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रतनगढ - कहानी दो जहां की (भाग 5)

                        अध्याय 5 ( वो कौन था) 

निहारिका भी बाहर आ गयी। परंतु वह अब काफी उलझी हुई दिख रही थी। छुटकी और मान्या के पास आने पर निहारिका ने अपने चेहरे पर छाई उलझनों को दूर पटका और बनावटी मुस्कान अपने चेहरे पर रखते हुए उसने आसपास निहारा।

"जीजी, आ गयी आप! अब यह बताओ, हम लोग कहां जाने वाले हैं?" - मान्या ने काफी उत्साहित होते हुए पूछा।

निहारिका बोली, - कोई भी "गढ़ वाले महाराज" के धाम तो जाने को तैयार नही, हम एक काम करते हैं, यहां आसपास भी बेहद खूबसूरत मंदिर है।..... और जीजी कृत्रिम नदी भी है इधर, जिसका पानी सात रंगों जैसा बहता है। जिसमे जगह जगह सुंदर हर तरह के कमल हैं। उसकी आवाज में उत्साह साफ झलकने लगा - वह आगे बोली - और जीजी हमने यह भी सुना है दुर्लभ नील कमल भी इस कृत्रिम नदी में पाए जाते हैं। चलो हम सब उसी नदी पर सबसे पहले घूमेंगे। फिर कहीं और जाएंगे।

छुटकी के चुप होने की देर भर थी कि मान्या बोली - जीजी, शुरू हो गया अपना टेप रिकॉर्डर। न जाने क्यों इसे ये रतनगढ इतना पसंद है। हम एक काम करेंगे जब वापस जाएंगे न तब इसे यहीं रतनगढ छोड़ जाएंगे।

हां! बिल्कुल आप दोनों यह कर सकते हो। मुझे कोई इश्यू नही है। छुटकी खुशी से उछलते हुए बोली।

बस अब बातें खत्म और चलो " हम पहले आस-पास के मंदिर में दर्शन करेंगे शाम तक,  और फिर धर्मशाला मे अराम कर सुबह मन्नत पूरी करने के लिए \'गढ़ वाले महाराज के धाम\' निकलेंगे।" - निहारिका ने कहा और वह वहां से आगे की ओर बढ़ गयी।

चलते हुए अभी भी उस के दिमाग में उन तीनों औरतों की बातें घूम रही थी, जो हाथ धोते समय एक दूसरे से बातें कर रही थी आज अमावस्या है और आज रात होने के बाद यहां के लोग घर से बाहर नहीं निकलते।”

मान्या और छुटकी भी उसके साथ में आ गयी। उबड़ खाबड़ पत्थरो को चुन कर सलीकेदार बनाई गई सड़क से गुजरने के बाद वे तीनों थोड़ी आबादी वाली जगह पर पहुंची और वहां के स्थानीय निवासियों से अतिरिक्त प्रसिद्ध मन्दिरो के बारे में थोड़ी पूछताछ करने लगी। गांव वालों ने उन्हे बताया यहां से कुछ आगे चलने पर एक प्राकृतिक तालाब है। उसके किनारे महादेव जी का एक प्राचीन मंदिर है। वह मंदिर सदियों से यहां है। कभी प्रकृति तो कभी दुष्टों का प्रकोप झेलता वह शिव मंदिर आज भी सिध्द है एवं अपनी जीर्ण शीर्ण अवस्था मे रहकर भी भक्तों की मुरादों को पूरी कर उन्हें अपना मुरीद बना रहा है। 

सभी को उनकी जानकारी देने के लिए निहारिका धन्यवाद कहा और वह छुटकी तथा मान्या के साथ वहां जाने के लिए निकल गयी। कुछ कदमो के बाद ही उनके सामने मुश्किल से मिलने वाले अद्भुत चमक़दार सफेद पत्थर से निर्मित सुंदर नक्काशी से सजे हुए खूबसूरत मंदिर एक एक कर गुजर रहे थे। मान्या और छुटकी दोनो ही हैरानी से सब ओर देखते हुए चल रही थीं।
कुछ ही आगे चलकर मरुस्थली खेजड़ी के इक्का दुक्का पेड़ो के नीचे से गुजरते हुए निहारिका छुटकी और मान्या ने एक बड़े से मैदान में प्रवेश किया। जिसमे सामने ही एक जलाशय था जो चमक़दार झिलमिलाते पानी से भरा हुआ था।

