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रतनगढ - कहानी दो जहां की (भाग 3)

अध्याय 3 (ट्रेन और मवाली)


मिस्टर त्रिपाठी ने अपने परेशान दिख रहे चेहरे को थोड़ा सामान्य करने की कामयाब कोशिश की। उन्होंने निहारिका को बताया -  वह लोग आज नहीं जा पाएंगे। क्योंकि उनके ऑफिस में कस्टम रेड पड़ी है... उन्हें तुरन्त ही ऑफिस जाना होगा। चूंकि वह भी ऑफिस के सदस्य है भले ही उनका पद छोटा है लेकिन महत्वपूर्ण है। इसीलिए उनका वहां होना आवश्यक है। दरअसल मिस्टर त्रिपाठी एक प्राइवेट कंपनी में सीनियर क्लर्क पद पर नियुक्त थे।

मिसेज़ त्रिपाठी इतना सुनते ही भयंकर रूप से परेशान हो गई, वे घबराते हुए बोली - मैंने कहा था ना कि दो दो अपशकुन हो चुके हैं। हे भगवान... अब न जाने क्या होगा...?

मिस्टर त्रिपाठी को उनका इस तरह परेशान होना अच्छा नही लग रहा था। इसलिए वह चाह रहे थे कि यह बात मिसेज़ त्रिपाठी तक न पहुंचे। लेकिन वे ऐसा होने से रोक नही पाए। 

मिस्टर त्रिपाठी उन्हें शांत करते हुए बोले - तुम ज्यादा परेशान मत हो, हम एक काम कर सकते हैं... हम नही जा सकते है तो इसमे समस्या कैसी है, यह तीनों बच्चियां चली जाएंगी और तुम्हारी मन्नत पूरी करते हुए माथा टेक लेंगी।

मिस्टर त्रिपाठी का यह सुझाव सुनते ही निहारिका की आंखे आश्चर्य से फैल गयी। जाहिर हो रहा था कि उसे इस बात की कतई उम्मीद नहीं थी।

मिसेज़ त्रिपाठी अचकचाते हुए बोली - लेकिन बच्चियां कैसे?

वे इतना अचकचा रही थी कि मिस्टर त्रिपाठी को यह समझने में बिल्कुल देर नही लगी कि वह नही चाहती है कि बच्चियां अकेले सफर करें।

वे अपनी बात पर जोर देते हुए बोले - इसमे कोई मुश्किल भी तो नही है। सीधी गाड़ी है मंगलम एक्सप्रेस, जो इन्हें सीधे रतनगढ उतारेगी। वहां से आधे घण्टे का रास्ता है, जिसे ऑटो/टैक्सी से पार किया जा सकता है। वैसे भी आजकल फोन सब कुछ बता देता है। बहुत मददगार है ये जादुई डिब्बा।

मिस्टर त्रिपाठी को सुन कर मिसेज़ त्रिपाठी ने मुश्किल से बच्चियों के जाने पर अपनी सहमती दी।

जब इस बात पर सहमति बन गई कि निहारिका, छुटकी और मान्या तीनों रतनगढ़ जाएंगी और निहारिका के मम्मी पापा यानी मिस्टर और मिसेज़ त्रिपाठी दोनो घर पर ही रुकेंगे तब उनका सामान बाहर निकाल दिया गया और निहारिका बेमन से अपनी  दोनों बहनों के साथ कैब में बैठ कर स्टेशन के लिए निकल गयी। मान्या और छुटकी के पूछने पर निहारिका ने उनसे इतना ही कहा पापा को इमिडीएट ऑफिस पहुंचना है, और मम्मी पापा की वजह से नही चल रही है साथ मे। कैब में बैठे हुए ही उसने मिस्टर और मिसेज त्रिपाठी की टिकट कैंसल की। 


