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रतनगढ - कहानी दो जहां की (भाग 6)


                             अध्याय -6 ( अजीब घटनाये)



निहारिका के सामने था रतनगढ का प्रसिद्द पैलेस जो रात के समय झिलमिलाती रोशनी के कारण बेहद खूबसूरत दिख रहा था। वह देख कर उस किले की विशाल बनावट का आंकलन कर रही थी। सांझ ढल कर अमवस्या का अंधेरा हर ओर आ चुका था। उसने देखा कि किले की चाहरदीवारियो मे सिर्फ दो हिस्सो का ही आंकलन उसने कर पाया, बाकि की दो नजर ही नही आ रही है। एक और विचित्र बात है इसमे कि ये इसमे नजर आ रही है कि इसके एक हिस्से यानि आधे पैलेस मे रोशनी नजर आ रही है बाकि आधा हिस्सा देखने मे लग रहा है कि वहाँ है ही नहीं। कितनी विचित्र बात है यह। लग रहा है कि उसकी रोशनी जानबूझ कर बंद कर दी गयी हो। या शायद यह भी हो सकता है कि वह महल का बागीचा हो या फिर कोई ऐसी जगह जो बहुत कम उपयोग मे आती हो। क्यूंकि जहाँ तक हमने इतिहास में या राजमहलो के बारे मे पढा है वहां एक चीज कॉमन है कि वहाँ रोशनी के लिये या तो चिराग का इस्तेमाल किया जाता था या फिर मशालो का। 
बिजली एवं आधुनिक उपकरणो का प्रयोग तो अभी कुछ समय से ही होना शुरू हुआ है। निहारिका उस पैलेस को देखती हुई सोच मे डूबी हुई थी।

 क्या कहा जीजी अभी आपने .... मैने छुटकी सोच कर चौकी।
निहरिका झटके से अपनी सोच से बाहर आ गयी। नहीं… वह तो बस यूं ही छुटकी! फ्लो फ्लो मे निकल गया मुन्ह से। इसमे इतना चौंको मत, तुम भी तो कभी कभी बोल देती हो मै हम हम मैं जो भी मन मे आता है वह...!

हां जीजी वह तो है! हम तो फिर हम ही है कहते हुए उसने अपनी शर्ट उचकायी। उसने अपने शब्दो मे कुछ शब्द और जोड़ते हुए कहा – वैसे मान्या, "हमें धर्मशाला से आते वक्त तो नहीं दिखा ये महल?" - 

"हां, उस वक्त तो नहीं दिखा था शायद, या फिर शायद हम दूसरे रास्ते से होकर मंदिर तक गये होंगे " - छुटकी को सुन मान्या थोड़ा सोचती हुई बोली।

 निहारिका अब खामोशी से अपनी ही सोच में फिर से गुम हो चुकी थी। वह मन ही मन खुद से बात करते हुए कह रही थी - "क्या था वह सब? जो हमने अभी देखा। कब से महसूस कर रहे है हम, वह शिव मंदिर हमारा इतना परिचित है। और ये महल... ये भी परिचित सा लग रहा है। न जाने क्यूं?

 जबकि हम यहाँ पहली बार आये हैं फिर हमारे साथ ये सब पहचाना सा घट रहा है। आखिर क्यों?" मान्या और छुटकी दोनो की ही बातें तो जैसे सिर्फ उस के कान से टकरा कर ही वापस लौट रही थी।

धर्मशाला पहुंचने पर टैक्सी एक हल्की सी तेज आवाज के साथ रुकी। छुटकी मान्या और निहारिका तीनो को एक तेज झटका लगा और वे आगे की झुक गयी।

व्हाट इस दिस….? छुटकी चीखी।

दिस इज योर डेस्टिनेशन.... रतनगढ के पैलेस जाने पर पड़ने वाली पहली सबसे नजदीकी धर्मशाला ‌- ड्राइवर ने भी छुटकी के अंदाज मे ही जवाब दिया। जिसे सुन कर छुटकी को अच्छा नही लगा। वह पलट कर जवाब देते हुए बोली – एक ड्राइवर पर इतनी अकड़ शोभा नही देती। 

