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रतनगढ - कहानी दो जहां की (भाग 4)

                   अध्याय 4 ( अमावस का खौफ)

निहारिका देख रही थी पूरा स्टेशन सुनसान होकर मरुस्थल में बदल चुका है। वहां किसी भी प्राणी की मौजूदगी तो छोड़ो जीवन के तनिक भी आसार नजर नही आ रहे है। चारो तरफ बस तन झुलसाती गर्मी और बदन जलाती तेज धूप की मार है। 

"यह हम कहां आ गए" - निहारिका सामान्य से तेज आवाज में बोली।

छुटकी और मान्या जो बहुत खुश दिख रही थीं, निहारिका को सुन कर हैरानी से बोली - कहाँ क्या जीजी, वहीं तो आये है जहां हमे आना था, रतनगढ स्टेशन...! 

क्या ...! निहारिका हैरानी से बोली। लेकिन यह रतनगढ कम मरुस्थल ज्यादा लग रहा है - उसने सामने देखा। वह एक बार फिर चौंक गई जब उसके कानों में सन्नाटे की सांय सांय को तोड़ कर स्टेशन पर मौजूद लोगो की आवाजें पड़ी। ट्रेनों की आवाजाही को प्रदर्शित करती हुई सीटियों की आवाजें गूँजी।

 रेगिस्तान की रेतीली भूमि की जगह उसकी आँखों के सामने रतनगढ का वह प्लेटफॉर्म था जिस पर वह और उसकी बहन खड़ी थीं। मान्या और छुटकी उसकी बातों को समझने की कोशिश करते हुए उसके जवाब देने का इंतजार कर रही थीं। निहारिका ने अपना सर पीट लिया। अब इन्हें क्या कहे हम कि हमे भ्रम हो रहा था इसीलिए उटपटांग बातें कह गए।

चलो मान्या, छुटकी, हम कह रहे थे यह स्टेशन ज्यादा बड़ा नही है। या शायद धार्मिक स्थल होने के कारण लोगो की भीड़ दिख रही है जिससे स्टेशन छोटा दिख रहा है। चारो ओर कितना शोरगुल हो रखा है, देखो तो जरा उधर, जरा से सामान के लिए किसी बोझा ढोने वाले को आवाज लगाई जा रही है।

 निहारिका ने प्लेटफॉर्म पर खड़ी ट्रेन की ओर देखते हुए कहा। जहां एक व्यक्ति ट्रेन के दरवाजे पर खड़े होकर "अरे ओ बोझा उठाने वाला" कहकर किसी को आवाजे दे रहा था। तीनो देख रही थी, खाने का सामान और चाय, पानी बेचने वाले खिड़कियों पर जा जाकर आवाज लगा रहे थे। इस उम्मीद से थोड़ी ज्यादा मेहनत करने पर उनकी आमदनी पिछले दिन से अधिक बढ़ जाये।

दूसरे श्रद्धालु ट्रेन से उतरते समय अपनी आंखें बंद रतनगढ की जमीन पर खड़े होकर यह कहते हुए सुने जा रहे थे,  "वाकई, कुछ तो उत्तम है इस भूमि की हवा में जो कदम रखते ही मन की अशांति को दूर भगा देती है।"

 निहारिका को तो यहाॅ॑ की हवा भी कुछ अलग सा अहसास करवा रही थी। ना जाने क्यों उसे ऐसा लग रहा था कि यहाॅ॑ कुछ तो ऐसा है जो उसके अलावा कोई और महसूस नहीं कर पा रहा है। उसका मन उससे बार-बार कह रहा था, "चली जाओ निहारिका! यहाॅ॑ से कहीं दूर चली जाओ!" पर अगर उसके मन की चली होती, तो वह यहाॅ॑ होती ही क्यों? - सोचते हुए सारे विचारो को झटक दिया और वे सभी वहां से आगे बढ़ गए।