वहीं उसके तट पर ही एक काफी पुराना और प्रसिद्ध शिव मंदिर था। जिसके चारो ओर बने चार खम्भो पर सर्पाकार लहराते हुए निशान थे। उस क्षेत्र मे आते ही निहारिका को एक सकारात्मक अनुभव होने लगा। एवं उसके मन की सारी परेशानियां, उलझने, बाधाएं दूर हटती जा रहीं थीं। एवं मन मे अनंत खुशी समाहित होने लगी। उन तीनों ने मंदिर के बाहर ही एक किनारे पर चप्पल उतारी और वे तीनों अंदर बढ़ने लगी। लेकिन मंदिर की पहली सीढ़ी पार करने से पहले ही निहारिका रूकी, एवं तुरन्त पीछे मुड़ी और मुड़कर, पीछे बढते हुए  तालाब के किनारे पहुंच गयी। तालाब की सीढियो से उतरते हुए वह जल तक पहुंच गयी। उसने जलाशय के जल मे हाथ पैर धुले एवं वापस मंदिर की सीढियो पर आ पहुंची। छुटकी और मान्या दोनो ही हैरत से उसे देखते हुए अभी भी वहीं खड़ी थी। 

"चले अंदर" कहते हुए निहारिका ने कहा।
 
लेकिन जीजी! आप अचानक से कहाँ चली गईं - छुटकी सवाल पूछते हुए बोली।

कहीं नही बस अपनी स्लीपर चेक करने गई थी, सही जगह रखी है या नही। 

ओहहो जीजी! आपने  तो हमे डरा ही दिया था। हमे लगा न जाने आपको क्या याद आया,  या शायद आपमे कोई बुरी शक्ति प्रवेश कर गयी जो आप इस मंदिर की सीढियो को पार नही कर पा रही हो – छुटकी धीमे से हंसी।

"चलो अंदर" कुछ भी बोलती रहती हो - झिड़कते हुए निहारिका आगे बढ़ गयी।

अंदर पहुंच कर निहारिका खड़े होने की जगह तप मुद्रा मे बैठ गयी और महादेव जी की आराधना आरंभ की। दोनो हाथ जुड़े हुए, शरीर तप मुद्रा में, आंखे बंद और होंठो पर बुदबुदाहट लिये निहारिका कुछ देर तक यूं ही जाप करती जा रही थी। मान्या और छुटकी दोनो ही उसे देख हैरानी से मुंह बाए एक दूसरे को ताक रही थी। जब निहारिका उठी तब वे वहाँ से बाहर चली आई। 

बाहर आने के बाद निहारिका ने एक बार फिर शिव मंदिर को प्रणाम किया और वह सीढियो से नीचे चली आईं, उसने अपनी स्लीपर पहनी और एक बार फिर उनके सामने वही प्रश्न अब क्या किया जाये, कहाँ घूमने चला जाये? खड़ा हो गया।

मान्या और छुटकी दोनो ने ही घड़ी की ओर देखा घड़ी मे अभी समय था। अभी भी तीस मिनट बचे थे उनके पास। आसपास देखते हुए मान्या की नजर मंदिर से सटे तालाब पड़ी। उसने छुटकी की ओर उसे देखने का इशारा किया। छुटकी के उधर देखने भर से उसके चेहरे पर एक बड़ी सी मुस्कुराहट आई और वो दोनो ही उधर की ओर लपकी। निहारिका उन्हे उस जल मे उतरने मे रोकने के लिये उनकी ओर बढी। उसके मन मे एक अलग ही उमंग उछल रही थी। तालाब का वह जाना पहचाना सा रस्ता पार करते हुए उसे बेहद अलग अनुभव हो रहा था। उसे महसूस हो रहा था जैसे वह सब पहचाना हो। हालांकि वह पहले कभी वहाँ नही आई थी और न ही उसने कभी किसी भी माध्यम से उस जगह को देखा था। वह तो रतनगढ के नाम से सहम जाती थी फिर उसे अचानक उस जगह पर अपने पन का एहसास होना थोड़ा अजीब लग रहा था। धीरे धीरे कर एक साथ कई धुंधली सी तस्वीरें उस के दिमाग में उभरने लगी। उसे अपना सर भारी लगने लगा और चलते हुए थोड़ी तकलीफ होने लगी।

 वह थक कर वहीं पहली सीढी पर ही बैठ गई,  लेकिन छुटकी और मान्या दोनो ही तालाब की सबसे आखिरी सीढी के पास पहुंच कर ही रूकीं।
मान्या ने पीछे मुड़ कर आवाज देकर उस से पूछा - "जीजी, क्या हुआ, आप भी यहीं आ रही हैं ना?"