छुटकी को सुन मान्या और निहारिका दोनो ने उसे शांत होने के लिये कहा और वे तीनो टैक्सी से बाहर निकल आई।

 छुटकी उस टैक्सी ड्राइवर को घूरते हुए अंदर चली गयी, निहारिका ने मान्या को उसके पीछे जाने का इशारा किया, क्युंकि वह जानती थी कि छुटकी थोड़ी हाइपर है। जाते हुए मान्या बोली कितना अन्धेरा है यहाँ ठीक से दिख भी नही रहा है रास्ता!

 छुटकी चलते हुए चीखी - "हां, चांद भी नहीं दिख रहा आज, तुम्हे!"

"चांद दिखेगा भी कैसे आज अमावस्या है छुटकी?" - निहारिका ड्राइवर की तरफ पैसे बढाते हुए बोली। 

"अमावस्या तो हर महीने होता है जीजी,  क्या आप भी अमावस्या, पूर्णिमा कर रही हैं,  मैं तो बस मजाक कर रही थी।" - बोलती हुई मान्या छुटकी के पीछे धर्मशाला के अंदर की ओर बढ गयी।
 
पैसे देने के बाद निहारिका भी वहाँ से धर्मशाला के अंदर जाने को मुड़ गयी। चारो तरफ शून्य सा बिखरा हुआ था। किसी भी तरह की कोई भी आवाज नही आ रही थी। कि तभी निहारिका के मोबाइल फोन की आवाज ने खामोशी को तोड़ा। 

मोबाइल की आवाज सुनकर निहारिका ने तुरंत ही अपना मोबाइल निकाला, देखा उसकी मम्मी का फोन था। वह फौरन चौंकते हुए बड़बड़ाई, "मम्मी को तो बताना ही भूल गये हम हमारे रतनगढ पहुंचने के बारे मे,  अब मम्मी की हमेशा की तरह डांट मिलेगी खाने को, तैयार हो जाओ निहारिका" – बड़बडाते हुए निहारिका ने कॉल रिसीव की, हड़बड़ाते हुए कहा -"प्रणाम, मम्मी!"

" ये कैसी लापरवाही है निहारिका,  कब से फोन कर रही हूं, नेटवर्क कवरेज से बाहर बता रहा है, छुटकी और मान्या तो छोटी हैं, लेकिन तुम तो सबसे समझदार हो फिर भी इतनी लापरवाही, कब से कोशिश कर रही हूं तेरी कॉल लग जाये और तुम सबसे बात हो सके, लेकिन....!" एक ही सांस मे बोल गयी मिसेस त्रिपाठी।

मिसेस त्रिपाठी को सुन कर निहारिका ने बिन देर किये मिसेस त्रिपाठी से माफी मांगी और उन्हे अपने समय से पहुंचने का बताते हुए कहा कि वह मान्या और छुटकी के साथ कल “गढ वाले महाराज के धाम” जायेगी।

मिसेज त्रिपाठी का गुस्सा थोड़ा कम हुआ, उनकी आवाज मे थोड़ी नरमी सुनाई पड़ी – बता दिया करो बेटा फिक्र हो जाती है बेटा, पहली बार तुम तीनो घर से इतनी दूर गयीं हो इसिलिये फिक्र हो रही थी।   