 सामान को सम्हालते हुए उस भीड़ को चीर कर निहारिका, मान्या और छुटकी तेजी से स्टेशन से बाहर की ओर निकलने की कोशिश करने लगी। थोड़ी मशक्कत के बाद आखिरकार वे तीनों बाहर निकल आईं। बाहर निकलकर छुटकी ने सामान को नीचे रखा और हाथ फैलाकर गहरी साॅ॑सें भरने लगी। जैसे वह रतनगढ की हवाओ में गूंज रहे "स्वागत है" शब्द को सुन कर उसका आभार व्यक्त कर रही हो।

"ये क्या कर रही है छुटकी?" निहारिका ने उसके हाथों को समेटते हुए पूछा।

"यहाॅ॑ की पावन हवा अपने फेफड़ों में भर रही हूॅ॑ जीजी और क्या?"  छुटकी ने अपनी कमर में हाथ रखते हुए निहारिका को बताया और सामान उठा लिया।

"यह पावन हवा आगे भी मिल जाएगी, छुटकी। फिलहाल तो तुम रास्ता रोककर खड़ी हो। सबका, चलो! आगे चलो!"  - निहारिका ने उसे हल्का सा धकेल दिया।

"अरे! इतनी जगह तो है आने-जाने के लिए। पता नहीं लोगों से किसी की खुशी देखी क्यों नहीं जाती है? मेरी कितनी बड़ी तमन्ना पूरी हुई है आज, पता तो है आपको! तो खुश होना तो बनता है ना जीजी !" छुटकी चलते हुए चारो ओर देखती जा रही थी।

"ठीक है मेरी माॅ॑! तू ही जीती! तुमसे बहस करने का हमारा कोई इरादा नहीं है फिलहाल। चलो! "गढ़ वाले महाराज" के धाम तक पहुॅ॑चने के लिए टैक्सी भी  करनी पड़ेगी।" निहारिका, छुटकी से आगे निकल गयी।

"टैक्सी! जीजी" - छुटकी चौंकी।

"ओए! एक्साइटमेंट में कहीं यहाॅ॑ से वहाॅ॑ तक पैदल मार्च करने का तो इरादा तो नहीं है तेरा , जो इतना हैरान हो रही है!" - इस बार मान्या बोली।

"अरे... नहीं.. नहीं! करते हैं ना टैक्सी। चलो! मैंने कब मना किया है?" हड़बड़ाकर सामान को उठाते हुए छुटकी बोली और तेजी से पास खड़ी एक टैक्सी की ओर बढ़ गई।

उसकी हरकतों को देखकर मान्या और निहारिका ने एक दूसरे की ओर देखा और फिर छुटकी के पास तेजी से निकल गई।

" अरे! बेवकूफ समझ रखा है क्या? तुम्हे क्या लगता है पहली बार आए हैं हम यहाॅ॑... या फिर लड़की और परदेसी समझकर चूना लगाना चाह रहा है।" छुटकी की तेज आवाज चारों ओर गूँजी।

 निहारिका और मान्या ने देखा कि छुटकी एक टैक्सी वाले से उलझ रही थी।

"सच मे, इसे तो एक पल के लिए अकेला नहीं छोड़ सकते हैं। कितना मज़ा आता है इसे सबसे उलझने में।" छुटकी की हरकत से तुनक कर निहारिका तेजी से उसके पास पहुंच गई।

"क्या हो गया छुटकी? क्यों गुस्सा कर रही है इतना?" - निहारिका परेशानी से बोली। हालांकि वह यह बेहतर समझ रही थी कि जरूर ही छुटकी ने कुछ न कुछ कांड किया है। 

"जीजी! सुनो जरा इसे! कह रहा है? रतनगढ तक जाने के हजार रूपये लेगा!" - छुटकी ड्राइवर पर गरजते हुए बोली। उसके दांत मिंसे हुए थे।