आं.. हां तुम दोनो वहीं एंजोय करो लेकिन याद रखना तालब मे उतरना नही है, बड़े बूढे कहते हैं कि ऐसा करते समय कई बुरी शक्तियां हमारे आसपास मंडराने लगती है और हमे पता भी नही चलता है। समझ गयी दोनो... ओके..! 
दोनो के हामी भरने की आवाज सुनाई देने पर निहरिका ने यह सोचते हुए अपनी नजरे चारो ओर डाली देखा जाये यहाँ और कौन कौन सी जगहे हैं देखने लायक।

निहारिका ने देखा वह जगह बेहद खूबसूरत थी। तालाब मे चम चम करता पानी भरा हुआ था जो अब ढलते हुए सूरज की रोशनी के कारण सुनहरा दिख रहा था।

निहारिका ने देखा तालाब के उस पार उसके सामने की पहली सीढी पर कोई बैठा हुआ है। काले दिखते उसके कपड़े थोड़े अलग लग रहे थे। वह थोड़ा शांत था और पानी को एकटक देखता जा रहा था। गुजरते कुछ सेकंड के बीच बीच मे वह पानी की उस शांति को हलचल मे भी बदल रहा था। उसने थोड़ा और ध्यान से देखा कैसे पानी अचानक से हिल रहा है। हां उसने धीमे से कुछ पानी मे उछाला जो मेढंक की तरह उछलते हुए दूर तलक गया और अंत मे पानी मे गोता लगा ते हुए उसी मे समा गया।

निहारिका को महसूस हुआ जैसे यह सब कुछ पहले भी घटित हो चुका है शायद उसके सपनो मे ही कभी, जो उसकी स्मृतियो मे अभी तक शेष है। उसे अपना सर थोड़ा हल्का महसूस हुआ। 

“ये क्या था?” निहारिका को अचानक धमक सुनाई पड़ी। और अचानक ही सामने बैठा वह काले कपड़ो वाला लड़का उठ खड़ा हुआ। उसने अपनी गर्दन कई बार दायें बायें घुमाई। वह आगे बढा और सीढी के अंत तक जाकर फिर लौट कर वापस उसी जगह पर आ गया। उसने रूक कर गहरी सांस अपने अंदर खींची और फिर उसे छोड़ कर एक बार फिर अपनी गर्दन दायें बायें घुमाने लगा। अब वह वहाँ से सीढियो के दूसरी तरफ तेजी से गया और घूम कर फिर वापस लौट आया।

निहारिका को उसका व्यवहार बहुत ही अजीब महसूस हो रहा था। यह कर क्या रहा है। और यह अचानक जमीन हिली जैसी क्युं मालूम पड़ी। शायद यहां पास ही कोई चट्टान खिसकी है।

उसने देखा वह लड़का अब आंखे बंद कर अपने दोनो हाथ हवा मे फैलाये था। अजीब सनक है इसमें। अभी इसे देख कर लग रहा था कि वह कुछ ढूंढ रहा है और अभी देखो बड़ी ही शिद्दत से प्रकृति को महसूस कर रहा है। निहारिका ने अपनी बहनो की ओर देखा वे दोनो अब सेल्फी लेने मे लगी हुई थी। 

अपनी बहनो की तरफ से निश्चित हो उसने एक बार फिर सामने नजर डाली। अब  सामने कोई नही था। 

कहाँ गया वह... सोचते हुए उसने तुरंत ही इधर से उधर नजर डाली। किंतू दूर दूर तक उसे कहीं कोई नजर नही आया। वह हैरत मे पड़ गयी... “कौन था वो… आखिर...!” बड्बड़ाते हुए निहारिका चारों तरफ देख कर कुछ याद करने और समझने की कोशिश करने लगी - उसे वह मंदिर,  तालाब,  पेड़-पौधे सब इतने जाने पहचाने से लग रहे थे। जबकि वह आज पहली बार यहां आई है और शायद आखिरी बार भी, फिर क्यों... ? शायद कुछ सवालो के जवाब होते ही नही और ये क्यूं भी उसके इन्ही सवालो मे से एक है। सोचते हुए उसने मन मे आ रहे सभी विचारो को खुद से दूर धकेल दिया और घड़ी मे समय देखा। तीस मिनट कैसे फुर्र हो गये उसे एहसास ही नही हुआ। उसके जेहन मे एक बार फिर बोर्ड पर लिखी चेतावनी अक्षरश: घूमी।

