लेखनी - गंगा

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  गंगा माँ गंगा तुम कितनी पावक कितनी निर्मल कल कल करता तेरा जल, पापियो के तुम पाप मिटाती प्यासे की तुम प्यास बुझाती, कोई पूजता तुझे माँ के रूप में ...

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