दोनो बहनों को मुस्कुराकर एक दूसरे से बातें करते देख वह शीशे से बाहर झांकने लगी। पीछे छूटती सड़क , हरे भरे पेड़ पौधे , सड़क पर बनी सफेद धारियां देखते हुए उसके चेहरे पर एक अलग ही मुस्कान थी। लगभग आधे घण्टे तक कैब से सफर करने के बाद वे शहर के उस भीड़ भरे दमघोंटू माहौल को पीछे छोड़ने के लिए स्टेशन को कोलाहल से भरती आवाजो के बीच चले आये। हिन्दू - मुगल वास्तुकला पर निर्मित वह स्टेशन खम्भो के लिए प्रसिद्द था। उस स्टेशन के साथ विचित्र बात यह थी स्टेशन के दमघोंटू शोर में भी वह जस का तस मजबूत खड़ा था।

स्टेशन काफी बड़ा था क्योंकि वहां प्लेटफॉर्म की संख्या ही पन्द्रह के आसपास थी। निहारिका ने अपनी बहनों को वेटिंग रूम में छोड़ते हुए उन्हें ट्रेन के प्लेटफॉर्म का पता कर वापस आने के लिए कहा और खुद वहां से निकल गयी। वह फोन के जरिये इंक्वायरी ऑफिस का पता पहले ही कर चुकी थी। कुछ ही देर में वह सीधे रेलवे इंक्वायरी के लिए बने ऑफिस के सामने थी। वहां सफेद पके बालो वाला गोल झुर्रीदार चेहरे युक्त एक बुजुर्ग बैठा हुआ था। जिसकी कम मोटी नाक पर पतले फ्रेम का गोल चश्मा टिका था। चश्मे के पीछे से झांकती उसकी भूरी आंखे, चौकोर टेलीविजन जैसै बक्से पर जमी हुई थी और उसकी अंगुलिया खटाखट कीबोर्ड पर नाच रहीं थीं।

मंगलम एक्सप्रेस कौन से प्लेटफॉर्म से गुजरेगी..? - निहारिका ने सवाल किया।
उस आदमी ने अपनी नजरे कम्प्यूटर स्क्रीन से हटाई और इंक्वायरी ऑफिस की छोटी सी जालीदार खिड़की पर जमा दी।

जी , हम मंगलम एक्सप्रेस के बारे में पता करना चाहते हैं, वह किस प्लेटफॉर्म से गुजरेगी ? - निहारिका ने दोहराया।

बूढ़े ने अपने दाएं हाथ की मध्यमा अंगुली से खिड़की से बाहर ऊपर चिपके, एक चमकीले इलेक्ट्रिक बोर्ड की तरफ इशारा कर दिया। निहारिका ने असमंजस से मुड़कर उसे देखा तो उस बुजुर्ग से \'शुक्रिया\' कहते हुए वह वहां से चली आई। "शायद वह बोल नही सकते" सोचते हुए निहारिका उस चमकीले बोर्ड के सामने रुक गयी।उसने सरसरी नजर उस पर डाली। बोर्ड पर काले अक्षरों में हिंदी के शब्द नजर आये। जिनकी पंक्तियों के बीच "मंगलम एक्सप्रेस" पढ़ते हुए उसके होठों पर मुस्कान तैर गयी और वे "मंगलम एक्सप्रेस प्लेटफॉर्म नम्बर 13" दोहराते हुए खामोश हो गए।

