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रतनगढ - कहानी दो जहां की (भाग 1)

अध्याय 1 (अजीब सपना)


ठक ठक! ठक ठक! दरवाजे पर दस्तक हुई।वो एक बड़े से घर का छोटा सा लोहे का दरवाजा था जिसके ऊपर गणपति महाराज विराज रहे थे।दरवाजे के इस पार एक अठारह बरस की युवती दौड़ी चली आ रही थी।चेहरे पर उसके बैचेनी के भाव थे और पैरों में तेजी।

आ रहे हैं हम...! थोड़ा सब्र रखिये जो भी दरवाजे पर है...? – चेहरे पर आये बालों को हटाते हुए वह दरवाजे के पास पहुंच गयी। उसने जल्दी से दरवाजा खोला। दरवाजे के उस ओर एक सामान्य कद का हल्की फुल्की दाढ़ी मूंछो वाला आदमी खड़ा हुआ था जिसके हाथ मे सफेद रंग का लिफाफा था और कंधो पर लटका एक लम्बी तनी का बैग। वह उकताहट से दरवाजे को ताक रहा था। शायद दरवाजे के देर से खुलने की वजह से।

यस....! - निहारिका बोली।

निहारिका त्रिपाठी – दरवाजे के उस ओर खड़े आदमी ने पूछा।

यस... – निहारिका ने उसे पहचानने की नाकामयाब कोशिश की।

आपका कोरियर आया है – उसने वह लिफाफा निहारिका की ओर बढ़ा दिया।

कोरियर ! लेकिन कहाँ से? - निहारिका ने असमंजस से पूछा।

ये आप खुद देख लीजिए - कहते हुए वह खामोश हो गया और उसने एक लम्बा सफेद रंग का मोटा कागज निहारिका की ओर बढ़ा दिया।

ओके, निहारिका ने लिफाफा पकड़ा,  एवं उस आदमी के थमाए कागज पर साइन कर उसने वह कागज उसे वापस थमाया। उसे लेकर वह आदमी वहाँ से चला गया।दरवाजा बंद करते हुए निहारिका उस कागज को निहार रही थी। जिस पर लिखा था - 
क्राफ्ट विला,
गली नम्बर 2
रहगंज (नार्थ इंडिया)003200

कागज पर लिखा पता पढ़ते हुए उसके चेहरे पर जबरदस्त मुस्कान आई और वह खुशी से चीख पड़ी - मम्मी, छुटकी, पापा, ओये हीरो... कहाँ है सब के सब ...ओह माय गॉड! ओह माय गॉड...! आखिर आ गया ये...ओह गॉड मम्मी कहाँ हो... देखो तो हमारे हाथ मे ये क्या है।वह पूरे कमरे में उछल रही थी।हॉल मे पड़े सोफे से लेकर गोल टेबल कुछ नही छोड़ा उसने।

क्या हुआ जीजी काहे इतना शोर मचा रही हो..?बहुत खुश दिख रही हो क्या मिल गया ऐसा हमे भी बताओ - निहारिका की छोटी बहन छुटकी ने आते हुए पूछा। उसने निहारिका के हाथों की ओर देखा जहां वह चिठ्ठी पकड़े हुए थी - दीदी वो क्या है आपके हाथ मे दिखाओ तो - कहते हुए वह उसके हाथ की ओर लपकी।

यही तो बताना है हमें सबको छुटकी, लेकिन सब न जाने कहाँ है?कब से बुला रही हूं लेकिन अब तक कोई नही आया बाहर  - जवाब देते हुए निहारिका ने वह लिफाफा छुटकी की ओर बढ़ा दिया।

ओएमजी... जीजी! छुटकी लिफाफे पर लिखे पते को देखते हुए चीखी - ये तो ....ये तो...ये तो आपका जॉइनिंग लेटर है। रहगंज में आपको जोइनिंग मिल गया है। आपका जॉइनिंग लेटर है ये... वाउ जीजी...! हम मम्मी को वहीं दिखा कर आते... मम्मी.... चीखते हुए छुटकी अपनी मां के कमरे की ओर भागी।

छुटकी हम भी आ रहे - कहते हुए निहारिका उसके पीछे गयी।खुशी के अतिरेक में सोफे के पीछे से होते हुए निहारिका खम्भे से टकराते टकराते बची। वह सामने बने कमरे में पहुंची जहां छुटकी ठिठकी हुई चुपचाप खड़ी थी।

