नही पता कि यहां अमावस्या की रात्रि पर आना पूर्णतः वर्जित है - बुजुर्ग ने कहना जारी रखा।

अ... नहीं...! वह हड़बड़ाई।

'क्या तुम यहां टूरिस्ट हो?' - उसने अपना हाथ पीछे खींचते हुए अगला सवाल दागा।

वह अब पूरी तरह सोच से बाहर निकल कर सामान्य हो चुकी थी - जी , उसने छोटा सा जवाब दिया।

वह देख रही थी गेरूआ रंग शरीर पर धारण किये वह करीब सत्तर साल का बुजुर्ग रहा होगा, उसके सर पर जटा रूप बंधी थी। माथे पर त्रिशूल बनाता लाल पीला रंग चमचमा रहा था।जिसे देख कर साफ समझ आ रहा था वह अवश्य ही किसी मंदिर का प्रधान पंडित होगा।

मुझे आश्चर्य है तुम्हे वे रहस्यमयी आवाजें सुन कर भी डर का कतई अनुभव नही हुआ - बूढ़े ने बिन किसी लाग लपेट के स्पष्ट शब्दो मे कहा। हालांकि यह कहते समय उसके स्वरों  में उतार चढ़ाव साफ नजर आ रहा था।

अर्थात, निहारिका का मुंह आश्चर्य से खुला रह गया।

मैं पिछले बासठ सालों से इस जगह नियमित सेवारत हूँ,  लेकिन यह वाकया कभी घटित नही हुआ कि अमावस्या की रात्रि के अंतिम पहर में कोई व्यक्ति मुझे इस राजमहल के आसपास भी नजर आया हो।

वह बूढ़े की वे रोचकतापूर्ण बातें सुनकर रोमांचित महसूस कर रही थी - लेकिन, ऐसा क्यों? - वह हैरत से बोल पड़ी।

उन्होंने राजमहल के उस बड़े से दरवाजे की ओर देखते हुए गहरी सांस ली। मानो वह खुद को किसी रहस्यमयी बात के उजागर के लिए तैयार कर रहे हों।
वे बोले - यह यहां सदियों से चला आ रहा एक श्राप है। जिसके बारे में यहां का कोई भी व्यक्ति बात करना पसंद नही करता। मैने तुम्हे टोका उसकी एक विशेष वजह भी है!

विशेष वजह,  उसकी भवें सिकुड़ कर छोटी हो गई।

हां,  तुम जो ये दाएं हाथ का दरवाजा खोलने जा रही थीं वह कभी नही खोला जाता है,  क्या तुमने ये नही देखा इन दोनों दरवाजो में अंतर... उस दरवाजे के ऊपर लिखी काले अक्षरों में चेतावनी, क्या तुम्हें नही दिखा आधे दरवाजे के हिस्से में लगा वह पवित्र तोरण! दरवाजे के बायीं ओर बने कुछ मंगल चिन्ह जबकि दायीं ओर की ऊंची दीवारे इन चिन्हों से महरूम है।

बूढ़े की रहस्यों से भरी बातें सुनकर निहारिका तुरन्त पीछे पलटी। उसने दरवाजो को ताड़ा। दोनो दरवाजे हूबहू एक जैसे थे किन्तु उनमें अंतर आ रही रंगों का था जो अंधेरे के कारण उसे नजर नही आया। किन्तु उस बूढ़े की कही हर बात सत्य नजर आई। दरवाजे के ऊपर उसे सफेद रंग का कुछ टँगा हुआ तो नजर आया लेकिन वह क्या था समझ नही पाई। दरवाजे के बाएं ओर उसे चमक़दार सुनहरे रंग में चमकते कुछ मंगल चिन्ह दूर से ही नजर आ गए। वह एक बार फिर उस बूढ़े की ओर देखने लगी।

बूढ़ा बेहद गम्भीर हो चुका था। वह सदे शब्दो मे बोले, 'तुम निश्चित रूप से विशेष हो निहारिका! मेरा मन बार बार यह कह रहा है तुम यहाँ स्वयं नही आई हो, रतनगढ के शापित इतिहास ने तुम्हे याद किया है।' वे मुस्कुराए और तेजी से बाएं दरवाजे को खोल कर उसके अंदर प्रवेश कर गए।

