मर्म

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*मर्म (सोरठा )* बहुत बड़ा है मर्म,ईश्वर भी नहिं जानते। रहे हमेशा गर्म,शीतल होता है नहीं।। खोजे अपना गाँव,व्यग्र सदा उन्माद में। इसे चाहिए छांव,तभी शांति इसको मिले।। पाता य़ह विश्राम,गर्मजोश ...

अध्याय

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