 निहारिका ने एक बार फिर माफी मांगी मिसेस त्रिपाठी से। मिसेस त्रिपाठी की आवाज अब पूरी तरह सामान्य हो चुकी थी। मिसेस त्रिपाठी ने निहारिका से छुटकी मान्या के बारे मे पूछा तो निहारिका ने उनके कमरे मे होने का कहा। मिसेस त्रिपाठी ने अपने अच्छी मां होने का फर्ज निभाते हुए उसे दोनो का ध्यान रखने का कहा। वे एक क्षण रूकी, उन्हे याद आया कि उनके न जाने की वजह से निहारिका ठीक से मन्नत की विधि पूरी नही कर पायेगी। निहरिका अच्छे से यह कर पाये इसलिये उन्हे उसे इसकी विधि बनानी होगी, वे निहारिका से बोली – निहारिका, मुझे तुम्हे मन्नत उतारने की विधि मे प्रयुक्त कुछ विशेष सामग्री तुम्हे बतानी है। जिसकी तुम्हे मन्नत उतारते समय आवश्यकता पड़ेगी। दो विशेष वस्तुए है जिन्हे तुम्हे गढ वाले महाराज के श्री विग्रह को अर्पित करनी है।

मिसेज त्रिपाठी को सुन कर निहारिका ने उनसे उन विशेष वस्तुओ के बारे मे पूछा, जिसे वे निहारिका को बताते हुए बोली, निहारिका बहुत सावधानी से मेरी बात सुनना – तुम्हे एक नील कमल लेकर अपने साथ जाना है जो तुम्हे वहां आसानी से मिल जायेगा। जिसे तुम्हे गढ वाले महाराज का फूलो का श्रन्गार करते समय उपयोग करना है।

क्या मम्मी इसका मतलब ये है कि हमे आपके गढ वाले महाराज का श्रंगार भी करना होगा – निहारिका चौंकते हुए बोली। जिसे सुन कर ही मिसेस त्रिपाठी ने उसे डपट दिया, बोली – कैसी बाते कर रही हो निहारिका, उनके धाम के इतने नजदीक होकर भी कैसे ये मेरा तेरा कर रही है, महाराज जी बुरा मान जायेंगे, समझ गयी न। मिसेज त्रिपाठी चिंतित सी कहने लगी, “ माफ करना गढ वाले महाराज, बच्ची है जरा सी जुबान फिसल गयी इसकी” वे एक बार फिर निहारिका को डपटने लगी।

मिसेज त्रिपाठी की डांट सुनते सुनते ही निहारिका को यह एहसास हुआ कि उसने खाम्खा ही गढ वाले महाराज का जिक्र छेड़ दिया। वे तो बुरा नही मानेंगे लेकिन हमारी मम्मी जरूर ही हमे ये एहसास दिला कर छोड़ेगी कि हमसे कितनी बड़ी गलती हो गयी। कुछ देर सुनते रहने के बाद निहारिका ने छुटकी और मान्या के पास जाने का कह फोन रखने को कहा। मिसेज त्रिपाठी तुरंत ही कहने लगी वे भी न अपनी ही बातो मे मशगूल हो जाती हैं, तू जा मै रखती हूं, करती हूं तुझसे सुबह बात। उन्होने निहारिका को एक बार फिर स्पष्ट सारी बाते ध्यान रखने की चेतावनी दी और फोन रख दिया।

 निहारिका फोन रख कर मुड़ी और धर्मशाला के अंदर जाने लगी। धर्मशाला के दरवाजे पर पहुंचते ही उसकी नजर दरवाजे पर पड़े उस लेप पर पड़ी जिससे अब जोरदार महक चारो ओर बिखरने लगी।

उसकी महक से निहारिका का दिलो दिमाग तरो ताजा हो गया। उसके अंतर्मन मे खुशी की तरंगे उठने लगी वह उसकी सुगंध महसूस कर रही थी तभी मान्या की थोड़ी खनकती आवाज उसके कानो मे पड़ी।

वह दरवाजे के उस ओर से थोड़ा तुनकते हुए चली आ रही थी, वह तेज कदमो से उसके पास आई और तुनकते हुए बोली - "कहां रह गई जीजी आप? आप जानती तो हैं मै  ज्यादा देर नहीं झेल पाती हूं उस छुटकी को! "

"हां, बस आ रहे हैं मान्या, मम्मी का फोन था, उनसे ही बात करने लगी।" - बोलती हुई निहारिका मान्या के साथ दरवाजे के उस तरफ बढ़ गई। 

कितनी अच्छी खुशबू आ रही है मान्या यहाँ? सारी थकन निकल गयी एकदम तरोताजा महसूस कर रहे हैं हम! 