क्या हुआ छुटकी, तू रुक क्यों गयी? निहारिका ने उसके कंधे पर हाथ रखते हुए पूछा।

शशश... दी देखो, मम्मी पूजा कर रही हैं - छुटकी ने सामने इशारा किया।

ओके छुटकी, तो मम्मी न सही पापा को तो दिखा ही सकते है न - निहारिका एक्साइटमेंट से बोली।

क्या दी ! लगता है खुशी खुशी में पगला गयी है आप। अरे समय देखो घड़ी में सुबह के ग्यारह बज चुके है। इसका मतलब ये कि पापा ऑफिस में बैठे हुए काम कर रहे होंगे है कि नही। बताओ हमे छुटकी ने निहारिका की गर्दन दीवार घड़ी की ओर मोड़ दी जो घर के हॉल में वेस्ट की दीवार पर टंगी ग्यारह पांच का इशारा कर रही थी।

उसे देख निहारिका चकित होते हुए बोली - हम्म छुटकी, खुशी खुशी में पगला गए हम। जो सबको पुकारने में लगे थे बिन समय देखे।वैसे हमारा हीरो भी होगा अपने कॉलेज की गलियो मे बिजी ...., 

हम्म जीजी, वह भी व्यस्त होगा, लेकिन हमें न अब मीठा चाहिए - छुटकी मुस्कुराते हुए बोली।

निहारिका ने उसके चेहरे पर चपत लगाई, कहा - हां मिल जाएगा वो भी। जब बाहर निकलेंगे तब लेकर आएंगे सबके लिए।

जीजी! कहे दे रहे हम, सबके चक्कर मे हमारे हिस्से में कोई कटौती नही,  नही तो फिर ये लेटर नही मिलने वाला आपको - छुटकी ने धमकी भरी तकरार करते हुए कहा।

अरे हमारे हिस्से की भी तुम ही रख लेना, अब खुश मेरी माँ!- निहारिका ने कहा तो छुटकी खिलखिला दी।

वह लिफाफा वापस से निहारिका की ओर बढ़ाते हुए बोली, "लो जीजी अपनी अमानत!हम चले अपनी ख्वाहिशो की लिस्ट बनाने।"

क्या मतलब छुटकी? - निहारिका ने हैरानी से पूछा।

ओह हो जीजी, आखिर आपका जॉब प्लेस फाइनल हो गया तो हम भी अपनी लिस्ट बना ले, आपसे हमे क्या क्या ख़्वाहिशें पूरी करानी है, आखिर बड़ी जीजी हो आप। बोलते हुए वह मुस्कुराई, बड़ी सारी ख़्वाहिशें है न तो लिस्ट भी लम्बी है और उनमें सबसे पहले पायदान पर है रतनगढ़ घूमने की ख़्वाहिश! हमे रतनगढ घूमना है जीजी, हमे वह जगह बहुत रहस्यमयी लगती है, कितना कुछ सुना है उसके बारे में। एक ऐसी जगह जहां लोगो की हर मन्नत पूरी होती है। एक ऐसी जगह है जहां के दरवाजो में ... छुटकी अपना वाकया पूरा नही कर पाई तब तक उसे जोरो की छींक आई...!

वहीं छुटकी के मुंह से रतनगढ़ सुन कर निहारिका मुस्कुराते मुस्कुराते चुप हो गयी। उसके चेहरे से मुस्कान गायब हो गयी और उलझन के साथ साथ गहरी सोच नजर आने लगी। तुरंत ही उसके मन मे घूम गया वह अजीब सा दृश्य, जो अक्सर उसकी रातो की नीदें और सुबह का सुकून चुरा लेता था। निहारिका अपने ख्वाबो में अक्सर खुद को देखती थी एक बड़े से राजसी पैलेस के उस हिस्से में जहां सिवाय अंधकार और उन दो जोड़ी चमकीली आंखों के उसे कुछ और नजर नही आता था। लेकिन वे आंखे सामान्य नही लगती थीं। उसे अक्सर सुनाई देती थी कुछ अजीब सी आवाजें जो न ही ठीक से चीखने की होती और न ही ठीक से चिंघाड़ने, दहाड़ने या फिर गुर्राने जैसी। वह तब अक्सर चौंकते हुए उठ जाती थी जब वह राजसी पैलेस में स्थित एक बड़े से चांदी जैसे चमकीले दरवाजे के सामने खड़ी होती और दरवाजे के उस पार से धीमी गति से आती हुई आवाजे बढ़ते बढ़ते इतना बढ़ जाती कि वह कानो को बंद कर उठते हुए जोर से चीख पड़ती ... "धर्मो रक्षति रक्षितः" 