"क्या ? अरे आधे घण्टे का तो रास्ता है और आप को हजार रुपये चाहिए! कुछ तो कम कीजिए।" निहारिका ने टैक्सी वाले से कहा। 

वह बिन किसी लाग लपेट के बोला - "देखिए मैडम! ये तो यहाॅ॑ का फिक्स रेट है। आपको आना है तो आइए, वरना आगे जाइए। इससे कम में कोई नहीं ले जाएगा आपको।" उस टैक्सी ड्राइवर ने भी छुटकी की ओर देखते हुए ऊॅ॑ची आवाज में कहा।

"अच्छा, हमें भी शौक नहीं है, ऐसी खटारे की सवारी का, भाड़ में जाओ हुंह।" गुस्से से बलबलाती छुटकी ने सामान उठाया और दूसरी टैक्सी की ओर बढ़ गई। मन मारकर निहारिका और मान्या भी उसके पीछे चली आईं। लेकिन इस बार छुटकी टैक्सी वाले से उलझती, उससे पहले ही निहारिका ने उसे कुछ भी बोलने से मना किया।

निहारिका ने देखा, वह टैक्सी वाला फोन पर किसी से उलझा हुआ है। वह धीमी आवाज में किसी से कह रहा था - "सुन रहें है बाबा! तुम्हारी ही तो सुनते हैं और किसकी सुनते हैं भला। पर काम-धंधा करें कि नहीं। तुम्हारे लिए कमाना भी तो हमें ही पड़ता है ना।" 

"ओ ड्राइवर भैया!" - मान्या ने उसे आवाज दी।

"एक मिनट मैडम! वो क्या है हमारी घरवाली है फोन पर। उसे निपटा लें पहले, वरना रात का भोजन रामू के साथ करना पड़ेगा।" - वो ड्राइवर फ़ोन के स्पीकर को हथेली से दबाकर फुसफुसाती हुई आवाज में बोला।

उसकी बात सुनकर छुटकी ने अपने कंधे उचका दिए और हैरानी से उसकी ओर देखने लगी।

"चलो यहाॅ॑ से। लगता है यहाॅ॑ सबका दिमाग आसमान की सैर कर रहा है। देखते हैं कोई दूसरी टैक्सी।" मान्या ने एक बार फिर सामान पकड़ते हुए कहा। जिसे कुछ क्षण पहले ही वे तीनों नीचे रख चुकी थी।

"अरे मैडम रूकिए! रूकिए!" उस ड्राइवर ने हड़बड़ाते हुए निहारिका से कहा। 
"अरे रखो यार फोन। तुम्हारे चक्कर में ग्राहकी खराब हो रही।" उसने फोन पर डपटते हुए कहा, जिस पर सामने वाले ने भी कुछ कहा। और फोन रख दिया।
"देखो, हमें रतनगढ जाना है। कितना चार्ज लोगे?" निहारिका ने सीधे-सीधे पूछा।

"और चालाकी तो करना नहीं, पहले ही बता दे रहे हैं।" - छुटकी ने चेतावनी देते हुए कहा।

"अरे मैडम! आप से चलाकी क्यों करेंगे भला? देखिए यहाॅ॑ से धाम का फिक्स रेट है हजार रूपये... पर... बोहनी का टाइम है सो आठ सौ रुपये दे देना।" - ड्राइवर ने दाॅ॑त चमकाए।

"आठ सौ! पागल हो गए हो क्या?" छुटकी तेज आवाज में चिल्लाई।

"अरे मैडम! जानती नहीं है क्या पेट्रोल का भाव आज कल क्या हो गया है? आसमान छू रहा है! आसमान!" ड्राइवर ने इस अंदाज में कहा जैसे निहारिका छुटकी मान्या का इससे दूर दूर तक कुछ लेना देना नही हो। 