क्या जीजी अब आप तफरी ले रहीं है मेरी नही, यहाँ कहाँ आपको मनभावन सुगंध महसूस हो रही है – मान्या को सुन निहारिका चौंकी। हां नजर नही महसूस हो रही है तुम्हे नही हो रही क्या? 

नही जीजी! मुझे महक तो क्या यहाँ दुर्गंध भी न मालूम पड़ रही है। खैर चलो अब बहुत थकन हो रही है कहते हुए वह आगे बढ गयी। वहीं निहारिका ने तुरंत ही पीछे मुड़ कर देखा। पलट कर देखते हुए उसकी नजर यकायक दरवाजे के बाहर खाली पड़े अंधेरो की ओर गयी।   

 दहशत भरे सन्नाटे के साथ बाहर घुप्प अंधेरे में भी उसकी आखो को वह नजर आया जिसे देख उसके पसीने छूटने लगे। वह देख रही थी बाहर अंधेरे में चमकती पीली आंखे, दो लम्बे नुकीले दूधिया दांत, और उसे अगले ही पल उसे सुनाई दी र घड़घड़ाहट की वह भयावह आवाज जिससे उसका कलेजा ही कांप गया। उसके पैर वहीं जम गए, और  एक पल को तो उसकी पलके भी झपकना बन्द हो गयी। वह बुत बनी खड़ी लगातार उधर ही निहार रही थी...! कि तभी “जीजी....!”

मान्या की तेज आवाज से उसका ध्यान टूटा। वह तुरन्त आवाज की ओर पलटी, निहारिका की ओर से कोई जवाब न मिलने पर मान्या अपने दोनो हाथ कमर पर रख कर तुनकती हुई खड़ी थी। निहारिका ने उसके बनावटी गुस्से को इग्नोर मारा और उसे अभी आने का इशारा कर दोबारा दरवाजे से बाहर की ओर देखा। वह एक बार फिर हैरत मे पड़ गयी। अब वहां न घड़घड़ाहट की आवाज थी और न ही वह पीली आंखे और नुकीले दूधिया दांत उसे नजर आ रहे थे। अब वहां दिख रहा था धर्मशाला के अंदर जलती रोशनी से बाहर फैला धुंधलका उजाला।

“कोई भी तो नही है बाहर, वहम ही होगा यह हमारा!” सर झटकते हुए निहारिका  मान्या के साथ कमरे मे जाकर छुटकी के पास पहुंच चुकी थी। तीनो थकी हुई थीं सो वह बड़ी तेजी से धर्मशाला में पड़े बिस्तर पर जाकर धमक गयीं। छुटकी और मान्या दोनो रतनगढ़ की खूबसूरती के बारे में चर्चा कर रही थीं। वहीं निहारिका बिस्तर के एक ओर पड़ी हुई अपने सपनो के बारे में सोच सोच कर उलझन में थी। वह याद कर रही थीं उन धुंधली सी परछाईयो को जो उसने अभी कुछ समय पहले ही उस पुरातन शिव मंदिर में देखा था, उन्हें महसूस करने के साथ ही उनकी वास्तविकता का अनुभव किया था। हालांकि वह क्षणिक था लेकिन था तो वास्तविक। 

***********

हीर...! रुको यह क्या बचपना है तुम्हारा कि तुम्हे उस पुरातन शिव मंदिर के बारे में अभी जानना है। उसमे ऐसा कोई रहस्य नही है जैसा कि तुम सोच रही हो हीर! और मेरी पांडुलिपि मुझे वापस करो। वह बहुत महत्वपूर्ण है, तुम्हारे इस बचपन से भरे खेल से भी ज्यादा महत्वपूर्ण - एक मर्दानी आवाज गूंज रही थी।