क्या हुआ जीजी...! आप क्या सोचने लगी। कहीं ये तो नही सोच रही हो कि काश छुटकी की विशिंग लिस्ट थोड़ी छोटी हो जाये?- छुटकी ने चहकते हुए कहा। जिसे सुन कर निहारिका अपनी सोच से बाहर आते हुए बोली - हम्म! कुछ ऐसा ही समझ ले छुटकी।

हड़बड़ाई निहारिका ने अपने शब्दो पर ध्यान नही दिया था। जब ध्यान दिया तब तक देर हो चुकी थी। छुटकी मुंह फुला कर सोफे पर धम्म से धमक चुकी थी। उसके बैठने का अंदाज इतना टेढ़ा था बेचारा सोफा भी चिं चिं चिं चिं करते हुए चरमरा गया था।

छुटकी! छुटकी ! छुटकी! देख तू मुंह मत फुलाया कर। तू जब ये मुंह फुला लेती है न तब तेरे ये गुलाबी गाल बैलून की तरह फूल जाते जिन्हें फिर फोड़ना बड़ा पसंद आता हमे - निहारिका ने मुस्कुराते हुए छुटकी को बताया।जिसे सुन छुटकी की नीली आंखे हल्की सी नम हो गयी।

निहारिका सामने देखते हुए बोली - चल रूठो नही! और अब शुरू होजा एक बार फिर काम पर लगने के लिए। काहे कि सामने से मम्मी आ रही है अब इधर ही। उनके आने पर उनको ये खुशख़बरी देना तुम, ठीक है। खड़ी हो जा हमारी प्यारी छुटकी.!- निहारिका ने चेहरे पर मुस्कान थी।

"क्या किया तुमने निहारिका?" कमरे से निकलते हुए दोनो की बातें सुनकर निहारिका की मम्मी बोली।

मुन्ह लटकाये छुटकी सोफे से उछलते हुए बोली - ओके ओके जीजी – उसने अपनी मम्मी से छुपाते हुए अपनी आंखे जल्दी से साफ की।

निहारिका की मम्मी ने हैरानी से उन दोनों की ओर देखा। 

मम्मी अभी भी उलझन में है हम दोनों की हरकतों से, ये जानकर निहारिका ने छुटकी को लेटर का इशारा कर दिया। छुटकी निहारिका के हाथ से लेटर लेते हुए अपनी मम्मी के आगे आकर खड़ी होते हुए खुशी से चिल्लाई - मम्मी देखो मेरे हाथ मे क्या है। निहारिका जीजी का जोइनिंग लेटर इसके हिसाब से अगले सप्ताह ही उन्हें जॉइन करने के लिए रहगंज निकलना है।

सुनकर ही निहारिका की मम्मी खुशी से भर गई। उन्होने वह लेटर भी देखने की जेहमत नही उठाई।वे निहारिका के पास पहुंची। उन्होंने दोनों हाथों से उसकी बलाएँ ली और हाथ जोड़ते हुए ऊपर देख कहने लगी, "कृपा हो गयी गढ़ वाले महाराज जी। जो निहारिका का चयन हो गया।"

उन्होने वापस निहारिका की ओर देखा और उसके गालो पर हाथ रखते हुए बोली -  चयन तो होना ही था बिटिया, आखिर मैंने मन्नत जो मांगी थी "गढ़ वाले महाराज" से। सबकी सुनते हैं वह गढ वाले महाराज!

निहारिका और छुटकी ने थोडा चौंकते हुए एक दूसरे की ओर देखा मानो एक दूसरे से कह रही हो आज तो मम्मी भी धमाका करने से पीछे नही रह रही हैं। दरअसल छुटकी इसीलिये चौंक रही थी क्यूंकि उसे पता ही नही था कि उसकी मम्मी ने रतनगढ के गढ वाले महाराज के नाम से कोइ मन्नत मांगी है। वहीं निहारिका अंदर से सिहर गयी थी “गढ़ वाले महाराज” शब्द सुनकर। उसने घबराते हुए अपनी मां की ओर देखा जो अब छुटकी के हाथ से लिफाफा लेकर उसे आगे पीछे करते हुए देख रही थी।