छुटकी और मान्या उस ड्राइवर से बातचीत कर रहीं थीं वहीं निहारिका का रोम रोम अब सिहर कर खड़ा होने लगा था। हालांकि न ही वहां इतनी गर्मी थी कि पसीने के झरने बह जाए और न ही इतनी सर्दी थी कि इंसान खड़ा खड़ा बर्फ बन जाये लेकिन फिर भी निहारिका को कुछ विचित्र एहसास हो रहे थे। सर्दी न होते हुए भी उसे सर्दी का एहसास हो रहा था और वह दोनो हाथ बांध कर सिमटते हुए खड़ी हो गयी।

"हाॅ॑, तो हमको भी आसमान की सैर करने नहीं जाना है। ज्यादा से ज्यादा 30 किलोमीटर होगा। सही-सही बताओ।" मान्या ने भी ड्राइवर की बात काटते हुए कहा।

"मैडम पहाड़ी रास्ता है। गाड़ी एवरेज कम देती है। थोड़ा समझिए आप। पेट्रोल जलाने के बाद हाथ में कुछ पैसे नहीं आऍ॑गे तो घर कैसे चलेगा?" ड्राइवर ने अपनी बात पर जोर दिया।

"पाॅ॑च सौ!" छुटकी बोली।

"ठीक है! ना आपकी... ना मेरी...। सात सौ में डन कीजिए।"

"छ: सौ!"

"चलो मैडम! हमें भी घर जाने की जल्दी है। आखिरी, साढ़े छः सौ दे देना। आज चाय रोटी खाकर ही सो जाऍ॑गे।" ड्राइवर ने हथियार डालते हुए झिक झिक से तंग आकर कहा।

छुटकी ने अपना कॉलर उठाते हुए मान्या और निहारिका की ओर विजयी अंदाज में देखा। उन दोनों ने भी उसकी ओर देखते हुए एक ठंडी सांस छोड़ी। ड्राइवर ने उनका सामान उठा कर पीछे डिक्की में रख दिया। निहारिका और मान्या पीछे की सीट में बैठ गए और छुटकी आगे जाकर ड्राइवर के बगल वाली सीट में बैठ गई।

"आप लोग दर्शन के लिए आई हैं?" ड्राइवर ने फ्रंट मिरर से पीछे देखते हुए कहा।

"आपको क्या है? हम किसी लिए भी आए हों? आप बस गाड़ी चलाइए।" छुटकी बिगड़ते हुए बोली।

"अरे मैडम! आप बता देते तो... हम भी आपकी मदद कर देते। वह क्या है ना! यहाॅ॑ बहुत से मंदिर हैं, दर्शन करने के लिए। तो आपको गाड़ी की जरूरत होगी ना। आप कहें तो हम ही करवा देंगे।" एक बार फिर दाॅ॑त दिखाता हुआ ड्राइवर बोला।

"तुम ना होशियारी मत दिखाओ ज्यादा। हमें जो करना है हम कर लेंगे।" छुटकी उस ड्राइवर पर गुस्से से गरजी।छुटकी का स्वभाव ही ऐसा था जब तक इंसान को परख नही लेगी सहज विश्वास नही करेगी।

"चुप हो जाओ छुटकी! बस बोलती रहती हो। निहारिका ने छुटकी को डपटा और ड्राइवर से रतनगढ में हमें "गढ़ वाले महाराज के धाम जाना है।" कहकर चुप हो गयी। निहारिका के ऐसा कहते ही ड्राइवर ने अचानक ही ब्रेक पर अपने पैर दबा दिए और गाड़ी तेज आवाज करती हुई रुक गई। अचानक ब्रेक लगने से सभी आगे की ओर उछल गए।

"पागल हो गए हो क्या?" चीखते हुए छुटकी ने अबकी बार अपनी बंधी मुट्ठियाॅ॑ ड्राइवर की ओर तानी।

"आप पागल हो क्या मैडम! आपको पता नहीं है क्या, आज अमावस्या की रात है।" उस ड्राइवर ने आतंकित स्वर में कहा।