एक पल को उसके मन मे मिसेज़ त्रिपाठी के शब्द गूंज गए। जब घर से निकलते समय वे अपशगुन कहते हुए घबरा गयी थीं। लेकिन अगले ही पल वह अपनी ही बुद्धि पर हंसते हुए बड़बड़ाई "यह तो महज एक अंको का मेल है, जो दो अंको के मेल से बना है, भला यह अंक किसी को क्या शुभ अशुभ फल देंगे। अब कुल मिलाकर यहां प्लेटफॉर्म संख्या ही पंद्रह है तब तेरह बीच मे आना नॉर्मली ही है। कैसे ख्याल आ गए थे यहां तुम्हारे दिमाग मे निहारिका... वह तुरन्त ही आगे बढ़ वेटिंग रूम में पहुंची। जहां छुटकी और मान्या दोनो को देख कर ही वह उन पर भड़क गई। दरअसल हुआ कुछ यूं था कि छुटकी और मान्या दोनों ही लगेज बैग के ऊपर सर टिका आंखे बंद किये लुढ़क गयीं थीं। जिसका कारण था वे दोनों ही सुबह जल्दी उठी थीं। निहारिका की आवाज सुनकर वे हड़बड़ाकर उठ गई। निहारिका ने उनकी इस हरकत को जाने दिया और सामान उठा कर वहां से अपने पीछे आने का इशारा किया। छुटकी और मान्या ने निहारिका से कुछ न कहने में ही खैरियत समझी। इलेक्ट्रिक सीढियो से होते हुए निहारिका प्लेटफॉर्म नम्बर 13 पर जाकर रुक गयी, और वहां से नीचे चली आई। लोगो की चहल पहल भरे उस प्लेटफॉर्म पर निहारिका अपनी बहनों के साथ मुश्किल से ट्रेन में चढ़ पाई थी। अपनी रिजर्वड सीट पर सामान चढ़ाते हुए निहारिका ने मान्या और छुटकी दोनो को चैन से सोने का कहा औऱ खुद खिड़की का हिस्सा पकड़ कर धमक गयी।

छुटकी और मान्या दोनो ही निहारिका के पास धमकते हुए बोलीं - नही, जीजी! अब नही लुढ़कना। अब तो हमे भी आपके साथ सफर को एन्जॉय करना है। लेकिन पहले यह समान सेट कर दें जो आपने ऊपर सीट पर जमा दिया है। मान्या उठी और तुरन्त ही सारा सामान सीटो के नीचे ठूंस दिया। मान्या के बैठते ही छुटकी अपने अंदाज में आ गयी और निहारिका से बोली - जीजी आपने देखा, मैं कह रही थी आपसे जल्दी चलो जल्दी चलो। लेकिन आप इतना धीरे चल रही थी कि कछुआ भी आपसे जीत जाए, हद है नही!

निहारिका मुस्कुराते हुए बोली -  " लेकिन टाइम से तो पहुंच ही गये ना।"

"हाँ वो तो मैं बोलती रही इसलिए, वरना तो अगली ट्रेन तक भी नहीं पहुंच पाते।" - छुटकी ने तपाक से कहा।

  "ठीक है छुटकी! अगली बार से भारी सामान तुम रख लेना, ताकि तू जल्दी जल्दी हमें पहुंचा सके।" निहारिका ने चुटकी ली।

"मैं तो मजाक कर रही थी जीजी ! - छुटकी हड़बड़ाई।

निहारिका के साथ मान्या हंस पड़ी। हम जानते हैं छुटकी - निहारिका ने छुटकी का कान खींचा।

ट्रेन ने चलने के लिए हुंकार भरी। धीरे धीरे रेंगते हुए उसने भी अपनी गति भी पकड़ ली। छुटकी आंखों में सपने और होठों पर मुस्कुराहट लेकर रतनगढ की महिमा जपने लगी। वह मान्या और निहारिका दोनो को अपनी बातों से बोरियत महसूस करा रही थी। निहारिका अरुचि से मुंह पर हाथ रख उसे सुन रही थी। जब नही सुन पाई तब उसने \'तुम दोनों जारी रखो मान्या और छुटकी\' कहते हुए उसने अपना फोन हाथ मे ले लिया।