हल्के नीले रंग के घेरदार वस्त्रो में लिपटी एक युवती, एक बड़े से महल के अहाते में दौड़ रही थी। उसके हाथ मे श्वेत गत्तों का एक मोटा पुलिंदा था जिस पर हवा के जोर से बलखाते हुए काले रंग के इक्का दुक्का कलात्मक अक्षर बीच बीच झिलमिला जाते थे। उसके पैरो में पीले रंग के मोटे कपड़ो से बनी मोजड़ी थी जिस पर कशीदा कारी की गई थी।

वह दौड़ते हुए तेज आवाज मे कहती जा रही थी - नही पहले आप हमें यह बताइए आपने अंदर अपने अध्ययन कक्ष में सितारों की ऐसी कौन सी बदली हुई चाल देख ली, जिससे आपकी आंखों में अश्रु आ गए। जब तक हम जान नही लेंगे यह आपको वापस नही करेंगे बाबा..!

अरे यह क्या बात हुई भला - लड़कीं के पीछे बड़ी तेजी से चलते एक प्रौढ़ उम्र के व्यक्ति का स्वर गूंजा - धुंधला सा नजर आने वाला गोल चेहरा, सामान्य कद के साथ सिर के उपर लम्बी गांठदार चोटी वाला वह आदमी हीर नाम की उस दौड़ती हुई लड़की को आवाज दे रहा था।

"भले ही कोई बात हो या न हो लेकिन हमें वह कारण जानना है" - वह लड़कीं रुक कर मुड़ते हुए बोली।

तो तुम नही मानोगी। ठीक है, बताता हूँ ... वह आदमी थक कर रुक गया, और हाँफते हुए सुस्ताने लगा - सुनकर लड़कीं के चेहरे पर व्यग्रता के भाव आ गए - और वह तुरन्त ही मुड़ कर उत्सुकतावश उस व्यक्ति के समीप चली आई।
वह पुरातन शिव मंदिर भले ही राजपरिवार का शाही मंदिर नही है।

 लेकिन राजपरिवार के सदस्यों के लिए वह उतना ही महत्वपूर्ण है जितना कि महल में निर्मित वह “गढ़ वाले महाराज का धाम”। परंतु यह अलग बात है कि राजपरिवार के लोग उस मंदिर में जाना इतना पसंद नही करते हैं। लेकिन महाशिवरात्रि यह पर्व ऐसा है कि राजपरिवार का हर सदस्य वह पर्व पुरातन शिव मंदिर में ही उल्लास के साथ मनाता है। एवं यह परम्परा आज से नही सदियों से चली आ रही है। लेकिन .... - के साथ ही आने वाली वह पुरुष प्रतीक आवाज अचानक खामोश हो गयी। मानो वह अपनी खामोशी के साथ कुछ ऐसा रहस्य छुपाना चाहती हो जिसका अव्यक्त रहना ही श्रेष्ठ हो।

"लेकिन क्या बाबा...!" हीर नाम की उस लड़की की मधुर आवाज ने उस सन्नाटे को तोड़ वातावरण गुंजायमान कर दिया।

उस पुरुष स्वर ने एक पल की खामोशी ओढ़ ली। उसके चेहरे के भाव बदल कर सख्त हो गए। वह बोला - हीर.....! आने वाली महाशिवरात्रि के पावन पर्व बहुत कुछ बदलने वाला है। जिसका जरिया वह अघोरीनाथ तुम्हे बनाएंगे - उस पुरुष स्वर में चिंता साफ झलक रही थी।