"हाॅ॑, तो उससे क्या फर्क पड़ा।" निहारिका चौंकते हुए बोली।

"आप जिस जगह जाने की बात कर रहे हैं, वह जगह यहाॅ॑ के राज महल में है और आज के दिन वहाॅ॑ कोई दर्शन नहीं करता है। और तो और आज के दिन गढ़ वाले महाराज के पट भी बन्द रहते है अमावस्या की अर्ध रात्रि तक। आपको दर्शन करना हो तो कल सुबह प्रातः बेला से कभी भी कर सकती हैं।" - ड्राइवर चुप हो रहा।

निहारिका को उसकी बातें रहस्यमयी लग रही थीं। वहीं मान्या और छुटकी दोनो ही उसे ड्राइवर का डराने का इरादा समझ उसे घूर रहीं थीं। ड्राइवर को महसूस हुआ छुटकी की आंखे गुस्से में भरी है तब वह जल्दी से बोला -

वैसे भी आज का दिन आधे से ज्यादा निकल गया है। इसलिए मेरी मानिए तो आप आसपास के मंदिरों के दर्शन कर लीजिए। महल से थोड़ी दूरी पर एक धर्मशाला है। रात को वहाॅ॑ रुक जाइएगा और अल सुबह चले जाइएगा "गढ़ वाले महाराज" के दर्शन के लिए, पर आज रहने दीजिए।" ड्राइवर ने चेतावनी भरे लहजे में कहा।

"क्यों? क्या हो जाएगा...आज जाऍ॑गे तो?" मान्या उसकी बात काटते हुए बोली -  ऐसा है यह तुम लोगो का ही प्रपंच फैलाया हुआ है। क्योंकि जितना लोग रुकेंगे उतना ही तुम्हे फायदा होगा।

"मैडम हमारा काम था आपको बताना - ड्राइवर बिफरा -  आगे आपकी मर्जी। हम आपको उस धर्मशाला तक छोड़ देते हैं वह भी रतनगढ की सीमा में ही आती है। - उसने रुक कर सांस ली और आगे बोला -  आगे आप अपना खुद जानो, हमारा इसमे कोई फायदा नही, क्योंकि केवल "गढ़ वाले महाराज के धाम के पट बन्द रहते है बाकी सबके पट खुले रहते हैं।" उसने उखड़े स्वर में कहा।

ड्राइवर की बात सुनकर निहारिका के माथे पर शिकन बढ़ी। वहीं मान्या और छुटकी उस ड्राइवर को गुस्से में घूर-घूर कर देखने लगीं। इसके बाद पूरे रास्ते भर किसी ने कोई बात नहीं की। टेढ़े-मेढ़े रास्तों से होते हुए गोल चक्कर काटते हुए करीब 40 मिनट के बाद वह टैक्सी एक धर्मशाला के सामने आकर रुक गई। ड्राइवर ने उनका सामान डिक्की से बाहर निकाल कर रख दिया। और तब निहारिका ने उसे साढ़े छः सौ रुपए थमा दिए।

"मैडम हमारी बात मानिए। आज उस तरफ का रुख ना कीजिएगा।" ड्राइवर ने एक बार फिर निहारिका की ओर देखते हुए चेताया।

उसकी बात सुनकर एक बार फिर छुटकी ने अपनी कमर में हाथ रख कर उसे घूर कर देखा। वह ड्राइवर भी उन तीनों पर एक सरसरी नजर डालकर वहाॅ॑ से चला गया।

"बड़ा ही अजीब आदमी था।" मान्या जाती हुई टैक्सी को घूरा।

"अब रुकना तो हमें यही पड़ेगा ही। क्योंकि वापसी के लिए ट्रेन कल की है। पहले एक कमरा देखते हैं जिसमे सामान रख कुछ देर सफर की थकान उतारी जा सके, फिर देखते हैं आगे क्या करना है।" निहारिका ने दोनों से कहा। मान्या और छुटकी ने अपनी सहमति जताई। छुटकी, निहारिका और मान्या तीनो ही बातों में रत होकर उस धर्मशाला के अंदर चली गयी। उन्होंने इस बात पर भी गौर नही किया कि उस धर्मशाला के बाहर एक चेतावनी बोर्ड लगा हुआ था जिस पर लिखा था - 