 "अब शाम तक यही रहने का इरादा है क्या?" - तालाब के पानी से उन दोनों को बच्चियों की तरह खेलता देख निहारिका ने उन दोनों से जल्दी से पूछा।
"आप भी आओ जीजी,  बहुत मजा आ रहा है।" - छुटकी निहारिका की बात को अनसुना करती हुई बोली। लेकिन मान्या वहाँ से निहारिका के पास चली आई!

" छुटकी ! मना किया था तालाब के पानी से नही खेलना है तुझे और तू उसी को उछालने मे लगी हुई है – निहारिका उस पर गुस्साई - अब बहुत हो गया, अभी के अभी बाहर निकलो। चलना है हमें।" 

" जीजी थोड़ी देर और , आप तो जानती ही हैं न, रोज रोज थोड़े ही मिलता है तालाब और इतना ठंडा पानी और साथ मे इतनी खुली और खूबसूरत जगह" - छुटकी उन दोनों की तरफ आते हुए मुंह बनाती हुई बोली।

 निहारिका वहां से जल्दी से जल्दी जाना चाहती थी, क्योंकि पता नहीं क्यों उसे वह जगह जानी पहचानी लग रही थी। जबकि वह आज पहली बार यहां पर आई थी। लेकिन फिर भी वह तालाब, वह प्राचीन शिव मंदिर, यह मंदिर परिसर सब कुछ उसे पहचाना सा लग रहा था, न जाने क्यूं? वह महसूस कर रही थी  जैसे बरसों यहां पर रही हो, या शायद आती जाती रहती हो।

 निहारिका वहां काफी असहज महसूस कर रही थी। किंतु आदतवश अपनी बहनों को वह यह बता भी नहीं सकती थी। छुटकी भी बाहर निकल ही आई। तब वे तीनो वहाँ से वापस निकलने लगी। वे पैदल आ तो गयी थीं लेकिन वापस पैदल जाने की हिम्मत उनमे नही हो रही थीं। क्यूंकि पूरे तीस घंटे का सफर और बहुत सारी थकान के कारण उनके लिये अब कदम बढाना भी मुश्किल हो रहा था। लेकिन वे सभी पैदल चलते हुए वहाँ से आगे बढने लगे। अब रास्ते मे उन्हे कोई भी नजर नही आ रहा था। यहाँ तक कि सभी घरो के दरवाजे भी बंद हो चुके थे। एवं चलते हुए निहारिका ने एक विचित्र बात नोटिस की। सभी घरो के दरवाजो की चौखट पर उसने एक विचित्र लेप लगा हुआ देखा। रतनगढ की उन सड़को पर केवल छुटकी और मान्या की आवाजे ही गूंज रही थी। निहारिका को मैनेजर की कही बात याद आई “आज की रात कोई भी घर से बाहर नहीं मिलेगा, क्योंकि आज अमावस्या की रात है।”..... नही, नही उन्होने कहा था कि गढ वाले महाराज के धाम वाले रस्ते पर आज कोई भी नही मिलेगा, क्यूंकि आज अमावस्या की रात है।”

 निहारिका जैसे खो चुकी थी, चारों तरफ का विचित्र माहौल और परिस्थितियां देख कर, वह समझने की कोशिश कर रही थी कुछ ऐसा जो सिर्फ वही महसूस कर पा रही थी।

जब निहारिका छुटकी और मान्या तीनो ही उस कृत्रिम नदी के पास से गुजरी तब वहाँ महक रहे विचित्र फूलो की खुशबू से उन सभी का ध्यान उस ओर गया। शुरू से लेकर नजरो के आखिरी छोर तक उन्हे वह नदी फूलो और सतरंगी छटा से भरी हुई दिखाई दी। कुछ पल तक तो वे उसकी खूबसूरती मे ही खो गईं। वे तीनो नदी के उस जलाशय को देख रही थीं कि उन्हे नदी के दूसरे किनारे पर तेजी से हलचल महसूस हुई। तीनो की नजरे तेजी से उस तरफ गयीं। लेकिन उन्हे कुछ नजर नही आया। 

जीजी! आपको भी कुछ आवाज आई थी न जैसे कि उधर से कोई भागा हो कुछ इस तरह की आवाज जीजी!