यह तो बेहद खुशी की बात है न बाबा कि वह जरिया हम बनेंगे। इसका अर्थ तो यह हुआ कि भोलेनाथ की हम पर असीम कृपा है जो वह अपने कार्य के लिए हमें चुनेंगे - हीर नाम की उस लड़की के स्वर में खुशी जाहिर हुई और वह स्वयं को बहुत भाग्यशाली अनुभव कर स्वयं पर इतरा रही थी।

इस बात से अनजान आने वाली महाशिवरात्रि उसके लिए वरदान साबित होगी या अभिशाप यह वक्त के हाथों में था और वक्त की गर्त में क्या छुपा यह कौन जानता था,  कोई कैसे नही मैं जानता हूँ , मैं रोकना चाहता हूँ आने वाले उस अनर्थ को और इसके लिए हीर का इस राज्य से दूर जाना ही उचित है वह पुरुष स्वर चिंता से बड़बड़ाने लगा। जिसे उसके सामने खड़ी हल्के नीले रंग के वस्त्र पहने वह लड़की अस्पष्ट सुन रही थी।

वह तेजी से बोले - नही! यह इतना आसान नही है हीर जितना कि तुम समझ रही हो, हीर! क्या तुम इस बात से अनभिज्ञ हो कि राज्य में हालात किस तरह के है।भयंकर अकाल की स्थिति बन चुकी है। जिससे निपटने के लिए अब उपाय तलाश किये जा रहे हैं।

हम जानते है बाबा! आप भी इस विषय पर इतनी चिंता मत किजिये - ऐसा कहते वक्त वह लड़कीं का वह पुलिंदे वाला हाथ हिल रहा था। जिससे वह बिखर रहे थे और उनमें से एक नीचे सरक भी गया था। सो उसने उन्हें व्यवस्थित किया और पुनः अपनी नरम हथेलियों में दबाते हुए आगे बोली - महादेव सब कुछ भला ही करते करते है, बाबा।हमे आश्चर्य है आप इस बात को भूल कर चिंता में ग्रस्त हैं।

वह हड़बड़ाए से बोले - हां!क्योंकि मैं एक पिता भी हूँ हीर।कहते समय उनकी जुबान मद्धम हो चुकी थी।

वहीं हीर की नजर नीचे पुलिंदे से अलग हुए एक मामूली मोटे गट्टे पर पड़ी जिसके काले अक्षर चमचमा रहे थे।उसने बिन देर किये वह गत्ता उठाया जिस पर राजसी शैली में लिखा था - समय की मार से रतनगढ़ राज्य एक ऐसा भीषण समय देखेगा जब राजसी परिवार उसे दूर करने के उपयुक्त नरबलि के लिए पाशविक कार्य करने को मजबूर हो जाएगा।


नही...यह क्या लिखा है...बाबा।वह जोरदार चीखी - बाबा! कमरे में बिस्तर के एक कोने पड़ी निहारिका चीखते हुए उठ बैठी।वह घबरा रही थी।उसकी सांसे उखड़ रही थी।कमरे की छत के अंदरूनी हिस्से में लगे सीलिंग फेन की चरमराहट के बावजूद भी वह पसीने से नहा चुकी थी।उसका हाथ हवा में लटका था और उसकी मुट्ठियाँ बन्द थीं।

“जीजी....! जीजी..! आप ठीक है चीखी क्यों..?” छुटकी और मान्या हड़बड़ाई सी उठते हुए बोली। वह दोनो उसके दाएं बाये आ चुकी थीं और लगातार निहारिका की ओर देखते हुए उसके बोलने का ही इंतजार कर रहीं थीं।
उलझनों में घिरी निहारिका कब नींद की आगोश में पहुंच गई वह जान ही न पाई। छुटकी और मान्या की आवाज से वह धीरे धीरे सामान्य हुई। उसके मन मे अभी भी वही घटना गूंज रही थी। हालांकि यह घटनाये उसके लिए बिल्कुल अजब नही थीं लेकिन फिर भी वह इनसे उतना ही हैरान और परेशान होती जितना कि वह उन्हें सात साल की उम्र में पहली बार देखने पर हुई थी।
बहने बेकार में क्यों उसके सपनो से अपनी नींद खराब करें,  उसके मन मे यह विचार आने पर उसने दोनो से इतना कहा, “हमेशा की तरह बुरा सपना देखा अब क्या कैसे वह बेसिर पैर का ही था तभी हमें उठा दिया क्योंकि हमारी सुबह तो नॉर्मल कभी रहती है नही।“