अमावस्या के दिन रतनगढ के राजसी पैलेस में स्थित "गढ़ वाले महाराज" के धाम जाना वर्जित है। चूंकि यह धर्मशाला उस पैलेस से सबसे नजदीक है इसीलिए सभी को यह सलाह दी जाती है कि अमावस्या की रात्रि को धर्मशाला से बाहर विचरण कर अनजाने खतरे को आमंत्रित न करे। इस रात्रि धर्मशाला के बाहर जाने पर आपकी सुरक्षा की जिम्मेदारी धर्मशाला के सदस्यों की नही होगी। तीनो ने ही इस बात पर गौर नही किया था कि धर्मशाला के प्रवेशद्वार पर गढ़ वाले महाराज की तस्वीर भी थी साथ ही दरवाजो की चौखट पर विचित्र तरह का लेप भी किया गया था।

अंदर जाकर उन्होंने अपने लिए एक कमरा लिया। कम दाम में उन्हें वह कमरा मिल गया। कुछ ही देर में अपना सारा सामान रखकर वे नहाकर तैयार हो गई। नीचे जाकर उन्होंने धर्मशाला के मैनेजर से गढ़ वाले महाराज के धाम जाने के बात की। उनकी वहाॅ॑ जाने की बात सुनते ही मैनेजर भी बात टालते हुए कहने लगा।

"अरे मैडम! आज तो देर हो गई है। आप कल चले जाइएगा।" मैनेजर ने सुझाव दिया।

"क्यों? हमें तो आज ही जाना है।" मान्या ने अड़ते हुए कहा।

"देखिए मैडम! जहाॅ॑ आप को जाना है, वह यहां से भी ऊॅ॑ची पहाड़ी पर है। लेकिन यहां से ज्यादा दूर नही है। एवं इस समय एक पंक्षी भी आपको वहां उस रास्ते मे नजर नही आएगा। आज वहाॅ॑ आपको कोई लेकर भी नही जाएगा। आप आराम से सुबह नहा धो कर चले जाइएगा दर्शन के लिए।" मैनेजर ने उन्हें बहलाने की कोशिश की।

उसकी बात सुनते ही छुटकी ने एक बार फिर अपनी भवें चढ़ाते हुए उसे घूरा और फिर तीनों बाहर दरवाजे के पास आ गई।

"अजीब हैं यहाॅ॑ के लोग यार। सब मना कर रहे हैं, लेकिन कारण कोई नही बता रहा।" मान्या तमतमाई।

"छोड़ो ना! कर लेते हैं दूसरे मंदिरों के दर्शन। कल चले जाऍ॑गे वहाॅ॑ पर।" निहारिका समझदारी दिखाते हुए बोली।

"ठीक है जीजी। पर पहले कुछ खा लें। बहुत भूख लग रही है ।" मान्या ने मचलते हुए कहा।

"यहाॅ॑, पास ही भोजनालय है, हमने आते हुए नाम पढ़ा था। सबसे पहले वहीं चलते हैं।" - निहारिका ने कहा।

"नेकी और पूछ-पूछ।" छुटकी उतावलेपन से बोली। उसका उतावलापन देखकर निहारिका और मान्या भी हॅ॑स पड़ीं। तीनो ही काउंटर से हट कर रेस्टॉरेंट में पहुंची। वह रेस्टॉरेंट भी बेहद खूबसूरत था। चूंकि रतनगढ एक पहाड़ी इलाका था जहां पत्थर अधिक मात्रा में आसानी से उपलब्ध हो जाते थे सो उस रेस्टॉरेंट की बेंच से लेकर टेबल, झरोखे, फर्श, काउंटर सभी अलग अलग रंगों के पत्थर के थे। जिन पर सुंदर नक्काशी की गई थी। जो बेजोड़ भारतीय शिल्पकारी को दर्शा रही थी। तीनो ने पत्थर की एक बेंच पकड़ी और जाकर बैठ गयी। तीनो ही हैरान होकर अपलक उस रेस्टॉरेंट की खूबसूरती निहारने लगी। उनकी नजर दीवारों पर उभरे भारतीय व्यंजनों की नक्काशी को देख बाग बाग हो गया।