कही उसकी स्वीकृति से छुटकी का खोजीमन भटक न जाये यह सोच कर निहारिका ने तुरत न मे सर झटक दिया। छुटकी ने मान्या की ओर उम्मीदों से देखा लेकिन मान्या ने अपने कंधे उचका दिये तब वह मुन्ह बना कर एक बार फिर उस ओर देखने लगी। जब कुछ पल देखते रहने के बाद भी उसे कुछ नजर नही आया तब उसने \'शायद वहम ही होगा मेरा\' सोचते हुए अपना फोन निकाल कर उसमे उलझ गयी। उनमे से तीनो ने नदी के उस पार खड़े तने के पीछे से झांकती हुई गुस्से भरी चमकीली आन्खो और एक लम्बी पूंछ पर ध्यान ही नही दिया जो बार बार आगे पीछे घूम रही थी।  

 जब सूरज की किरणे मद्ध्म पड़ चुकी थीं और आसमान लाल हो चुका था तब निहारिका को इस बात का एहसास हुआ कि थोड़ी दूर पैदल चलने मे परेशानी को दरकिनार करते हुए वे धर्मशाला का रास्ता भटक गयी थीं। वही बेफिक्र छुटकी तुरंत ही मान्या के साथ खूबसूरत यादे बटोरने लगी। उन्हे उनके काम मे मग्न देख निहारिका ने खुद ही अपना फोन निकाला और धर्मशाला की दूरी और सबसे छोटे मार्ग को देखा। ये देख उसके चेहरे पर कुछ राहत के भाव आये कि वे सब अब लगभग मुख्य मार्ग पर आ चुकी थी‌ जो नदी से करीब सौ मीटर की दूरी पर था। उसने धर्मशाला तक जाने के लिए टैक्सी का विचार किया और  छुटकी और मान्या दोनो को आवाज देकर उसने मुख्य सड़क की ओर इशारा कर दिया और खुद आगे बढ गयी। क्युंकि वह जानती थीं कि अगर वो वहाँ रूकी तो तब छुटकी जानबूझ कर थोड़ी और देर करायेगी। उसके जाते ही छुटकी और मान्या ने भी अपने फोनो को अपने पाउच मे रखा और निहारिका के पीछे आईं। कुछ ही पलो मे वे सभी मुख्य मार्ग पर थीं और टैक्सी का इंतजार कर रही थीं। 

सांझ तेजी से अपने पैर पसारने लगी थी और रतनगढ की उस सड़क पर अभी तक उन्हे कोई टैक्सी तो क्या एक साइकिल तक नही दिखाई दी। निहारिका के चेहरे पर घबराहट के भाव साफ दिखने लगे थे तो वही छुटकी बेफिक्र होकर चारो ओर निहारने मे लगी हुई थी। वहीं मान्या के हाथ मे उसका फोन चमक रहा था और वह अपनी क्लिक की हुई सारी तसवीरें अपने रिश्तेदारो दोस्तो को भेजने मे मशगूल थी।

 निहारिका की नियती या उसकी किस्मत ही थी कि उसकी नजर सामने से आती एक टैक्सी पर पड़ गयी। उसे देख कर उसके परेशान चेहरे पर खुशी के ऐसे भाव झलके जैसे डूबते को तिनके का सहारा मिल गया हो। निहारिका और छुटकी ने हाथ देकर उसे रोकने की कोशिश की लेकिन उसकी गति बिल्कुल कम नही हुई।

शायद वह भी उन्हे शाम ढले देख कर भयभीत हो रहा था। जब वह और पास आ गयी तब उन्हे उसे रोकने का एक ही रास्ता नजर और वे हाथो मे हाथ डाल कर  चेन बनाकर सड़क पर खड़ी हो गयीं। टैक्सी चालक को सड़क से गुजरने का कोई रस्ता नजर नही आया तब अखिरकार उसे टैक्सी रोकनी ही पड़ी। निहारिका छुटकी और मान्या तीनो ही जल्दी से उसकी खिड़की के पास आ गयी। ड्राइवर के चेहरे पर हवाइया उड़ी हुई थी। 

निहारिका ड्राइवर से बात करने को हुई उससे पहले ही छुटकी बोल पड़ी – “क्यूं भैया हम क्या तुम्हे रतनगढ मे भटकने वाली भटकती आत्माये नजर आ रही थीं जो अपनी टैक्सी नही रोक रहे थे।” 

टैक्सी ड्राइवर सकपकाया! 