 वे आगे दोनो से बोली, "मन्नत मांगी है तो पूरी करनी भी होगी! एक काम करना तुम दोनों जल्द ही पैकिंग कर लेना अपनी, जितनी जल्दी होग़ा हम लोग निकलेंगे यहां से। शाम को तुम दोनों के पापा के आने के बाद बात करती हूं इस बारे में। शुभ काम जितनी जल्दी हो सके उतना ही अच्छा है - कहते हुए निहारिका की मम्मी वहां से वापस कमरे की ओर निकल गयी।

निहारिका धम्म से सोफे पर बैठ गयी। "एक आफत और सर पर टपक गयी।न जाने क्यों हमे रतनगढ़ बिल्कुल भी पसंद नही है" - वह सोच रही थी।

 निहारिका को रतनगढ अपने अजीबोगरीब सपनो की ही वजह से पसंद नही था। क्योंकि उसे जब भी वह सपना आता उसकी सुबह की शुरुआत हमेशा ही असामान्य होती।कभी सर फटने वाला तेज सरदर्द, तो कभी मन को सवालों में घेरती उलझने जिनसे परेशान होकर वह कभी कभी तो वह \\\\'आँखों की चमक के प्रकार\\\\' को गूगल करने लगती। हद तो तब हो जाती जब वह उन सपनो से प्रभावित होकर संस्कृत भाषा बड़बड़ाने लगती। हालांकि वह इतनी समझदार थी कि हर बार इन सब अजीबोगरीब किस्सो को खुद तक सीमित रखने में कामयाब हो जाती थी।

छुटकी के चेहरे पर मुस्कान तैर गई, वो चहकते हुए निहारिका के पास धमकते हुए बोली -  आहा, जीजी सोचा नही था कि मेरी रतनगढ़ जाने की ख्वाहिश इतनी जल्दी पूरी होगी। रतनगढ़ जाऊंगी मैं...? साथ में आप मम्मी पापा सब जाएंगे...!हीरो तो यहीं रहेगा, उसे कहीं आना जाना पसंद जो नही है।

निहारिका ने अपनी सोच से बाहर आ बेमन से हल्का सा मुस्कुराते हुए उसे स्वीकृति दी और उठकर वहां से अपने कमरे की ओर बढ़ गयी।

निहारिका के अचानक उठ कर जाने से छुटकी को खटका लगा। "जीजी को क्या हुआ, ये चुप क्यों हो गयी! मुझे कुछ समझ नही आया... क्या वजह होगी, पूछती हूँ जाकर" सोचते हुए छुटकी भी “जीजी सुनो तो” कहते हुए उसके पीछे दौड़ गयी।

निहारिका चलते हुए अपने कमरे मे आ चुकी थी और बेमन से अपनी स्टडी पर आकर बैठ गयी। छुटकी भी उसके पीछे ही थी। वह उसके पास खड़ी हो गयी। वह समझ रही थी कि उसकी जीजी का मन अच्छा नही है लेकिन वजह उसकी समझ में नही आई। आखिर क्यूं उसकी जीजी का अच्छा खासा मूड अचानक से बदल गया। उसने काफी देर तक कुछ नही कहा और वैसे ही वहीं खड़ी रही।

निहारिका ज्यादा देर तक उसे इग्नोर नही कर पाई, वह अच्छे से जानती थी कि यह छुटकी का तरीका है परेशानियो के बारे मे बात करने का।

हम ठीक है छुटकी बस यह सोच कर मन भारी हो गया कि अब हमे एक सप्ताह बाद ही सबसे दूर जाना पड़ेगा – निहारिका ने पूरी कोशिश की छुटकी को यह यकीन दिलाने की, वह परेशान नही हैं बस थोड़ा सा उदास है जॉब को लेकर।

छुटकी ने अपनी आंखे छोटी की और गर्दन थोड़ा आगे बढा ली।

चल नौटकी, बस कर अब! निहारिका ने उठते हुए कहा और उसने छुटकी के कमर पर अपना हाथ डाला, छुटकी चार कदम पीछे हटते हुए चिल्लाई - नही जीजी यकीन हो गया मुझे मै जाती अब… बाय, बाय... वह वहाँ से बाहर भाग गयी। लेकिन जाते जाते छुटकी, निहरिका के चेहरे पर मुस्कान छोड़ गयी। निहारिका एक बार फिर अपनी स्टडी टेबल पर बैठ कर स्टडी मे रम गयी।