 जब ट्रेन पहले स्टॉपेज पर रुकी तब हमेशा की तरह लोग ट्रेन से चढ़ने उतरने लगे। जिस डिब्बे में निहारिका और उसकी बहने बैठी हुई थी वहां भी चार लोग और धमक आये। हुलिए से वे शरीफ इंसान प्रतीत नहीं हो रहे थे। ना तो उन्होंने कपड़े सलीके से पहने हुए थे और ना ही उनके बातें करने का अंदाज शरीफों वाला था। अपने कंधे पर मैला सा गमछा फंसाये उन चारों के ट्रेन में घुसने के अंदाज से ही बोगी के लोगो मे हलचल मच गई। तम्बाकू चबाते हुए वे चारों अपनी हल्की लाल आंखों से अपनी तसरीफ़ टिकाने के लिए जगह देखने लगे। उनकी यह खोज निहारिका और उसकी बहनों की सीटो पर जाकर पूरी हुई। और वे एक दूसरे को हाथों से इशारा करते हुए उन तीनों के इर्द गिर्द आ धमक गए। उनके बैठने से एक तेज बदबू का भभका उन तीनो के नथुनों को भेद गया। अनायास ही उनके हाथ नाक मुंह पर पहुंच गए। उन तीनो को ही उन चारों का वहां बैठना पसंद नही आया था। उन्होंने गुस्से से उनकी ओर देखा। वे चारो अपने भद्दे लाल लाल दांत दिखलाते हुए जोर जोर से हंस रहे थे। छुटकी और मान्या आपस मे फुसफुसाते हुए उन्हें कोसने लगी। तो वहीं समझदार निहारिका की नजर आसपास घूमी। वे ये देख कर चौंक रही थी उस डिब्बे में मौजूद बाकी और लोग जो इन्हें देख पा रहे थे वे सब के सब उन चारो को घृणा की नजरों से देखते हुए सिमट गये थे। उन चारो ने सामने की बर्थ पर जब अपने जूते पहने हुए पैर फैलाये तब भी किसी ने उनका विरोध नही किया। बदबू की तेज लहर तीनों के नथुनों में नश्तर की तरह चुभने लगी थी। जब यह उनकी बर्दाश्त से बाहर हो गया तब निहारिका बोल ही पड़ी "आप यहां से उठ जाइये ! यह हमारी सीट है।"

"तो मैं कौन सा साथ में घर ले जाऊंगा इसे" -  उनमे से एक शख्स ने हंसते हुए कहा।

निहारिका को इतनी हिम्मत करता देख सिमटे हुए लोग तुरन्त ही सतर्क हो गए। निहारिका ने उनकी ओर देखा तो उसने समझा जैसे वे लोग मूक भाषा में कह रहे हो चुप बैठ जाओ लड़कीं और कुछ बोलो मत।

छुटकी बोल पड़ी - "घर तो कोई भी नहीं ले जाएगा, पर ये सीट हमने बुक की है तो हम ही बैठेंगे। तुम कहीं और जाकर बैठो।"

"अरे मैडम! क्यों बात बढ़ा रही हो, एक घंटे के बाद हम उतर जाएंगे तो पसर जाना पैर फैला कर अपनी सीट पर। अभी सरको जरा सा, बैठने दो सही से" - उनमे से दूसरे ने दांत चमकाते हुए कहा।

"नहीं आप यहाँ नहीं बैठ सकते - निहारिका सख्ती से बोली - आपने शराब पी हुई है जिसकी बदबू से हमारा सर दर्द कर रहा है। आप टीटी से कह अपने लिए दूसरी सीट का इंतज़ाम करवा लीजिए! प्लीज " निहारिका की आंखों में रोष साफ नजर आ रहा था।

"अरे ये शराब नहीं है मैडम, सब दुख और दर्द की दवा है। उसी व्यक्ति ने ठहाका लगाया। उसका हाथ उसके शर्ट की जेब मे घूम रहा था -  तुम्हारे सर में दर्द हो रहा है तो लो दो घूंट तुम भी मार लो, सब दर्द गायब हो जाएगा।" उस इंसान ने अपना हाथ फुर्ती से बाहर खींचते हुए कहा। उसके हाथ मे एक आधी भरी बोतल दिख रही थी। जिसे उसने बेशर्मी से बोतल का ढक्कन खोलकर निहारिका की तरफ बढ़ा दिया था।

शराब की तीखी गंध तीनों के दिलो को हिलाती चली गई। बिन किसी देर के निहारिका का हाथ तुरन्त घूमा, और अगले ही पल वह बोतल जमीन पर छटक की आवाज करते हुए लुढ़क रही थी।

बोतल टूटने से चारों फुर्ती से खड़े हुए और निहारिका पर लगभग चिल्लाते हुए बोले - तेरा दिमाग खराब है लड़की। हमारी बोतल फोड़ दी। इसके पैसे क्या तेरा बाप देगा?