सवालों के झंझावात में उलझी निहारिका बूढ़े की बातों से सोचने पर मजबूर हो चुकी थी। उसके दिमाग मे बड़ी तेजी से उस बूढ़े की बाते घूम रही थी, वह सोच रही थी, वह क्या उल जलूल कह कर गया। किन्तु क्या वह बूढ़ा सच कह रहा था? हम यहां स्वयं ही तो आये हैं... नहीं! शायद वह सही था। हम यहां स्वयं नही आये... और वह आवाज कितनी सर्द थी। वह वहीं खड़ी सोच में उलझी हुई थी कि तभी शरीर पर उसे एक बहुत तेज झटका महसूस हुआ और वह दो कदम पीछे खिसकते हुए गिरते गिरते बची। उसने वजह तलाशने के लिए अपनी नजरे दौड़ाई। वह काले रंग का लबादा ओढ़े चमकदार आंखों वाला सामान्य से अधिक लम्बाई का युवा था जो निहारिका को बुरी तरह घूर रहा था। हालांकि वह दिखाई ज्यादा नही दे रहा था लेकिन उसकी चमक़दार आंखें और लम्बा काला शरीर किसी अंधेरी परछाई जैसा नजर आ रहा था। अमावस्या का गहन अंधेरा होने की कारण निहारिका बुरी तरह सहम गई थी, इतना कि उसकी पलके तक झपकना बन्द हो गयी। एक क्षण रुकने के बाद वह बिजली की फुर्ती से आगे बढ़ा,  दाये दरवाजे के चरमराने की हल्की मामूली आवाज आई। दरवाजे ने अपनी जगह छोड़ दी जिससे अगले ही पल वह अंधेरी परछाईं दरवाजे के उस पार खड़ा हो मुड़ कर निहारिका को घूर रहा था। दरवाजा फिर बहुत धीमे से चरमराया और चर्र चर्र करते हुए वापस अपनी जगह आकर टिक गया।

दरवाजे के बन्द होते होते निहारिक़ा बुरी तरह असमंजस में पड़ चुकी थी। उसके मन मे उस बूढ़े की बातें और अभी जो घटना घटी वह विरोधाभास कर रही थीं। वह समझ नही पा रही थी किस बात को सच माने। क्या वह जो उस बूढ़े ने कहा था, या फिर यह कि महल के उस दरवाजे को स्पर्श न करने की चेतावनी महज अफवाह से ज्यादा कुछ नही थी।

वह इतना लंबा चौड़ा आदमकद कौन था ? वह बड़बड़ाई...! वह इतनी ज्यादा सोच में पड़ गयी थी कि उसने इस बात पर भी ध्यान नही दिया कि वह आदमकद इंसान बायां दरवाजा खुला होने पर भी दाये दरवाजे से ही क्यों अंदर गया?

इस बार तो गढ़ वाले महाराज की बड़ी कृपा हो गयी भाई, " देखो आज भी कोई अनिष्ट सुनने को नही मिला। पिछली अमावस्या को पहाड़ी की तलहटी में रहने वाले सुजैन भाई के घर से कितनी चीख पुकार सुनाई देने लगी थी अब तक। वे बुरी तरह रोते हुए चिल्ला रहे थे उनके घर जरूरत का सारा सामान अस्त व्यस्त था और उनकी बेटी के बाएं हाथ पर खसोंटने के गहरे घाव मिले थे।

यह पुरुष स्वर सुन निहारिका अपनी सोच से बाहर आई। उसने अपनी दृष्टि फैलाकर सामने आ रही आवाज की ओर देखने की कोशिश की। सामने पहाड़ी के पथरीले रास्तो पर कुछ कदमो की आहट सुनाई दे रही थी, जहां से चले आ रहे थे दो सामान्य कद के परछाई नुमा आदमी। वह ध्यान से उनकी बातें सुनने लगी।

अरे हां, कितनी आश्चर्यजनक घटना थी वह! रतनगढ में पहली बार ऐसी घटना सुनने को मिली थी हमे रतनगढ में। उससे पहले तो बस घर का जरूरत का सामान बिखरा मिलने की खबरे चर्चा में रहती थीं।