 ऐसा उन्होंने पहले कही नही देखा था कि शिल्पकारी एक रूप इतना आकर्षक भी हो सकता है। उन्होंने खाने की सूची देखी जिसमे  भारतीय व्यंजन के साथ साथ अन्य देशों की डिशेज भी उपलब्ध हो रही थी। 

छुटकी चौंकते हुए बोल पड़ी - देखा, जीजी हमे यूँही रतनगढ घूमने का शौक नही चढ़ा था। ये देखे ऐसी पावन जगह पर भी देश विदेश का स्वाद उपलब्ध करा रहा है यह रेस्टॉरेंट। यह वाकई बेमिसाल है।  

मान्या ने परांठा विद पनीर की फरमाइश की, तो छुटकी ने भी सहमति दी। निहारिका ने अपने लिए पैक कराने को प्राथमिकता दी। गरमा - गरम खाना ख़त्म कर वे तीनों हाथ धोने के लिए वाॅशरूम निकल गईं। वॉशरूम में पहले से ही कुछ और औरतें मौजूद थीं। मान्या और छुटकी हाथ-मुॅ॑ह धोकर बाहर निकल गईं। लेकिन निहारिका को समय लग गया। निहारिका अपने हाथ पानी से धो रही थी, उसके कानों में उन औरतों की काना-फूसी पहुॅ॑ची। वे बेहद धीमी आवाज में फुसफुसाते हुए कह रहीं थीं - 

"बहन! हमने सुना है कि रतनगढ में कोई श्राप है, इसलिए अमावस्या की रात कोई भी भूले से बाहर नहीं निकलता।" उनमे से एक औरत ने अपनी ऑ॑खें बड़ी करते हुए कहा।

"कैसा श्राप बहन?" दूसरी औरत की बातों में  उत्सुकता झलकी।

"वो तो पता नहीं बहन। पर राजा रत्न सिंह के समय से ये निषेध चला आ रहा है।" पहली औरत बोली।

"मेरे पति बता रहे थे कि कोई इस विषय में बात नहीं करता। क्या पता... क्या बात है? बस आज की रात घर से बाहर निकलना मना है और यहाॅ॑ के लोग आज भी इसका पूर्ण रूप से पालन करते हैं।" तीसरी औरत बोली।

"हाॅ॑ बहन! कुछ ना कुछ तो होगा। वरना लोग इतना डरते क्यों?" पहली औरत हैरानी से बोली।

"हमें क्या करना बहन! हम तो कल दर्शन करेंगे और फिर चले जाऍ॑गे। वैसे भी किसी की पुरानी मान्यताओं को तोड़कर हमें मिलेगा क्या?" तीसरी औरत बोली।

"सही कह रही हो बहन!" दूसरी औरत बोली।

इस वार्तालाप के बाद तो वे तीनों औरतें वहाॅ॑ से चली गईं। पर पीछे छोड़ गई उलझन में घिरी हुई निहारिका को। वह सोच रही थी ऐसा क्या रहस्य है यह जिससे सभी इतनी बुरी तरह भयभीत हो रहे हैं ....? 

 
जारी .... 

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24 Comments

Shnaya

03-Apr-2022 02:17 PM

Very nice 👌

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Inayat

13-Jan-2022 07:33 PM

Very good story h aapki

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Shalu

07-Jan-2022 01:53 PM

Gooooodddd

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