निहारिका एकदम सकपका गयी।वह इस अप्रत्याशित घटना लिए तैयार नही थी। वह सधी आवाज़ में बोली - हमने नहीं गिराई। जबरदस्ती आप कर रहे थे।

अरे तो, तेरे भले की ही सोच रहे थे। आखिर तेरा सरदर्द जो कर रहा था। अब तुम यहाँ से तभी जाओगी जब अगले स्टेशन पर उतर कर हमें बोतल खरीद कर दोगी - चारो दहाड़े।

"हम क्यों खरीद कर दे बोतल? - इस बार छुटकी भड़की -  गलती तुम लोगों की, गलती से गिरी थी वह और अच्छा ही हुआ गिर गई, कितनी गंदी बदबू थी उसकी। हम रतनगढ़ जाएंगे। तुम्हें अगले स्टेशन पर उतरना है तो उतर जाओ" छुटकी ने गर्वीले भाव के साथ सबकी ओर देखा। वे सभी गुस्से में दांत किटकिटा रहे थे। उनकी मुट्ठियाँ भिंच चुकी थीं और आंखों से अंगारे बरसने ही वाले हो, इतने गुस्से में दिख रहे थे।

लेकिन वे लोग कुछ कर पाते, आर पी एफ (रेलवे पुलिस फ़ोर्स) के जवान गश्त देते हुए उस कोच में आ गए। उन्हें देख कर उन  छुटकी ने बिन देर किए उधर बुलाते हुए सारी कहानी उन्हें सुना डाली। निहारिका ने भी अपने साथ की जा रही ज्यादती के बारे में बताते हुए कहा, "ये लोग उसे जबरन शराब पिला रहे थे" सुनकर ही चारों उसे ऐसे घूरने लगे जैसे उसका खून कर देंगे। पुलिस चारों को वहां से ले गई, जिसके बाद सबकी जान में जान आई।

"वाह बेटी! तुमने बहुत हिम्मत दिखाई, ऐसे गुंडों को मुंह तोड़ जवाब दिया है - दूसरी सीट पर बैठे एक शख्स ने निहारिका से कहा

छुटकी गुस्से से बलबला गयी। वह उनकी कायरता के लिए कुछ बोलने ही वाली थी तभी निहारिका ने इशारे से मना कर दिया। लेकिन मान्या यह देख नही पाइ और जवाब देते हुए बोली - यही और लोग भी अगर करते तो पहले ही हो जाता।

निहारिका ने एक नजर मान्या को देखा और उसे इशारे में मना कर दिया। छुटकी और मान्या दोनों ही मुंह फुलाकर एक तरफ होकर चुपचाप बैठ गईं।

लेकिन शब्द रूपी बाण कमान से निकल चुका था एवं सभी समझ भी गए थे कि उसका निशाना बाकी बैठे निकृष्ट लोग हैं इसलिए सबने अपनी अपनी बर्थ सोने के लिए तैयार की और उस पर लेट गए क्योंकि उनसे कुछ कहना अपनी ही कायरता का प्रदर्शन दोहराने के समान था।

सबके तितर बितर होने के बाद मिस्टर और मिसेज़ त्रिपाठी से फोन पर बात कर निहारिका भी निचली बर्थ पर लेट गयी। उनमे कोई बातचीत नही हुई। निहारिका ने भी उन दोनों को नाराज देख बात करने की कोई कोशिश नहीं की। वह सोच रही थी अभी भी बचपना गया नही है दोनो का। मान्या और छुटकी दोनो ही बिन कुछ कहे सबसे ऊपर वाली बर्थ पर लेट गई। समय गुजरता जा रहा था और ट्रेन सामान्य से दोगुना लेट होती जा रही थी। सुबह से रात ढल चुकी थी और निहारिका को नींद नहीं आ रही थी। वह एक बार फिर खिड़की से बाहर की तरफ देखने लगी। रात का घुप्प अंधेरा, कुछ नजर नहीं आ रहा था। निहारिका के जेहन में एक बार फिर से अपने साथ बीती घटनाये घूमी वह सोच रही थी - क्या वाकई में सब इत्तेफ़ाक़ है या कहीं कोई रहस्य छुपा हुआ है।