शाम ढलने पर निहारिका के पापा और उसका भाई घर वापस आ चुके थे। घर आते ही उसके पापा निहारिका के पास चले आये। पापा का हाथ अपने सर पर महसूस कर निहारिका ने किताब बंद की और वह उनके साथ कमरे से बाहर चली आई। छुटकी डायनिंग पर बैठी हुई थी सो वह भी जाकर वहाँ बैठ गयी। 
निहारिका, बिटिया! तेरी मम्मी कह रही थी कि तुम्हारा जोइनिंग लेटर आ गया है बाय पोस्ट...! दिखाओ मुझे! कब जाना है तुम्हे..? – निहारिका के पापा ने वहीं बैठते हुए पूछा।

निहारिका उठते हुए बोली - जी पापा! आज ही मिला है। लेकिन मम्मी कह रही थी, हमे रतनगढ़ निकलना है। उन्होंने कोई मन्नत मांगी थी। वह अचानक से बोल गयी ये अखिरी लाइन।

हां! मन्नत तो मांगी थी तुम्हारी मम्मी ने। उसके लिए हमे अब वहां के लिए जल्द ही निकलना भी होगा - निहारिका के पिता ने सोफे पर बैठते हुए कहा।
हां! लेकिन पापा हमारा जाना भी जरूरी है क्या..? हमारे बिन जाए काम न चलेगा क्या..? सच कहें तो हमारा बिल्कुल भी मन नही है वहां जाने का - निहारिका ने अपनः साथ चलना टालने की पुरजोर कोशिश की।

बिल्कुल नही चलेगा निहारिका! तुम्हे तो साथ चलना ही होगा। आखिर मन्नत तुम्हारे लिए ही तो मांगी गयी थी - निहारिका की मम्मी आते हुए बोली।
 हालांकि वह अब भी कार्य मे ही व्यस्त थीं। लेकिन सबकी बातचीत का हिस्सा बन गयी थीं वे। वे आगे बोली - और हां भाईसाहब की छोटी बेटी मान्या भी जा रही है रतनगढ़। अभी कुछ देर पहले ही बात हुई उनसे। सो अब तुम्हे भी अच्छी कम्पनी मिल जाएगी निहारिका, छुटकी और मान्या के रूप में।
ओके मम्मी - निहारिका ने बेमन से कहा और कमरे की ओर बढ़ गयी। कुछ देर में वापस आते समय उसके हाथ मे लेटर था जिसे उसने अपने पिता को थमाया और वापस से छुटकी के पास बैठ गयी। लेटर को अच्छी तरह उलट पलट कर पढ़ने  के बाद निहारिका के पापा के चेहरे पर बड़ी सी मुस्कुराहट आई, उनका सीना गर्व से चौड़ा हो गया और अब उनके चेहरे पर संतोष का भाव साफ दिख रहा था। जब उन्होंने लेटर अच्छी तरह से पढ़ लिया तब उन्होंने उठते हुए लेटर वापस निहारिका को थमाया, उसके सर पर हाथ रख मुस्कुराए और वहां से निकल गए। निहारिका ने गहरी सांस ली और उठकर वहां से कमरे की ओर बढ़ गयी। वह अपनी स्टडी टेबल पर रखी किताबो में फिर से सर खपाने लगी।

भागो! यहाँ से.. हीर...रुकना नही...अगर तुम रुक गयी तो फिर रुकी ही रह जाओगी। यहां हर ओर से मुसीबत सामने आ खड़ी होगी। जिनसे तुम लड़ नही पाओगी। मेरी आखिरी उम्मीद हो तुम हीर..! हीर...सुन रही हो न। भागो ...तेज थोड़ा सा तेज...तब तक भागो...! जब तक वह टूटा हुआ पुल तुम्हे दिखाई न दे जाए...! हीर...

हाँ।तेज झन्नाटेदार आवाज वहां गूजने लगी। अपनी स्टडी टेबल पर सर रखकर लुढकी बैठी हुई निहारिका की आंखे खुल गई और वह खुद से परेशान होते हुए बड़बड़ाई...क्या था ये...?

क्रमशः...  

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67 Comments

Abhilasha Deshpande

02-Jun-2022 10:26 AM

Nice

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Shnaya

03-Apr-2022 02:15 PM

Very nice 👌

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Dr. Arpita Agrawal

16-Mar-2022 12:35 AM

Amazing

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