उसकी बात सुन दोनो ने अपना माथा पीटते हुए निहारिका को खुद का ध्यान रखने का कहा। वे जाकर वापस बिस्तर पड़ गयी और चादर तान कर लुढ़क गयी।

हमेशा की तरह निहारिका को नींद नही आ रही थी। वह समझ चुकी थी ब्रह्म मुहूर्त हो चुका है। क्योंकि उसके सपने हमेशा ही उसे ऐसे समय पर उठाते थे जब वह चाह कर भी दोबारा नही सो पाती थी। स्वपन लोक के इस दृश्य के बाद उसे बेहद अजीब महसूस हो रहा था। उसे कमरे में घुटन महसूस होने लगी और वह ताजी हवा की तलाश करते हुए वह वहां से बाहर की ओर चली आई। जहाँ लम्बी सी बालकनी थी। वह धर्मशाला की उस लंबी बालकनी में खड़ी थी जहां से उसके सामने नजर आ रहा था रतनगढ का राजसी किला और उसकी सबसे विचित्र बात जिसे महसूस कर उसके शरीर मे झुरझुरी दौड़ गयी। उसे याद आया टैक्सी का वह अजीब छोटा सा सफ़र...!


सामने दिख रहा वह खूबसूरत पैलेस इस वक्त दुनिया का आठवां अजूबा लग रहा था। वह खड़ी खड़ी उलझन में थी कि तभी उसके कानो में किसी के चिंघाड़ने और घुरघुराने कि आवाजे पड़ी।

वू वूऊऊऊ...!श्शशश श्शशश.. सी सी सी..! इन आवाजो को सुन उसके उलझन भरे चेहरे के भाव बदलते हुए दर्द में परिवर्तित हो रहे थे। हालांकि वह किसकी है यह स्पष्ट नही हो पा रहा था।

ऐसा लग रहा है जैसे वह आवाज सिसक रही हो - वह बड़बड़ाई - यह आवाज दर्द की है। उसके कदम स्वतः ही उस बरामदे से बाहर की ओर बढ़ने लगे। बरामदे से बाहर बनी दो सीढियो को पार कर वह हल्की नरम घास वाली जमीन पर चलते हुए वह बड़ी उतावली में थी। हवा में घुली वह अजीब सी बदबूदार महक भी उसके रास्ते को रोक नही पाई। निहारिका बड़ी तेजी से उस आवाज का पीछा कर रही थी। नरम घास से निकल कर वह पथरीले रास्ते पर पहुंची। जिसे पार करते हुए वह रतनगढ पैलेस के मुख्य दरवाजे तक आ चुकी थी जहां वह आवाज थोड़ी और तीव्र हो चुकी थी। वह एक क्षण वहां रुकी उसने एक बार फिर वह सिसकी भरी गुर्राहट की आवाज सुनी तब उसका दायां हाथ स्वतः ही उस लकड़ी के बड़े से दरवाजे की ओर बढ़ गया। वह उसे स्पर्श करने ही वाली थी कि तभी उसे अपने कंधे पर कोई अनजान स्पर्श महसूस हुआ....वह हड़बड़ा कर चौंकते हुए मुड़ी!…..

 क्रमशः 

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19 Comments

Shnaya

03-Apr-2022 02:18 PM

शानदार भाग

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Inayat

13-Jan-2022 07:35 PM

Ab kaun aa gaya, niharika ke pas.

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Shalu

07-Jan-2022 01:54 PM

Nice

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