वे आवाजे उसके बहुत पास सुनाई देने लगी। वह थोड़ा और ध्यान से उन्हें देखने की कोशिश कर रही थीं। वे आवाजे अब उसके बहुत करीब आ चुकी थी। वह मुंह बाए देख रही थी वे दो आदमी थे जो एक दूसरे से बतियाते हुए उस अधखुले दरवाजे से अंदर की ओर जा रहे थे। वे एक एक कर अंदर गए थे उनमें से किसी ने भी उस बड़े बन्द दरवाजे को खोलने की जहमत नही उठाई।
भाई! ये बात समझ नही आ रही है इस बार ऐसा हुआ क्यों?- वे आवाजे अब दूर जाती सुनाई दे रही थीं।

हो सकता है इसकी कोई ठोस वजह हो... जो...हमे न पता...आवाज दूर तलक जाकर धीमे होते हुए लुप्त हो गयी।

क्या था ये, यहां सब कुछ उलझा हुआ है। सब कुछ रहस्यमयी है। जगह से लेकर लोगो की बातें मन मे दहशत पैदा करने वाली है।...घन घन... टन टन्न की आवाज सुनकर उसने सब विचारो को परे फेंका। उसे एहसास हुआ उसे जल्दी से वापस जाना चाहिए और नहा धोकर मान्या और छुटकी के साथ यहां मन्नत पूरी करने के लिए वापस आना चाहिए।

वह तेजी से वापस मुड़ गयी। सभी दहशत भरे ख्याल और वे रहस्यमयी घटनाये उसके मन से निकल चुके थे। वह वापस पथरीले मैदान को पार कर नरम दूब से गुजरते हुए रोशनी से भरपूर धर्मशाला की दो सीढ़िया चढ़ बालकनी में वापस आ चुकी थी। रास्ते मे मिलने वाले लोगो की अजीबोगरीब बातों पर उसका ध्यान न देकर वह तेजी से अपने कमरे की ओर बढ़ रही थी। घुमावदार पत्थर की सीढ़िया पार कर वह दूसरी मंजिल के अहाते में बढ़ते हुए वह अपने कमरे के खुले दरवाजे को देख चौंक गई।

दरवाज़ा खुला है...? उसके मन को खटका हुआ - शायद छुटकी और मान्या उठ गई होंगी और यहीं कहीं टहल रहीं होंगी - सोचते हुए वह दरवाजे के पास आकर रुक गई और उसने एक बार फिर सरसरी नजर उस बालकनी के ओर छोर पर डाली। किन्तु उस अहाते में उसे कोई नजर नही आ रहा था।

छुटकी मान्या...तुम दोनों ने यह दरवाजा क्यों खुला रखा है? - आवाज देते हुए वह उस कमरे के अंदर पहुंची।

छुटकी..., मान्या..., उसने एक बार फिर आवाज दी।

कमरा खाली था और सारा सामान अपनी जगह पर था। यहां तक कि छुटकी और मान्या की स्लीपर भी वैसे ही बिस्तर के पास पड़ी थीं। चादर फैली हुई थी और बिस्तर भी अस्तव्यस्त था।

मान्या..., छुटकी... कहां हो तुम दोनों यार आवाज तो दो...! पलटकर कोई आवाज नही आई। निहारिका के चेहरे पर परेशानी के भाव दिखने लगे। वह घबराई और अटैच बाथरूम की ओर लपकी। लकड़ी का मजबूत दरवाजे पर चिपके सफेद हैंडल को खोलकर उसने अंदर झांका। वहां भी सन्नाटा पसरा था। वह फौरन बाहर की ओर भागी। लेकिन उसे सिवाय गुजरती हवा की सरसराहट के कुछ सुनाई नही दिया... न ही मान्या और छुटकी की उत्साह भरी आवाज आई और न ही वे खुद कहीं दिखी। धर्मशाला के उस अहाते में निहारिका परेशान खड़ी चारो ओर देख रही थी...इस उम्मीद से शायद उसे वे कहीं से आती दिख जाएं।

जारी.....

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17 Comments

Shnaya

03-Apr-2022 02:18 PM

👏👏👌🙏🏻

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Inayat

13-Jan-2022 07:35 PM

Intresting

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Sandhya Prakash

02-Jan-2022 11:42 AM

Ye dono kahan gayi...

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