लेकिन बहुत सोचने पर भी उसे उसके सवालों का कोई जवाब नहीं मिला। निहारिका ने खिड़की का शटर डाउन किया और अपनी आंखें बंद कर चुपचाप सीट पर सीधी हो गयी। हमेशा की तरह अपने सवालों के जवाब में उलझी निहारिका कब नींद के आगोश में पहुंची उसे खबर नही हुई।

सुबह 7 बजे करीब उसकी नींद टूटी चाय, समोसा, नाश्ता आदि की तरह तरह की आवाजो के शोरगुल से। अंगड़ाई लेते हुए जब वह उठी तब ट्रेन एक बड़े से स्टेशन पर रुकी हुई थी। अभी कितना दूर है रतनगढ सोचते हुए उसने फोन से चेक किया तो पाया वह रतनगढ से पहले का स्टेशन था। रतनगढ वहां से महज बीस मिनट की दूरी पर था। उसने फोन एक ओर रख उठकर अपनी दोनों बहनों को जगाया। सबने हाथ मुंह धोकर चाय नाश्ता किया। ट्रेन एक बार फिर चलने लगी। उसकी दोनों बहने सब भुलाकर पहले जैसे फिर से हिलमिलकर बातें कर रही थी। चाय नाश्ता खत्म करने के बाद सबने अपने बैग सीटो के नीचे से निकाल लिए। मान्या और छुटकी उन्हें घसीटते हुए दरवाजे तक ले गईं। निहारिका ने एक बार फिर सरसरी नजर दौड़ाई और आखिर में वह भी ट्रेन के दरवाजे पर पहुंच गई। ट्रेन की रफ्तार मन्द पड़ चुकी थी। जो साफ बता रही थी कि रतनगढ़ स्टेशन नजदीक ही आ रहा था। चूंकि तीनों ने अपना सामान पहले ही सेट कर लिया था इसीलिए मान्या और छुटकी खिलखिलाती हुई ट्रेन के स्टेशन पर रुकने का उतावली से इंतजार कर रही थीं और निहारिका उकताहट से अपने फोन को निहार रही थी। एक धीमे झटके के साथ गाड़ी रुक गयी। जिसके रुकते ही छुटकी मान्या से गले लगते हुए बोली - आखिर हम रतनगढ पहुंच ही गए मान्या!

हम्म छुटकी - मान्या ने जवाब दिया। और उतावली से उन्होंने अपना बैग पकड़ा और घसीटते हुए उसे गाड़ी से नीचे उतार लाईं। उनके उतरते ही निहारिका ट्रेन के दरवाजे पर पहुंची। तन झुलसाने वाला हवा का झोंका निहारिका के पास से गुजरा जिसके स्पर्श से निहारिका को गर्माहट महसूस हुई.."कितना गर्म तापमान है यहां!" सम्हलते हुए वह नीचे उतर गई। उसके उतरने भर की देर थी उसे वहां का तापमान इतना बढ़ा हुआ महसूस होने लगा जैसे वह अभी चक्कर खाकर गिर जाएगी। वह महसूस कर रही अपने माथे पर आई पसीने की बूंदों के साथ साथ बढ़ी हुई हृदय की धड़कनों को। उसने घबराकर चारो ओर अपनी नजर घुमाई आसपास का दृश्य देख वह बुरी तरह चौंक गई...

क्रमशः.... 


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31 Comments

Shnaya

03-Apr-2022 02:16 PM

Nice

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Inayat

13-Jan-2022 07:32 PM

Good, let see what is next now, andhvishvas bhi dikhay h aapne. Really

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Shalu

07-Jan-2022 01:52 PM

Very good

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