“चुप करो छुटकी फालतू का न बोलो” - निहारिका ने छुटकी को डपटा।

छुटकी चुप हो गयी। मान्या बोली – हमे गढ वाले महाराज के धाम जाते समय यात्रियो के ठहरने के लिये जो आखिरी धर्मशाला पड़ती है वहीं जाना है।

ड्राइवर ने उन्हे ऐसे घूरा जैसे उसने कोई विचित्र बात कह दी हो।

ठीक है मै छोड़ दूंगा, लेकिन साफ कहे दे रहा हूं वहा से दस मीटर भी आगे मै नही ले जाऊंगा – ड्राइवर ने अकड़ते हुए कहा और उनके जवाब का इंतजार करने लगा।

ठीक है, मंजूर है, चलिये – निहारिका ने कहा। 

ड्राइवर ने गाड़ी का दरवाजा खोल दिया और निहारिका अपनी बहनो के साथ उसमे बैठ गयी। ड्राइवर ने टैक्सी बढाने मे बिल्कुल देर नही लगाई। उनके जाने के बाद वहाँ की हवा मे एक गुस्से भरी तेज आवाज घुलने लगी जो किसकी थी यह ठीक से पता नही लगाया जा सकता।

"वह क्या है? वह खिड़की के बाहर उस तरफ..." - छुटकी ने अपनी गर्दन और एक हाथ टैक्सी से बाहर निकालते हुए कहा तो मान्या और निहारिका ने उसे पकड़ कर वापस टैक्सी के अंदर खींचा। निहारिका गुस्से में भड़की - "ठीक से बैठ छुटकी! ऐसे हाथ और सिर बाहर नहीं निकालते, क्या तुझे यह पता नही है क्या?"

"अरे जीजी! देखो तो उधर... छुटकी ने निहारिका से कहा और ड्राइवर से टैक्सी रोकने के लिये बोली - भैया 1 मिनट टैक्सी रोकना..।" 

 शाम ढल कर अंधेरे मे बदल रही थी और रात होने ही वाली थी,  ड्राइवर टैक्सी रोकने की बात पर थोड़ा खीझ गया और धीमी आवाज में बुदबुदाया - "धर्मशाला तक जाने को बोला था आप लोगों ने, यहां क्यों रुकवा रही है टैक्सी!"

"धर्मशाला ही जाएंगे भैया! बस 2 मिनट" - निहारिका ने टैक्सी वाले की आवाज सुन ली।

"कितना खूबसूरत है जीजी,  वाओ!" - मान्या भी उस तरफ निगाह डालती हुई बोली।

टैक्सी वाला उन की उत्सुकता देख उसी तरह चिढ़ कर बोला - "हर चमकती हुई चीज सोना नहीं होती...कहते हुए ड्राइवर ने गाड़ी रोक दी" लेकिन इस बार भी निहारिका ने ही उस टैक्सी वाले की बातें सुनी। वह सोच मे पड़ गयी (सब इतना अजीब बर्ताव क्यों कर रहे हैं यहां? पहले वह टैक्सी वाला,  फिर धर्मशाला में वह औरतें, मैनेजर और अब यह टैक्सी वाला भी )

"सच में शाम के इस वक्त वह और भी ज्यादा खूबसूरत लग रहा है देखो ना जीजी" - छुटकी,  निहारिका को वह महल दिखाती हुई बोली।

"हां देख लिया मैंने -  निहारिका ने बिन देखे ही कहा - अब चलो देर हो रही है वापसी के लिए" आप टैक्सी आगे ले चलिये कहते हुए निहारिका ने अपना चेहरा खिड़्की की तरफ घुमा लिया। ड्राइवर ने भी बिन देर किये गाड़ी टेड़े मेड़े रास्ते पर दौड़ा दी। गाड़ी के आगे बढते बढते निहारिका की आंखे फैलती गयी। उसके सामने था एक खुबसूरत शानदार दृश्य रतनगढ का झिलमिलाता महल। लेकिन उसकी आंखो ने वह देखा जो मान्या और छुटकी नही देख पाई थीं...


जारी....

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25 Comments

Shnaya

03-Apr-2022 02:18 PM

Very nice 👌

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Inayat

13-Jan-2022 07:33 PM

Nicely written

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Shalu

07-Jan-2022 01:54 PM

Bahut accha h

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